अप्रैल फूल भाग -2


जब किसी झूठ से पर्दा उठता है तो अक्सर ऐसी खमोशी देखने को मिलती है जैसी अभी वैदिक और रिमझिम के बीच है वैदिक जो कहना चाहता था उसने कह दिया और रिमझिम उसने सब कुछ चुपचाप सुन लिया कुछ भी नही बोली वैसे ही जैसे उस शाम कुछ नही कहा था उसने , जब वैदिक ने पूछा था उससे मेरी दोस्त बनोगी तब रिमझिम ने कुछ नही कहा था। दिनभर की तपती धूप के बाद एक ठंडी शाम थी, वो शाम जिसमे रिमझिम के लिए कुछ सुकून के पल होते है दिनभर के काम और थकान के बाद रिमझिम कुछ पल खुदको रिलैक्स करने के लिए रोज़ शाम को छत पर टहलने जरूर जाती है और कुछ देर वही बैठी रहती है अच्छा लगता है उसे बादलों में शाम के रंग को चढ़ते देखना पक्षियों के झुंड को वापस अपने घर लौटते देखना और जब शाम गहरी होकर रात में बदलने लगे तब आसमान में धीरे- धीरे चमकते हुए निकलते तारों को देखना। रिमझिम तारों को बड़े ही गौर से देखती है वो ये मानती है कि इन सब के बीच एक तारा वो भी है जो सबके साथ चमक रही है। क्योंकि वैदिक आया हुआ है इसलिए रिमझिम ने अपने शाम को छत पर जाने का समय जरा लेट कर दिया रिमझिम नही चाहती कि उसके सुकून के पलों में उसके अलावा कोई और भी हो। हर रोज की तरह रिमझिम अपने तय समय पर अभी छत पर आई हुई थी कुछ ही देर हुई होगी की वैदिक भी आ गया शायद उसने रिमझिम को देखा नही था, लगता है मेरी इस बार की छुट्टियाँ ऐसे ही जाने वाली है अपने दोस्त के बिना, मैं कितना बोर हो रहा हूँ बिल्कुल अच्छा नही लग रहा मुझे, सच मे किसी दोस्त का होना कितना जरूरी होता है कहते हुए वैदिक छत से नीचे रास्ते पर साइकिल चलाते हुए बच्चों को देख रहा था। और जब पीछे मुड़ा तो उसे रिमझिम नज़र आई अरे रिमझिम तुम यहीं थी मुझे पता ही नही चला। हाँ वो मैं शाम को थोड़ा टहलने के लिए आ जाया करती हूँ। आना भी चाहिए वैसे भी शाम के वक्त खुले आसमान के नीचे कितना सुकून मिलता है , है ना वैदिक ने कहा। हाँ , अच्छा लगता है रिमझिम बोली। वैदिक कुछ उदास सा चेहरा बनाकर बैठ गया, क्या? हुआ तुम अपने दोस्त को बहुत मिस कर रहे हो क्या, हाँ वो होता तो मैं इस तरह अकेले बैठा नही होता। तुम बोर नही होती हो क्या ऐसे अकेले - अकेले रहकर वैदिक ने पूछा। नही मुझे बुरा नही लगता रिमझिम ने कहा तो वैदिक हँसते हुए बोला हाँ तुम तो हो ही अलग इसके बाद रिमझिम कुछ देर ही रुकी और फिर जाने लगी तब वैदिक  ने उसे रोकते हुए कहा रिमझिम रुको कुछ पूछना है तुमसे , मेरी दोस्त बनोगी कुछ दिनों के लिये ही सही।  रिमझिम ना कुछ बोली और ना ही ऐसे भाव उसके चेहरे पर दिखे जिससे ये अंदाजा लगाया जाए की शायद रिमझिम हाँ कह दे। अगली सुबह वैदिक दरवाजे की और ध्यान लगाए बैठा था रिमझिम स्कूल जाने से पहले चाबी हमेशा देकर जाती है तो जैसे ही रिमझिम सीढ़ियों से उतरती दिखाई दी वैदिक झट से दरवाजे के पास पहुँच गया चाबी लेते हुए बोला तो फिर क्या सोचा तुमने रिमझिम ने छोटी सी मुस्कान के साथ सिर हिला दिया और वैदिक खुश हो गया। शाम को वैदिक और रिमझिम छत पर एक साथ थे रिमझिम ने वैदिक को पहले ही कुछ रूल्स बता दिए जो उसे दोस्त बनकर फॉलो करने थे हम सिर्फ दोस्त है पर बहुत पक्के वाले दोस्त नही , बात करते वक्त अपनी भाषा का ध्यान रखना है , और हाँ हम सिर्फ कुछ दिनों के लिए फ्रेंड्स बने है, और मुझे मज़ाक ज्यादा पसंद नही ठीक है, वैदिक ने सारी बात सुनने के बाद कहा बिल्कुल सारी बातों का ध्यान रखा जाएगा तो फ्रेंड्स कहते हुए वैदिक ने अपना हाथ आगे बढ़ाया रिमझिम ने बहुत सोचते हुए अपना हाथ बढ़ाया और हैंडशेक करते हुए बोली ओके फ्रेंड्स। फिर दोनों बैठकर बातें करने लगे रिमझिम तुम स्कूल में कैसी थी शरारती थी या अभी की तरह शांत सीधी रिमझिम बोली मैं और बच्चों जैसी ही थी सिंपल सी। पर मैं तो बड़ा ही शरारती था बहुत मस्ती करता था और किसी से भी डरता नही था। अच्छा पर एक बार आँटी ने मुझे बताया था जब तुम स्कूल में