खामोशी



खामोशी कभी-कभी अच्छी लगती है लेकिन
अगर ये ज्यादा समय तक रहे तो परेशानी की
वजह भी बन सकती है। आज की कहानी कुछ
ऐसी ही है।
ये कहानी आशुतोष और निहारिका की है दोनो
पति-पत्नी है।ये बात उस समय की है जब दोनो की
नयी-नयी शादी हुई थी।
आशुतोष और निहारिका दोनो की शादी परिवार वालो
की मर्जी से हुई थी यानि के अरेंज मैरिज। निहारिका
और आशुतोष को भी इससे कोई एतराज नही था।
दोनो की शादी राजी खुशी हो गई थी ।
आशुतोष बोहोत ही खुशमिजाज तरह का हस्ते
मुस्कुराते रहने वाला लड़का है और बहुत ही बाते
करने वाला चुप रह पाना तो उसके बस की बात ही
नही।
लेकिन निहारिका शांत स्वभाव की लड़की है जल्दी ही
किसी से घुलमिल नही पाती।
कहानी अब शुरू होती है।
 नयी-नयी शादी हुई हो तो
खुशी ही कुछ और होती है ऐसी ही खुशी आशुतोष
को भी हो रही थी। शादी थी तो घर में मेहमान भी थे।
आशुतोष नजाने कब से इस फिराक में थे की
निहारिका से कुछ देर बात करने को मिल जाये।
पर इतने सब लोगों के बीच बात कर पाना आसान
ना था। जैसे-तैसे मौका मिला तो निहारिका ने ये कह
दिया कि उसे ज्यादा बाते करना पसंद नही है। ऐसा
कहकर निहारिका चली गई। और आशुतोष अकेले
बैठे रह गये।
तीन-चार दिन बाद मेहमान भी घर से जा चुके थे। नई
बहु को सब खुब लाड़ लड़ाये जा रहे थे। सब खुश थे
इधर आशुतोष आने बहाने निहारिका से बात करने
की कोशिश करते। पर निहारिका उनकी बातो का
ज्यादा जवाब ना देती। खैर धीरे-धीरे निहारिका सबके
साथ घुलने-मिलने लगी थी।पर आशुतोष के साथ
वह अभी भी सहज नही हो पा रही थी। आशुतोष
समझ नही पा रहे थे कि निहारिका उनसे नाराज क्यों
है। कुछ दिन इसी तरह बीत गये। आज आशुतोष ने
घर पर बताया के उसका ट्रांसफर रायपुर में हो गया।
है। दो दिन बाद ही आशुतोष और निहारिका रायपुर
चले गए। वे रायपुर आ चुके थे नई जगह नये घर में।
निहारिका में यहाँ आकर भी कुछ खास परिवर्तन नही
हुआ था। वह अभी भी खामोश ही रहती थी साथ
होते हुए भी आशुतोष और निहारिका अजनबी की
तरह रहते थे। आशुतोष खुब बोलते बतियाते पर
निहारिका कुछ ना कहती बस चुपचाप सुनती रहती।
आशुतोष निहारिका को खुश करने के लिए कुछ ना
कुछ जतन करते रहते। कभी कोई तोफा लेकर आते
तो कभी फूल लेकर आते निहारिका धीरे से मुस्कुरा
देती पर कुछ ना कहती। बस खामोश रहती। शायद
निहारिका को अपने मन की बात कहना ही नही आता
था। इसीलिए तो वह खामोश ही रहती थी।
खैर आशुतोष ने अभी भी हार नही मानी थी उन्हें
पूरा भरोसा था की जल्द ही निहारिका अपनी खामोशी
तोड़ेगी और अपनी मन की बातो को आशुतोष से
साझा करेगी।
एक दिन मौसम खराब था शायद बारिश होने वाली
थी। आशुतोष जल्दी घर आ गये थे। आशुतोष के मन
में ये ख्याल आया की लड़कियों को बारिश अच्छी
लगती है।
हो ना हो निहारिका को भी बारिश पसंद होगी।
बस आशुतोष बारिश होने का इंतजार करने लगे।
और मन ही मन खुश भी हुए जा रहे थे दरसल बारिश
आशुतोष के मन को गुदगुदाने लगी थी उन्हें उम्मीद
थी कि बारिश की बूंदे निहारिका के मन को जरूर
छु जाएंगी। जो आशुतोष ना कर पाये वह ये बूंदे कर
जायेंगी। निहारिका के मन में प्यार भर  जाएंगी।
उसकी खामोशी को खिलखिलाती हँसी में बदल
जाएंगी।हम दोनो मौसम की इस पहली बारिश में
साथ में जरूर भीगेंगे। कुछ इस तरह के ख्यालो में
आशुतोष गुम हुए जा रहे थे कि तभी बिजली कड़कती
है और बारिश होने लगती है। आशुतोष जैसे-तैसे
करके निहारिका को घर से बाहर ले आते है और वे बारिश में भीगने लगते है निहारिका कहती है के उसे
बारिश में भीगना पसन्द नही है ऐसा कह वह घर में
चली जाती है आशुतोष की सारी खुशी बारिश के पानी
के साथ बह जाती है बिचारे आशुतोष अकेले ही
भीगते रह जाते है।
आशुतोष को हर उम्मीद टूटती नजर आने लगती है।
अगले ही दिन आशुतोष निहारिका को बताते है की
उन्हें ऑफिस के काम से चार दिन के लिए शहर से
बाहर जाना है। वो निहारिका को मायके छोड़ आएंगे।
उसे भी सबसे मिल कर अच्छा लगेगा और फिर वह
अपना काम खत्म कर उसे लेने आ जायेंगे।
