काला लड़का

हे भगवान अभी तो बैंक से कुछ दूर चली ही थी कि ये
जान लेवा धूप मेरी त्वचा को जला ही देगी। ये
मुसीबतों का अंत भी कभी नही होता। एक तो मैं इस
तपते हुए सूरज जोकि मेरे सिर के ऊपर ही बैठा है
इसकी गर्मी से  पहले ही परेशान हूँ ऊपर से ये
सिग्नल का ट्रेफिक।ट्रेफिक तो ट्रेफिक , ये होर्न बजाने
वालो की भी कमी नही है। कभी-कभी तो मन करता
है कि इन हॉर्न बजाने वालो का कान हॉर्न के पास कर
हॉर्न तेजी से बजाऊ और कहु अब कैसा लगा। तब
इन्हें पता चलेगा की हमे कैसा लगता है।
खैर साहठ सेकेंड होने वाले थे। लेकिन पाँच सेकेंड
पहले ही गाड़ीयां ट्रेफिक से निकलना शुरू हो गई थी
आखिर इस गर्मी में कौन पाँच सेकेंड भी ट्रेफिक में
रुकना चाहता है। ट्रेफिक से निकलते ही थोड़ी राहत की साँस मिली थी कि मेरे मोबाइल की घण्टी बजना
शुरू हो गई। मैने अपनी गाड़ी साइड में रोकी और
बैग में से मोबाइल निकाल कर देखा- प्रीति
अब इस प्रीति को क्या काम है कुछ देर बाद कॉलेज
में मिल ही लेते।
हेलो हाँ प्रीति बोलो
प्रीति- अरे अनिता सुनना मुझे आने में थोड़ा लेट हो
जायेगा। कम से कम आधा घण्टा
आधा घण्टा मैने तेज आवाज में कहते हुए कहा
प्रीति-  हाँ, तु नाराज मत होना मेरा इंतजार करना
प्लीज़, प्लीज,प्लीज
हाँ जल्दी आ ये कहकर मैने फोन काट दिया।
देखलेना भगवान उन दोस्तो का भी अलग से हिसाब
करेंगे जो हमे तो जल्दी बुलाते है पर खुद समय पर
नही आते।
मैने गाड़ी स्टार्ट कि और कॉलेज की ओर निकल पड़ी
इस तप्ति गर्मी में गन्ने का जूस अमृत सा और ठेले
वाले भईया भगवान की तरह लगते है अगर जूस दस
रुपये का हो तो।
खैर कॉलेज से कुछ दूर पहले ही मैं गन्ने की जूस की
दुकान पर रुक गई। वहाँ पहले से ही कुछ लोग बैठे
हुए थे मैं भी वहाँ बैठ कर प्रीति का इंतजार कर रही
थी और मन ही मन उस पर गुस्सा भी कर रही थी।
तभी वहाँ एक छोटी से लड़की आई। यही कोई पाँच
सात साल की होगी। कड़क बिखरे से बाल रूखा सा
चेहरा लाल रंग की मैंली सी फ्रॉक उसके पैरो में
चप्पल भी नही थी। वो एक-एक कर किसी के भी
पास जाती और उनसे जूस मांगती शायद उसे जूस
पीना था पर लड़के-लड़कियाँ उसकी बात को सुन
अनसुना कर देते वो फिर किसी ओर के पास जाती
वे भी उससे मुँह फेर अपनी बातो में लग जाते। ये
सिलसिला दस मिनट तक चलता रहा। मैं लगातार
उसे देखे जा रही थी पर वो मेरे
पास नही आई। दस मिनट बाद एक लड़का साइकिल
से आता है जो दिखने में थोड़ा सावला था या कहु के
थोड़ा ज्यादा ही काला था छोटे बाल बारह से पन्द्रहा
साल का, स्कूल की यूनिफॉर्म में, पतला दुबला सा।
देखने में वह बिल्कुल साधारण लग रहा था। बच्ची
ने उस लड़के की ओर देखा पर वह उसके पास नही
गई। शायद उसे लगा की यह काला सा लड़का
जोकि खुद साइकिल से आया है दिखने में कुछ खास
भी नही लग रहा था वह उसकी क्या सहायता करेगा।
दरसल बच्ची उन लोगों के पास ज्यादा जा रही थी जो
दिखने में थोड़े आकर्षक बडे ही अच्छे तैयार थे
 बच्ची के दिमाग में शायद ये बात
थी के जो सुन्दर दिखते है वे बहुत अच्छे होते है
इसीलिए तो वह उन्ही के पास ज्यादा जा रही थी
लेकिन कुछ देर बाद
वो बच्ची उस सांवले लड़के के पास भी गई। वो लड़का जेब में हाथ
डालकर कुछ ढूंढता है। और फिर हाथ बाहर निकाल
कर अपनी हथेली में देखता है शायद उसने पैसे
निकाले थे नजर नीची कर जिस तरह से वह पैसे
देख रहा था उसके हाव-भाव से लग रहा था कि उसके
पास ज्यादा पैसे नही है। उसने बच्ची से कहाँ चल।
उसने एक ग्लास जूस लिया और बच्ची के हाथ में
ग्लास थमा दिया। जूस वाले भईया को दस का
नोट दिया। अपनी साइकिल उठाई और वो वँहा से
तेजी से चला गया। मैने दूर तक उस लड़के को जाते
हुए देखा। प्रीति पर जो गुस्सा आ रहा था वह।अब यह
सब देख ठंडा हो गया था सच है सच्ची नेकि का कोई
नाम, कोई उम्र, कोई रंग नही होता वह तो केवल एक
सच्ची भावना से जुड़ी होती है।

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एक चुटकी प्रेम

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