थे तो एक बड़ी क्लास के बच्चे ने तुमसे तुम्हारा लंचबॉक्स छुड़ा लिया था बड़ा ही बदमाश था वो , उसके डर से अगले दिन तुम स्कूल ही नही जा रहे थे रिमझिम हँसते हुए बोली,ऐसा कुछ नही हुआ था वो तो माँ को गलतफ़हमी हो गई थी छोड़ो इस बात को अपनी  कॉलेज लाइफ के बारे में बताओ कुछ अच्छा पहले मैं ही बताता हूँ कहते हुए वैदिक ने खुद पहले बोलना शुरू कर दिया और साथ ही खुद की तारीफ करना भी, वैदिक बोलता जा रहा था और रिमझिम उसकी बातों पर धीरे- धीरे अपना सिर हिलाए जा रही थी मैं बहुत ही अच्छा स्टूडेंट था मेरा सारा फोकस हमेशा मेरी पढ़ाई पर रहा टॉप 10 स्टूडेंट्स की लिस्ट में मेरा नाम भी था। जैसा मैं कॉलेज में था वैसा ही मैं अपने ऑफ़िस में हूँ मेरा सारा फोकस सिर्फ और सिर्फ अपने काम पर रहता है मैं हमेशा बेस्ट परफॉर्मेंस देना चाहता हूँ , गुड़ रिमझिम ने कहा। तुम भी तो कुछ बताओ तब रिमझिम बोली मैं , मैं बहुत होशियार स्टूडेंड नही थी बस ठीक थी और जॉब तो तुम्हें पता ही है तुम्हारी जॉब से मेरी जॉब बिल्कुल अलग है। हाँ और बोरिंग भी वैदिक मुस्कुराते हुए धीरे से बोला। हर रोज़ की तरह आज की शाम भी आगे बढ़ चली थी और रात हो गई थी वैदिक हॉल में बैठे हुए टीवी देख रहा था पर उसके दिमाग मे शायद कुछ और ही चल रहा था रिमझिम भी अपने स्टडी टेबल के पास हाथों में बुक लिए कुछ पढ़ रही थी पर बार - बार उसे वैदिक की बातें याद कर हँसी आ रही थी कैसे खुद की तारीफ करें जा रहा था वो सच भी बोल रहा था कि सब झूठ था खैर मुझे क्या करना सोचते हुए रिमझिम ने वापस अपना ध्यान किताब में लगा लिया। जब नई - नई दोस्ती होती है तो बातें भी ढेर सारी होती है वैदिक और रिमझिम रोज शाम को मिलते और खूब बातें भी किया करते वैसे ज्यादा बातें वैदिक ही करता पर रिमझिम भी अब थोड़ा- थोड़ा फ्रैंक होने लगी थी, जब हम किसी से ज्यादा मिलने लगते है उसके साथ वक्त बिताने लगते है उससे बातें करने लगते है तो हमारे मन मे उसके लिए झिझक अपने आप ही धीरे- धीरे कम होने लगती है रिमझिम के साथ भी ऐसा ही हो रहा था सम्हल- सम्हल कर ही सही पर अब रिमझिम थोड़ी बहुत मन की बात वैदिक से करने लगी थी वो शायद इसलिए भी क्योंकि वैदिक की कुछ बातें ऐसी थी जो रिमझिम की सोच से काफी मिलती- जुलती थी। कल जब वैदिक रिमझिम को अपने दोस्त विवान और खुदके स्कूल टाइम के कुछ मज़ेदार किस्से बता रहा था तब कहते- कहते वो रुक गया उसकी नज़र आसमान की ओर थी देखो पंछी कैसे दिनभर की सैर के बाद अब अपने घर लौट रहे है आकाश में उड़ते ये  पंछी एक साथ कितने अच्छे लगते है ना और इनका तालमेल इतना अच्छा होता है कि इतने सारे होते हुए भी ये आपस में टकराते नही है एक ही गति से एक साथ बस उड़ते चले जाते है ,हाँ सही कह रहे हो रिमझिम बोली। 

आज की सुबह रिमझिम के लिए सरप्राइजिंग रही हुआ ये की जब रोज़ की तरह रिमझिम फूल तोड़ने छत पर आई तो उसे वैदिक दिखाई दिया वो भी फूल तोड़ते हुए। रिमझिम , देखो आज तुम्हारा काम मैंने कर लिया ,हाँ वो तो देख रहीं हूँ पर तुम यहाँ कैसे तुम्हें तो शायद देर से जागने की आदत है ना। नही तो मैं तो रोज़ जल्दी जागता हूँ बस आज नींद और ज्यादा जल्दी खुल गई वैसे भी हम सभी को सुबह जल्दी उठना चाहिए सूरज को निकलते हुए सवेरा होते हुए खुद अपनी आँखों से देखना चाहिए , क्यों रिमझिम ने पूछा। क्योंकि इससे मन को खुशी मिलती है और पॉज़िटिव एनर्जी फील होती है , और सवेरा तो नई शुरुआत को लाता है नई शुरुआत के लिए तो जल्दी जागना ही चाहिये, हाँ प्यारी सी स्माइल के साथ रिमझिम ने कहा। अच्छा इतने फूल काफी है या और तोड़ने है वैदिक ने रिमझिम से पूछा हाँ बस इतने बहुत रिमझिम बोली। अगर रोज़ सुबह इन खिले हुए खूबसूरत फूलों को देखें इनकी महकती खुशबू को महसूस करें तो दिन तो बहुत खुशनुमा बीतेगा, तभी तुम धूप में भी होंठो पर हल्की सी मुस्कान लिए इतने आराम से चलकर आती जैसे कि कोई प्रॉब्लम