ये कहानी एक छोटी सी बच्ची अभिलाषा की है जोकि
अपनी दादी और माँ के साथ रहती है। दिन का समय था अभिलाषा की माँ अंजलि घर के कामो में लगी थी और अभिलाषा की दादी आँगन में पापड़ सुखा रही थी। छोटी बच्ची अभिलाषा पड़ोस की बच्ची रानु के साथ वही पास में खेल रही थी
जाने क्या हुआ। रानु बीच खेल में घर चली गई और
अभिलाषा भी उदास सी दादी के पास आकर बैठ गई।
दादी के पूछने पर उसने कुछ ना कहा। कुछ देर में
अंजलि भी बाहर आ गई।अभिलाषा को उदास देख
अंजलि ने भी उससे उदासी की वजह जानने की
कोशिश की। बोहोत पूछने पर अभिलाषा ने अपनी चुप्पी तोड़ी। अभिलाषा ने बताया की रानु आज अपने पिता के साथ कही घूमने जाने वाली है। इसलिए वह अपने घर चली गई। अभिलाषा की बात सुन अंजलि ने कहा बस इतनी सी बात के लिए मेरी बेटी उदास है कोई बात नही रानु के साथ कल खेल लेना आज दादी और माँ के साथ खेल लो। अभिलाषा ने माँ की बात का कोई जवाब नही दिया। उसका गुमसुम चेहरा देख माँ और दादी दोनो ही उसे अपने-अपने तरीके से खुश करने में लग गये। वे दोनो ही अभिलाषा की उदासी की असली वजह से अंजान थी। जब अभिलाषा किसी भी बात से खुश होती नही दिखी। तब अभिलाषा की माँ
अंजलि ने खुद अभिलाषा से पूछा की वह क्या चाहती है। तब अभिलाषा ने अपनी मासुमियत भरी निगाहों से माँ और दादी की ओर देखते हुए कहा- पापा। मुझे मेरे पापा चाहिए। माँ मुझे पापा से मिलना है। उनके साथ घूमने जाना है। जैसे रानु जाती है अपने पापा के साथ। बस इतना केह अभिलाषा रोने लगी। शायद आज अभिलाषा को अपने पिता की कमी खल रही थी अभिलाषा की माँ व दादी दोनो अभिलाषा की बात सुन थमी सी रह गई। दोनो की आँखो में आंसू भर आये। अभिलाषा की माँ ने उसे जोर से गले लगा लिया। और उसे चुप करने लगी। अभिलाषा की माँ अंजलि ने अभिलाषा को यह भरोसा दिलाया के उसके पापा इस दिवाली उससे मिलने जरूर आएंगे। अभिलाषा के पिता दूसरे शहर में रहकर नोकरी करते है। वे वही से घर खर्च के लिए पैसे भेज देते है।दो साल से तो वे एक बार भी घर नही आये थे। लेकिन शायद वह इस दिवाली घर जरूर आएंगे। क्योंकि अंजलि ने अपने पति यानी अभिलाषा के पिता को चिट्ठी के माध्यम से अभिलाषा की इक्छा के बारे में बता दिया था। इधर अभिलाषा दिवाली आने का इंतजार कर रही थी और दिवाली आने पर अभिलाषा दिवाली वाले दिन घर के दरवाजे पर नजर गढ़ाए अपने पिता का इंतजार कर रही थी।सुबह से शाम हो चुकी थी। लेकिन अभिलाषा के पिता घर नही आये थे।अभिलाषा का मन इस बात से दुखी हो जाता है। अभिलाषा की माँ और दादी अभिलाषा का मन बहलाने की कोशिश करते है पर अभिलाषा पर उनकी कोशिश का कोई असर नही होता है।अंजलि यह सोचने में लगी रहती है कि कैसे अभिलाषा को खुश किया जाये। और उसे इसका उपाय मिल जाता है। कुछ दिनों बाद ही अभिलाषा का जन्मदिन आने वाला होता है। बच्चे अपने जन्मदिन को लेकर उत्साहित होते है अभिलाषा भी जरूर उत्साहित होगी। यह सोच अंजलि अभिलाषा के जन्मदिन की बात उसके दोस्तो को बताती है और अभिलाषा के जन्मदिन वाले दिन सबको घर बुलाती है। अभिलाषा सबको देख खुश तो होती है पर ज्यादा नही। लेकिन थोड़ी देर बाद वह सबके साथ खेलने लगती है और धीरे-धीरे उसका मन बेहलने लगता है। कुछ देर में ही वह सब बच्चो के साथ हँसने खिलखिलाने लगती है। आखिर अभिलाषा है तो एक बच्ची। अब वह अपने दोस्ते के साथ जन्मदिन की खुशी मना रही थी। माँ और दादी अभिलाषा को खुश देख प्यार से निहार रही थी। इस सब के बीच दरवाजे पर किसी के होने की आहट होती है सब दरवाजे की ओर देखते है। दरवाजे पर कोई ओर नही अभिलाषा के पिता होते है जिन्हें देख अभिलाषा खुशी से दौड़कर उनके गले जा लगती है अभिलाषा के पिता की आँखे भी नम हो जाती है पिता पुत्री के इस मिलन को देख कर अभिलाषा की माँ और दादी की आँखो से आँसू झलक आते है। ये पल उन सब के लिए बहुत ही भावुक पल था।
