खिड़की के पास खामोश सा खड़ा हुआ मैं बाहर की और ही देख रहा था हँसते - मुस्कुराते चहरे , एक दूसरे पर रंग डालते लोग और उड़ता गुलाल इस वक्त मुझे यही नजर आ रहा था
अर्जुन , बेटा गये नही अभी तक माँ ने पीछे से आवाज लगाते हुए कहा। हाँ माँ बस निकल ही रहा था मैंने माँ से कहा और मैं घर से निकल गया। मेरे पूरे परिवार को राधेश्याम हलवाई जी के शॉप की जलेबियाँ बड़ी पसन्द है और होली वाले दिन वो अपनी फेवरेट जलेबी ना खायें ऐसा कैसे हो सकता है मैं शॉप पर पहुँचा और मैंने गर्मा- गरम जलेबी पैक करने को कह दिया
शॉप के भईया ने मुझे कुछ देर इंतजार करने को कहा
इसलिए मैं सामने रखी लकड़ी की बेंच पर जाकर बैठ
गया। शॉप से कुछ दूर सामने ही कुछ लोग होली खेलते नजर आये। मुठ्ठी भर - भर कर वो एक दूसरे पर गुलाल फेंक रहे थे ये उड़ता गुलाल अच्छा लगता है। होली पर मैं भी अपने दोनो हाथ की मुठ्ठी में गुलाल लिए खनक के पीछे दौड़ रहा था खनक आगे - आगे और मैं उसके पीछे - पीछे। मुझे तो मेरे दोस्तो ने पहले ही पूरा रंग में रंग दिया था। पर क्योंकि खनक
जरा देर से आई थी तो वो अभी तक बची हुई थी लेकिन मैं उसे कैसे कोरा रहने देता इसलिए लिया गुलाल और
भैया जलेबी , हहाँ मैंने पलके झपका कर सामने देखते हुए कहा तब सामने खड़े लड़के ने दोबारा अपनी बात दोहराते हुए कहा भईया जलेबी और मेरे हाथ में जलेबी पकड़ा दी, मैं तो कहीं खो ही गया था।
मैं घर पहुँचा सबने बड़े मजे से गर्मा-गर्म जलेबी का आनन्द लिया, ऐसा बहुत कम ही हो पाता है की परिवार के सारे सदस्य एक ही समय पर एक साथ मौजूद हो ये त्यौहार ही है जो हमे ये खुशी देते है इस वक्त परिवार के सारे सदस्य साथ बैठकर गपशप कर रहे थे मस्ती का माहौल बना हुआ था सभी खुश नजर आ रहे थे पर एक मैं था जोकि सबके साथ होते हुए भी खुद को अलग सा महसूस कर रहा था जैसे की साथ होते हुए भी मैं उनके साथ नही हूँ। मैं कुछ देर बाद अपने कमरे में चला गया।
फिर जाकर वहीं खिड़की के पास खड़ा हो गया। और फिर वही सब याद करने लगा तब
मैंने खनक को गुलाल लगा तो दिया था पर दो मुठ्ठी
गुलाल के बदले खनक ने दो थाल भर कर मुझ पर गुलाल फेंका था। और तब जाकर वो खुश हुई थी उड़ता गुलाल और खिलखिला कर हँसती हुई खनक
ये पल मेरी आँखो में हमेशा लिए कैद हो गया।
हम दोनो ने ही तब जमकर होली खेली थी बहुत खुश थी खनक। और मैं भी।
तब हम दोनो में से किसी ने भी नही सोचा था की हमारी जिंदगी के रास्ते कभी जुदा भी होंगे।
आज फिर सब कुछ आँखो के सामने आ रहा है वो पल वो बाते और वो मुलाकात।
खनक ना तो मेरी स्कूल फ़्रेंड थी और न ही मेरी कॉलेज फ़्रेंड, न ही रिश्तेदार और न ही कोई पड़ोसी।
हम दोनो एक दूसरे से बिल्कुल अंजान थे न खनक किसी अर्जुन को जानती थी और न अर्जुन यानी मैं किसी खनक नाम की लड़की को जानता था पर फिर भी हम मिले और एक रिश्ता बना प्यार का, एहसास का, एक बहुत ही गहरा रिश्ता।
हम कैसे मिले और आगे क्या हुआ ये जानने के लिए अगला भाग जरूर पढ़े।

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