नही है तुम खुश हो, तो ये है राज़। क्या राज़ रिमझिम ने हैरान होते हुए पूछा तब वैदिक बोला तुम्हारी सुबह की शुरुआत इन सुंदर फुलों के साथ होती है मन अपने आप खुशी से भर जाता होगा और फिर सारा दिन अच्छा ही जाता होगा कोई प्रॉब्लम भी तुम्हे प्रॉब्लम की तरह नही लगती होगी सब इज़ी सा लगता होगा है ना वैदिक ने एक होशियार समझदार लड़के की तरह पूछा। जी आपका ये गणित बिल्कुल सही है कहकर रिमझिम जोर से हँसने लगी साथ मे वैदिक भी हँसने लगा अब फूल तो मैंने तोड़ लिए पर तुम्हारा आज का दिन भी हर दिन की तरह जाना चाहिये महकता हुआ कहते हुए वैदिक ने मोगरे के कुछ फूल रिमझिम के ऊपर पर फेंक दिये रिमझिम हँसते - हँसते रुक गई , सॉरी गलती से हो गया मुझसे वैदिक ने थोड़ा सीरियस होते हुए कहा रिमझिम ने भी कुछ फूल लिए और वैदिक पर उछाल दिए कहते हुए की तुम्हारा दिन भी क्यों बुरा जाए ईट्स ओके मैंने बुरा नही माना कहकर रिमझिम चली गई पर वैदिक वही खड़ा रहा रिमझिम को जाते हुए देखता रहा। शाम को रिमझिम छत पर अकेले ही टहल रही थी जाने क्यों वैदिक आज छत पर आया ही नही , ये पहली बार था जब रिमझिम को अकेले होने पर थोड़ा बुरा सा लग रहा था रिमझिम कभी आसमान की ओर देखती तो कभी उसकी नज़र सीढ़ियों पर जा ठहरती, कुछ देर टहलने के बाद रिमझिम वहीं छत के एक कोने में जा बैठी और फिर अपनी डायरी उठाकर कुछ लिखने लगी हाँ आज रिमझिम डायरी भी साथ लेकर आई थी  ये डायरी ही तो है जो रिमझिम की सबसे अच्छी दोस्त है अपने दिल की बड़ी से लेकर हर छोटी से छोटी बात रिमझिम इसी से तो कहती है। अगले दिन वैदिक किसी सुपरफास्ट ट्रेन की तरह सारे घर में यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ दौड़े जा रहा था अपनी माँ के जन्मदिम को स्पेशल बनाने के लिए वैदिक और उसका दोस्त विवान जोकि अपने ट्रिप से अब लौट आया था दोनों मिलकर घर को सजाने में लगे हुए थे रिमझिम ने भी स्कूल से आने के बाद वैदिक के काम मे उसका हाथ बटाया शाम तक सब रेडी हो गया। एक घन्टे बाद सब हॉल में इकट्ठा थे वैदिक ने पार्टी में बस कुछ खास लोगो को ही इनवाइट किया था और बाकी सब घर के ही लोग थे विवान और रिमझिम भी घर के लोगों में ही तो आते है। केक कट होने वाला था पर रिमझिम अभी तक नीचे आई नही थी वैदिक ने दरवाजे के पास आकर ऊपर देखते हुए आवाज़ लगाई रिमझिम जल्दी आओ केक कट होने वाला है हाँ , हाँ आ रही हूँ कहते हुए रिमझिम सीढ़ियों के पास आई और सीढियाँ उतरने लगी वैदिक ने जब उसे देखा तो देखता ही रह गया पहली बार रिमझिम को इस तरह तैयार हुए साड़ी पहने जो देखा था। क्या हुआ रिमझिम ने वैदिक के पास आकर पूछा ,  कुछ नही वैदिक ने कहा। जैसा वैदिक ने सोचा था पार्टी वैसी ही रही तुलसी जी खुश भी थी और थोड़ी शर्मा भी रही थी मेरी नही तेरी उम्र है बेटा बर्थडे पार्टी करने की सुबह से वो वैदिक से यही कहे जा रहीं थी पर वैदिक ने तो ठान लिया था कि इस बार माँ के जन्मदिम को खास बनाना है। 

अगर हम समय को रोकना चाहें तो क्या रुकेगा बिल्कुल नही उसका काम तो चलने का है और वो चलता जाएगा तीन दिन बित गए थे इन तीन दिनों में वैदिक कुछ बदला हुआ सा लगा रिमझिम से जब भी बातें करता तो कुछ अलग ही लगता जैसे उसके मन में कुछ चल रहा हो। पहले तो उसकी बातों में कुछ- कुछ झूठ भी घुला हुआ सा नज़र आता था पर अब तो हर एक शब्द सच्चा सा लग रहा था कल रात की बात है वैदिक को घर मे अच्छा नही लग रहा था तो छत पर चला आया रिमझिम ने उसे जाते देख लिया था तो वो भी पीछे - पीछे चली आई क्या? हुआ वैदिक तुम ठीक तो हो कुछ परेशान हो क्या ? तुम्हें यहाँ आते हुए देखा तो पूछने चली आई , हाँ ठीक हूँ सब ठीक है बस घर के अंदर अच्छा नही लग रहा था इन तारों के बीच खुली हवा में साँस लेना चाहता था तो आ गया। मैं बचपन मे बहुत शरारती था बहुत मस्ती किया करता था मुझे ना दूसरे को बेवकूफ बनाने में बड़ा मज़ा आता था क्योंकि मेरे लिए