आशुतोष निहारिका को मायके छोड़।चले जाते है।
निहारिका को अपने परिवार से मिलकर अच्छा तो
लगता है,
पर वह खुश नजर नही आ रही थी।चार दिन बीत चुके
होते है पर आशुतोष नही आते। निहारिका को भी
कही ना कही लग रहा था के शायद आशुतोष नही
आएंगे। क्योंकि जब आशुतोष निहारिका को छोड़ कर
जा रहे थे तब उनकी आँखो में खामोशी सी नजर आ
रही थी जैसे की फिर मिल पाना मुश्किल हो बस
निहारिका को एक सार देखे जा रहे थे।
निहारिका को आज अपना ही घर पराया सा लग रहा
था उसे बार-बार बस आशुतोष की बाते याद आ रही
थी। जो एहसास आज तक निहारिका को नही हुआ
शायद वो आज हो रहा था। उसे आशुतोष की कमी
खल रही थी कुछ दिनों की दूरी ने निहारिका को बहुत
सी बातो का एहसास दिला दिया था। चार से आठ
दिन हो गये थे पर आशुतोष  उसे लेने नही आये।
निहारिका मन ही मन खुद से सवाल किये जा रही थी
क्या आशुतोष उसे लेने आएंगे। या फिर नही आएंगे।
यह सब सोच निहारिका उदास सी हो जाती है।
तभी निहारिका की छोटी बहन की आवाज आती है।
वह निहारिका को पुकारते हुए कहती है-
दीदी जल्दी नीचे आओ जीजाजी आये है निहारिका
उस वक्त ऊपर वाले कमरे में थी सुनते ही निहारिका
दौड़ते हुए जल्दी से नीचे आ जाती है।और सीढ़ियों
के पास खड़ी हो जाती है। आशुतोष निहारिका के
पिताजी के पास बैठे हुए थे निहारिका की माँ
निहारिका को कहती है की जल्दी अपना समान
रखलो कुछ ही देर में तुम्हे और दामाद जी को
निकलना है।
निहारिका और आशुतोष रायपुर के लिए निकल जाते
है पूरे सफर के दौरान आशुतोष ने निहारिका से
कोई बात नही की वह बिल्कुल खामोश थे। अब
वे घर पहुँच चुके थे। आशुतोष काफी थक गये थे
इसलिए  चुपचाप कमरे में जाकर सो गये। निहारिका
आशुतोष से कुछ कहना चाह रही थी पर कह ना
सकी।
सुबह हो गई थी आशुतोष ऑफिस के लिए तैयार हो
गये थे। लेकिन वह अभी भी कुछ चुप से थे।
निहारिका पूछना चाह रही थी पर उन्होंने कुछ ना कहा
और वह चले गये।
निहारिका को आशुतोष की खामोशी परेशान किये जा
रही थी हमेशा मुस्कुराते रहने वाले आशुतोष को
इस तरह खामोश देख पाना  निहारिका के लिए
बड़ा मुश्किल सा हुए जा रहा था।
निहारिका इस बात को अच्छी तरह जानती थी कि
कही ना कही इस खामोशी की वजह वही है।
शाम हो चुकी थी आशुतोष के आने का समय हो गया
था दरवाजे की खट खट आवाज होती है निहारिका
दरवाजा खोलती है तो देखती है के आशुतोष पूरी
तरह भीगे हुए थे
अचानक मौसम खराब हो जाने के कारण बारिश हुई
थी जिसकी वजह से आशुतोष भीग जाते है।
आशुतोष कपड़े बदल हॉल में आकर बैठ जाते है।
निहारिका चाय  टेबल पर रख देती है और वही पास
में खड़ी हो जाती है आशुतोष चाय पीते है।
निहारिका इंतजार कर रही होती है के आशुतोष कुछ
तो बोलेंगे। लेकिन वह कुछ नही कहते।चाय खत्म
करने के बाद आशुतोष कमरे की ओर जाने लगते है
निहारिका समझ नही पाती है कि वह क्या करे
बस वह झटसे आशुतोष का हाथ पकड़ कर उन्हें रोक
लेती है आशुतोष निहारिका की ओर देखते है।
और उन्हें नजर आता है के जिस बारिश में वह भीग के
आये है वैसी ही बारिश निहारिका की आँखो से हो रही
थी। जिससे उनका हाथ भीगे जा रहा था। इससे पहले
कि आशुतोष कुछ कह पाते। निहारिका खुद ही बोल
पड़ी। निहारिका ने कहा-
खामोशी सब पर अच्छी नही लगती और आप पर तो
बिल्कुल अच्छी नही लगती। आशुतोष।
आशुतोष ने बड़े ही प्यार से निहारिका की ओर देखते
हुए कहा- खामोशी किसी पर भी अच्छी नही लगती
कभी-कभी ये रिश्तो में दूरियों की वजह भी बन जाती
है। खामोश रहना फिर भी आसान है पर किसी अपने
की खामोशी सहना बोहोत मुश्किल है निहारिका
खामोश मत रहा करो।
   खामोशी तुम पर भी अच्छी नही लगती।
उस दिन के बाद निहारिका और आशुतोष के बीच
कभी खामोशी नही रही।
आशुतोष को उनकी निहारिका मिल गई थी
वो निहारिका जो मन की बाते करना जानती है जो
मुस्कुराना
जानती है।जिसे बारिश में भीगना पसन्द है। और
   ये कहानी बस यही खत्म हो जाती है।

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