वो खेल था तब मैं ये नही समझ पाता था कि खेल तो वो मेरे लिए है सामने वाले के लिए तो वो सच ही है ना। तो तुम बचपन की शरारत को याद करके दुखी हो रहे हो बचपन मे तो सभी शैतानी करते है छोड़ों मत सोचों बीती बातों को, देखो तारों को कितनी तेज़ चमक रहे है तुम कौनसा वाला तारा हो वो जो धीमे - धीमे चमक रहा है या वो जो तेज चमक रहा है मैं तो वो वाला तारा हूँ जो चाँद के पास है कहकर रिमझिम हँसने लगी तो वैदिक ज़रा सा मुस्कुरा दिया। आज वैदिक को आये 13 दिन हो गए है शाम को छत पर वैदिक बड़ी ही बेसब्री से रिमझिम के आने का वेट कर रहा था कुछ देर बाद रिमझिम आ गई। कुछ कहना था तुमसे झिझकते हुए वैदिक बोला , हाँ कहो ना रिमझिम ने कहा। इसके बाद वैदिक ने रिमझिम को सब सच-  सच बता दिया कि ये दोस्ती और जो दोस्त बनकर इतनी सारी बातें उसने रिमझिम से की वो सब कुछ झूठ था ये तो बस एक मज़ाक था जोकि कुछ ज्यादा ही आगे बढ़ गया सॉरी मेरा इरादा तुम्हें हर्ट करने का नही था मुझसे गलती हो गई सॉरी। 1 अप्रैल वाले दिन जब उस बच्चे ने वैदिक को अप्रैल फूल बनाया था तभी वैदिक के दिमाग मे भी ये आइडिया आया था। कि क्यों ? ना इस बोरिंग रिमझिम को भी अप्रैल फूल बनाया जाए बड़ा मज़ा आएगा बस यही सोचकर वैदिक ने ये नाटक शुरू किया था जोकि आज खत्म हो गया। जब सब कुछ साफ- साफ हो जाता है तब भी एक शांति सी छा जाती है वैदिक कह कर चुप हो गया था मन ही मन उसे बहुत बुरा लग रहा था रिमझिम से आँखे मिलाने की भी हिम्मत नही हो रही थी उसकी और रिमझिम सब कुछ सुनकर खामोश खड़ी थी। 15 मिनट की खामोशी के बाद रिमझिम बोली वैदिक मेरे दोस्त बनोगे चाहो तो मेरी डायरी और पढ़ सकते हो कहते हुए रिमझिम मुस्कुरा दी। आँटी के कहने पर जब तुम मेरे रूम में फूल लेने गए थे तब तुमने मेरी डायरी भी देखी थी है ना और शायद उसे पढ़ा भी था इसीलिए तुम्हारी बातें कुछ- कुछ वैसी थी जैसा की डायरी में लिखा हुआ था मैं तो पहले ही समझ गई थी इतनी भी बुद्धू नही हूँ जितना कि समझते हो और हाँ मेरे लिए ये दोस्ती अभी भी है। इतना तो जान लिया है तुम्हें, कि तुम झूठे हो या सच्चे हो पर दोस्त तो तुम अच्छे हो। मुझे स्कूल भी जाना है बाय कहकर रिमझिम चली गई। इसके बाद के दो दिन वैदिक और रिमझिम ने अच्छे और सच्चे दोस्त की तरह बिताए और फिर फाइनली वो दिन आ गया जिस दिन वैदिक को वापस जाना था। रिमझिम कुछ कहना था तुमसे वैदिक बोला, फिर से अब क्या कहना है रिमझिम ने पूछा। कुछ सेकेंड सोचने के बाद वैदिक बोला कुछ नही जब नेक्स्ट टाइम आऊँगा तब कहूँगा , ठीक है अब जाओ स्टेशन नही तो तुम्हारी ट्रेन छूट जाएगी रिमझिम ने मुस्कुराते हुए कहा। जाते - जाते वैदिक ने दोबारा पलट कर माँ और रिमझिम को देखा और फिर चला गया। वैसे जाते वक्त वैदिक खुश नज़र नही आ रहा था थोड़ा उदास था वो , ये सोचकर कि रिमझिम को देखे बिना कहीं मन कैसे लगेगा अब इस सारे नाटक के चक्कर मे वैदिक रिमझिम को तो फ़ूल नही बना पाया पर खुद जरूर अपना मन हार गया अब रिमझिम अच्छी जो लगने लगी थी उसे। 


 

अप्रैल फूल




मार्च की धूप भी मई - जून की धूप से कुछ कम नही लग रही है दोपहर के 3 बज रहे है दूर - दूर तक रास्ते पर कोई नज़र नही आ रहा वैसे भी किसकी हिम्मत होगी ऐसी दोपहर में घर से बाहर आने की, सिवाय इसके खिड़की से बाहर देखते हुए वैदिक बोला। जाने किस तरह की है ये लड़की इतनी धूप में हाथ में छाता लिए कैसे धीरे- धीरे चलकर आराम से आ रही है। धूप से जैसे इसे कोई फर्क ही नही पड़ रहा। रिमझिम को कॉलोनी में आये दो साल हो गए है पर अभी तक शायद ही कोई जान पाया हो की रिमझिम है कैसी?, क्योंकि मैं भी अपनी छुट्टियों में ही कुछ दिनों के लिए अपने घर आता हूँ इसलिए बातचीत तो मेरी भी कभी ज्यादा हुई नही है रिमझिम से पर मुझे लगता है कि ये अपने काम को लेकर कुछ ज्यादा ही डेडिकेटिंग है तभी तो फेस्टिवल या समर वैकेशन पर कभी अपने घर नही जाती और शायद कुछ ज्यादा ही सिंपल है हमेशा एक जैसी ही तो नज़र आती है कोई चेंज नही कहते हुए वैदिक ने खिड़की बंद कर ली।  
रिमझिम छाता ताने धूप में चलते हुए घर के पास आ पहुँची उसने अपना छाता बंद किया और दरवाज़ा खटखटाने वाली थी कि उससे पहले ही दरवाज़ा खुल गया। वैदिक, हाय कब आये तुम ,वैदिक चाबी देते हुए बोला रात में ही आया हूँ। ओह! अच्छा। वैसे अच्छा हुआ तुम आ गए आंटी तुम्हे मिस कर रहीं थी कहकर रिमझिम सीढियाँ चढ़कर ऊपर वाले फ्लोर पर चली गई। रिमझिम को वैदिक की मम्मी ने ऊपर वाला फ्लोर किराए पर दिया हुआ है वैसे तो वैदिक की मम्मी अजनबियों पर भरोसा नही करती है पर जब रिमझिम उनसे मिली तो शायद रिमझिम उन्हें भरोसेमंद लगी। रिमझिम है भी बहुत ही ईनामदार भरोसे के क़ाबिल ,वैदिक की माँ तुलसी जी कभी - कभार रिमझिम को भी मार्केट के थोड़े बहुत सामान की लिस्ट थमा दिया करतीं है और रिमझिम स्कूल से आते हुए लिस्ट में लिखे सामान को लेकर आती है। इस तरह रिमझिम तुलसी आँटी की कुछ- कुछ कामो में मदद कर दिया करती है वैसे भी रिमझिम के अलावा और कोई रहता भी तो नही जिससे वो अपने ये छोटे- मोटे काम करा सकें वैदिक दिल्ली में रखकर जॉब करता है और वैदिक के पापा ऑफिस के कामो से ज्यादातर टूर पर ही रहते है इस तरह तुलसी जी अकेली ही रहती है वो तो रिमझिम जब से आई है तब से उन्हें अकेलेपन का एहसास नही हुआ उन्हें वो किसी अपने की तरह लगती है तभी तो तुलसी जी भी रिमझिम का बड़ा ख्याल रखती है जब भी खाने में कुछ स्पेशल बनाती है तो रिमझिम को आवाज जरूर लगाती है। 
शाम को वैदिक छत पर टहलते हुए गाने सुन रहा था रिमझिम रस्सी पर से सूखे कपड़े उठा रही थी रिमझिम तुम्हें धूप बहुत पसंद है वैदिक ने पूछा,  ऐसा क्यों पूछ रहे हो रिमझिम बोली। वो तुम रोज़ धूप में इतने आराम से चलकर आती हो तो देखकर लगा शायद तुम्हे गर्मी में भी धूप अच्छी लगती है। वैदिक की बात सुन रिमझिम ज़रा सा मुस्कुरा दी। स्कूल की टीचर्स को छुट्टियाँ नही मिलती क्या? वैदिक ने फिर पूछा , मिलती है पर स्कूल में समर क्लासेस भी होती है तो कुछ टीचर्स छुट्टी पर नही जाते  रिमझिम जवाब देते हुए बोली। और शायद उन कुछ टीचर्स में से तुम वो टीचर हो जो कभी छुट्टी पर नही जाती, है ना वैदिक ने हँसते हुए कहा तो रिमझिम ने बड़े धीरे से हूँहहह कह दिया इसके बाद वैदिक रिमझिम से समरक्लासेस के बारे में पूछने लगा और फिर अपने ऑफिस की बातें रिमझिम को बताने लगा तब उसकी बातों पर विराम लगाते हुए रिमझिम बोली वो मुझे और भी बहुत काम है तो मैं कभी और तुम्हारी बातें रिमझिम ने इतना कहा तो वैदिक बोला हाँ , हाँ जाओ वो मुझे खुद भी एक इम्पोर्टेन्ट कॉल करना है , ओके रिमझिम बोलकर चली गई। मुझे और भी बहुत काम है वैदिक रिमझिम की नकल करते हुए बोला, जैसे मैं तो बहुत फ्री हूँ मुझ जैसे स्मार्ट लड़के की बातें इसे इंटरेस्टिंग नही लगी तो बाकी सबकी बातें तो इसे बोरिंग ही लगती होंगी तभी इसका इतने दिनों में कोई फ्रेंड नही बना जबकि खुद बोरिंग है। ये विवान भी ना इसे अभी ही ट्रिप पर जाना था कोई बात करने वाला भी नही है बोर हो रहा हूँ मैं। वैदिक जब भी अपने घर आता है तो बचपन के दोस्त विवान के साथ खूब मज़े करता है लेकिन इस बार वैदिक ने अपने आने की ख़बर विवान को दी नही सोचा सरप्राइज देगा पर उसे खुद ही यहाँ आकर सरप्राइज़ मिल गया जब उसे मालूम हुआ कि विवान तो किसी ट्रिप पर गया है।
सुबह की ठंडी हवा में वॉक करते हुए वैदिक का मन जोकि कल अपने दोस्त को मिस करते हुए उदास हो रहा था वो अभी ज़रा हैप्पी हैप्पी सा था सुबह की ठंडी- ठंडी हवा में जादू ही कुछ ऐसा होता है कि तन को छूते ही मन को तरोताजा कर देती है।  तभी तो वैदिक रोज सुबह की वॉक पर जरूर जाता है वैदिक वॉक से लौट रहा था और तभी कॉलोनी के एक बच्चे ने उसे आवाज़ लगाई भईया, भईया वैदिक आवाज सुनकर पलटा हाँ क्या हुआ , अरे भईया आपका मोबाइल गिर गया है खबराते हुए उस बच्चे ने कहा , वैदिक जल्दी से रास्ते पर देखने लगा अप्रैल फूल बनाया कहते हुए वो बच्चा जोर से हँसने लगा और फिर दौड़कर अपने दोस्तो के पास चला गया। ओह! तो आज 1 अप्रैल है बचपन मे हमने भी सबको खूब अप्रैल फूल बनाया है  कहते हुए वैदिक मुस्कुराया और घर के अंदर आ गया , वैदिक मम्मी सुबह की पूजा की तैयारी कर रही थी वैदिक को देखते ही बोली वैदिक बेटा ऊपर जाकर रिमझिम के कमरे से फूल ले आना वो टेबल पर रखकर गई है बस आज मुझे देना भूल गई ये ले चाबी जा लेआ। अरे माँ मैं अभी तो आया हूँ अच्छा ठीक है लेकर आता हूँ वैदिक ने ताला खोला और कमरे के अन्दर आ गया पूरा कमरा बहुत अच्छे से जमा हुआ था हर चीज़ अपनी जगह पर थी कुछ भी बिखरा हुआ नही था। टेबल पर एक छोटी सी टोकरी में फूल भी रखे हुए थे वैदिक टेबल के पास पहुँचा टेबल पर कुछ किताबें रेसेपी बुक ड्रॉइंग शीट्स कलर्स  और एक सुंदर सी अलार्म घड़ी थी। वैदिक ने टेबल पर रखी बुक्स उठाकर देखी और वापस वैसे ही रख दी जैसी वो रखी हुई थी और फिर फूलों की टोकरी लेकर चला गया। 
आज वैदिक को आये 13 दिन हो गए हैं वैदिक और रिमझिम दोनों एक साथ छत पर थे दिन ढल गया था और शाम हो गई थी एक गहरी खामोश शाम, ना पेड़ों के पत्ते हिल रहे थे ना हवा चल रही थी और ना पक्षियों की कोई आवाज थी रिमझिम और वैदिक दोनों के चेहरे के भाव भी ज़रा गम्भीर थे और दोनों ही खमोश थे। 


[ पूरी कहानी अगले भाग में]

जाने छुपा कहाँ वो रास्ता


जाने छुपा कहाँ है वो रास्ता जो जाता है वहाँ, जहाँ मंज़िल है मेरी , जहाँ मेरा छोर है। बीचों- बीच मे हूँ खड़ा, देख रहा हूँ यहाँ - वहाँ जाने वो किस ओर है। आखिर क्यों ये धुंध छाई है दिखता नही कुछ साफ दिखाई है, ये कोहरा है छाया या मुझसे रस्ता है भुलाया। मैं अकेला रास्ते अनेक इनमें से कैसे चुनूँ कोई एक। कैसे जानूँ कैसे पहचानूँ सब ओर नज़र घुमा रहा हूँ सारे रास्ते एक जैसे ही पा रहा हूँ। क्या करूँ ? सही रास्ता ढूँढ़ने की कोशिश करूँ या किसी भी एक रास्ते पर चल पडूँ। जैसे ही कदम बढ़ा रहा हूँ मैं थोड़ा- थोड़ा डरता जा रहा हूँ। मन मेरा हिचकियाँ खा रहा है पूछ रहा है मुझसे - तू सही तो जा रहा है। शंकाये भर- भरकर मस्तिष्क में आ रही है एक - एककर वो मेरे मन से कुछ कहती जा रही है। अब थोड़ा घबराया सा इस सोच में पड़ा हूँ ये मैं कहाँ खड़ा हूँ , धुँआ- धुँआ सा सब नज़र है आता ना जाने कौन सा रास्ता किधर को है जाता। कितनी उलझन है भाई आख़िर क्यों? किसी को मंजिल की राह सीधे- सीधे नज़र नही आई। मुश्किल है मंजिलों के रास्ते पाना , बड़ा कठिन है अनजानी राहों पे जाना। भले ही डरते - डरते मैंने एक कदम ही है आगे बढ़ाया, पर मैं भी हूँ अब ज़िद पे आया। "ढूंढ़ लूँगा मैं वो रास्ता छिपा चाहे वो जिस ओर है जो जाता है वहाँ ,जहाँ मंजिल है मेरी , जहाँ मेरा छोर है।" 


बस के इंतज़ार में


ठंडी हवा ज़रा भी हाथों से टकराती तो सारे बदन में कपकपी सी दौड़ जाती लग रहा था जैसे बस स्टेशन पर नही किसी बर्फीले पहाड़ पर बैठा हूँ जहाँ हर तरफ ठंडी ठंडी और बहुत ठंडी हवाएँ चल रही है और मैं ठंड से काँपे जा रहा हूँ हाँ मेरा हाल सचमुच कुछ ऐसा ही तो हो रहा था। बस स्टेशन पर बैठे हुए मुझे बहुत ठंड लग रही थी वैसे मेरे आस- पास जो लोग थे वो भी मेरी तरह ठंड से काँप रहे थे पर फिर भी मुझे लग रहा था जैसे ये ठंडी हवाएँ मुझे ही परेशान कर रही हों, मैंने अपने पैरों को सिकोड़ लिया और अपने हाथों को जैकेट की पॉकेट में डालकर बैठ गया ऐसा मेरे साथ ही क्यों होता है जब भी मुझे कहीं जाना होता है ये मौसम खराब हो जाता है पिछली बार बारिश की वजह से ट्रेन लेट आयी और अब कोहरे ने बस का टाइम बदल दिया। लगभग 20 मिनिट गुज़र चुके थे देखते- देखते सूर्यदेव आँखों से औझल हो गए और शाम ने बादलों पर अपना रंग चढ़ाना शुरू कर दिया हवा अब और भी ठंडी हो गई थी। मैं और बाकी सारे यात्री खामोश से बैठे नजरों को ईथर- उधर दौड़ाते हुए वक्त काटने की कोशिश कर रहे थे तुम आजकल के नौजवान तो जाने कैसे हो छोटी सी बात पर भी ऐसे मुँह लटकाकर बैठ जाते हो जैसे कोई बहुत ही बड़ी बात हो गई हो मेरे पास ही बगल में बैठे अंकल जी ने कहा तो मैं ज़रा सा मुस्कुरा दिया बिल्कुल ऐसे जैसे मुझे जबरन मुस्कुराने को कहा गया हो। देख रही हैं आशा जी आज की युवा पीढ़ी को, कितनी कमज़ोर है मन से भी और तन से भी अंकल जी ने अपने हाथ मे पकड़े हुए पर्स में देखते हुए कहा तो मैंने थोड़ा चिढ़ते हुए पूछ लिया अच्छा कैसे?। तब अंकल जी बोले, बस देर से आएगी ये जानकर तुम ऐसे उदास होकर बैठ गए हो जैसे बस नही मानो तुम्हारी प्रेमिका हो जिसने वादा तो 4 बजे आने का किया था पर आ 5 बजे रही है और देखो ज़रा खुदको ठंड से कैसे काँप रहे हो जैसे साठ साल की उम्र मेरी नही तुम्हारी हो गई हो। अंकल जी की बात सुन मुझे हँसी आ गई जाने क्यों मुझे अपनापन लगा और मैं थोड़ा सा मुहँ बनाते हुए बोला बस के लिए अभी 1 घन्टे हमे इंतज़ार करना है वो भी ऐसी ठंड में ये जानकर कौन खुश होगा भला और आप कह रहे है कि हम आजकल के नौजवान बड़े कमज़ोर है तो अंकल जी आप बताइये जब आप हमारी उम्र में थे तो कैसे? थे अपनी भौंहों को ऊपर उचकाते हुए मैंने पूछा। हम , हम तो बहुत स्ट्रॉग थे बल्कि अभी भी है ही। तुम जैसे ठंड से काँप रहे हो ना, अरे ऐसी ठंड में हम तो स्वेटर ही नही पहना करते थे और ठंड हमारा कुछ भी नही बिगाड़ पाती थी और उदास होना क्या होता है जैसे हमे पता ही नही था। अंकल ने कहा तो उनकी बातों पर मैं डाउट करते हुए बोला अच्छा सच में तब अंकल बोले हाँ , हाँ सच मे। अच्छा और कैसे थे आप मतलब क्या - क्या खूबियाँ रही है आप मे। अब खुद के मुहँ से खुदकी क्या तारीफ़ करें पर जो सच है वो सच है। मैं बचपन से ही बड़ा निडर था किसी से भी नही डरता था पिताजी से भी नही, जबकि पिताजी सख्त स्वभाव के थे उन्होंने जो कह दिया तो बस वही होना है लेकिन मैं भी ज़िद्दी स्वभाव का था इसलिए अपने भाई - बहनों में सबसे ज्यादा पनिशमेंट मुझे ही मिला करती थी। लेकिन स्कूल में मैं मास्टरजी का बड़ा ही चहेता था होनहार स्टूडेंट जो था मुझे मेरा गाँव, गाँव का घर , स्कूल , मेरे दोस्त सब बहुत अच्छे लगते थे पर मेरे बारहवीं पास करते ही पिताजी हम सबको लेकर शहर में आ गये। कुछ दिनों तक गाँव की याद आई पर धीरे- धीरे शहर की आदत हो गई और फिर कॉलेज में एडमिशन हो गया था तो पढ़ाई में भी बिज़ी हो गये। ओह! तो क्या आपने सिर्फ़ पढ़ाई और पढ़ाई की है, कॉलेज लाइफ इंजॉय नही की क्या? अच्छा ये तो बताइए आप कॉलेज कैसे जाया करते थे स्मार्ट कूल बॉय की तरह या फिर सिंसियर स्टूडेंट की तरह। नही नही हम तो हमेशा अच्छे स्टूडेंट की तरह ही कॉलेज जाते थे और एक दम साधारण रहते थे पर फिर भी जब हम क्लास में इंटर हुआ करते थे तो कितनी ही नजरें अपने - आप हमारी ओर मुड़ जाया करतीं थी पर मजाल है जो हमारी नज़र किसी की ओर हो जाये। क्यों? आपको किसी से दोस्ती करना पसंद नही था क्या या फिर आप अकड़ू थे मैंने पूछा। अरे! नही ऐसी कोई बात नही थी दरसल पिताजी ने पहले ही सख्ती से साफ कह दिया था कि शहर आये है इसका मतलब ये नही की यहाँ के रंग-  ठंग में ढल कर बिगड़ जायें और अपने संस्कार ही भूल जाये कॉलेज पढ़ाई करने जाना है दोस्ती यारी करने नही। ओह तो आपका कोई फ्रेंड नही था और जब कोई फ्रेंड ही नही था तो गर्लफ्रैंड क्या होगी मैंने थोड़ा धीमे शब्दों में कहा। तब अंकल जी ने मेरी ओर देखा और कहने लगे न , ना उदास मत हो कहानी तो अभी बाकी है। मैं झट से खुश होते हुए बोला हाँ तो फिर सुनाइये ना। हाँ तो सुनो, जब हम अपनी क्लास में होते थे तो बिल्कुल एक सभ्य स्टुडेंट की तरह पढ़ाई किया करते थे और जैसे ही क्लास से निकलकर केंटीन की और बढ़ते तो घनश्याम से बस श्याम रह जाते, बचपन मे मैंने कब पिताजी की सारी बातें मानी थी जो अब मानता। वो जो कहते थे वो मैं करता था पर जो मेरा मन कहता था मैं वो भी किया करता था। एक या दो नही हमारे बहुत सारे दोस्त थे और सबके -सब शैतान शरीफ़ कोई भी नही था सिवाये हमारे, तभी तो जिम्मेदारी भरा काम हमे ही सौंपा जाता था। जिम्मेदारी भरा काम, ये कौन सा काम था मैंने अंकल जी से पूछा तब अंकल जी मुस्कुराते हुए बोले अब लग रहा है कि तुमने अपनी कॉलेज लाइफ में कोई जिम्मेदारी वाला काम नही किया। मैंने पूछा क्यों , तभी तो सवाल कर रहे हो ना अंकल जी बोले। अरे भई अपने दोस्तों के प्रेम पत्रों का आदान- प्रदान करना बड़ी ही जिम्मेदारी का काम होता है जोकि हर किसी को नही सौंपा जाता जिस पर भरोसा होता है उसे ही ये काम दिया जाता है, अपने दोस्तों में मैं ही सबसे ज्यादा भरोसेमन्द था , मेरे दोस्तों को इस बात का पूरा यकीन था कि मैं उनके लेटर्स कभी खोलकर नही पढूँगा। सच मे आपने कभी कोई लेटर खोलकर नही देखा था मैंने ज़रा शक्की निगाहों से देखते हुए पूछा तब अंकल जी बोले नही , नही हम अपने दोस्तों का यकीन कैसे तोड़ सकते थे भला। मतलब आप तो वाकई में एक बहुत ही ईमानदार दोस्त रहे है वैसे आपने भी कभी खुदके हाथों से किसी के लिए स्नेह भरा पत्र लिखा था कि नही। साफ - साफ पुछलो ना कि हमारी कोई प्रेमिका थी कि नही, नही थी। पर कोई तो होगी ना जो आपको अच्छी लगी होगी जिसे देखते ही आपके मन की कलियाँ खिल उठती होंगी, हाँ आपके चेहरे के एक्सप्रेशन्स देखकर लग रहा है कि कोई तो थी देखिए कैसी  धीमी- धीमी मुस्कान आ रही है होंठो पर अब बता भी दीजिए। तब अंकल जी हल्के से इतराने वाले एक्सप्रेशन देते हुए बोले अगर ये अभी भी वही कॉलेज वाला वक्त होता तो हम बताते नही क्योंकि हमने तो तब भी किसी को अपने मन की खबर होने नही दी थी पर चलो आज तुम्हें बताते है तो सुनो- उसका नाम लता था भूरी- भूरी आँखें भूरे- भूरे बाल और पतली सी उसकी आवाज़, क्लास की टॉपर थी वो, पर क्लास में किसी से ज्यादा बात नही करती थी बस उसकी दो- तीन सहेलियाँ थी जो साये की तरह हर पल उसके साथ ही रहती थी और उन्ही के साथ वो ग्रूप स्टडी किया करती थी। इसलिए उससे बात हो पाना जैसे ना के बराबर ही रहता था।वो तो जब हमारे सीनियर्स की फेरवल पार्टी थी तब लता और मैंने ही एंकरिंग की थी उसी दौरान थोड़ी बहुत बात - चीत हुई थी हमारी। उस दिन लता ने जो हरे रंग की साड़ी पहनी थी उसमे वो बहुत सुंदर लग रही थी मन कर था कि उसकी तारीफ कर दूँ पर फिर मैं हिचकिचा गया। आपने लता जी को अपने मन की बात कब?  बताई। हमारे सीनियर के फेयरवेल से खुद हमारा फेयरवेल आ गया पर अपने मन की बात कहने की हिम्मत मैं जुटा ही नही पाया लता क्या कहेगी इस बात की फिक्र से ज्यादा डर इस बात का था कि पिताजी को पता चल गया तो क्या होगा। फिर। फिर क्या ग्रैजुएशन पूरा हो गया और सब अपने - अपने रास्ते चले गये। ओह! मैंने निराशा के भाव से कहा। अभी 15 मिनट और थे बस आने में मैं उठा और हम दोनों के लिए चाय ले आया। आपके पर्स में जो तस्वीर लगी हुई है जिन्हें आप आशा जी कह रहे है वो आपकी वाइफ की है , है ना। हाँ कहते हुए अंकल जी ने अपना पर्स निकाला और मुझे तस्वीर दिखाते हुए बोले ये हमारी पत्नी की फ़ोटो है। हमारी अरेंज मैरिज हुई थी आशा जी से शादी के बाद ही हमने ये जाना कि लता सिर्फ पसन्द थी हमारी, जो आँखों को भा गई थी कुछ और ज़्यादा था ही नही और आशा जी वो तो जब से जीवन मे आई तो ऐसा लगा ही नही की हम दो अजनबी है जो अभी - अभी एक रिश्ते में बंधे हो लगा जैसे हम हमेशा से साथ ही तो थे। मतलब आपको आपकी रियल ड्रीम गर्ल मिल गई थी। हाँ मिल गई थी और उनके आने से हमारी दुनिया पूरी तरह बदल गई थी जो भी हमे देखता हमारी खूब तारीफ करता कि वाह! क्या जोड़ी है और हम खुशी से मुस्कुरा देते और ऐसे ही खुशी - खुशी कई साल हमने साथ बिता दिये। स्वीट स्टोरी मैंने स्माइल करते हुए कहा और फिर रास्ते की ओर देखने लगा। कुछ पल चुप बैठा रहा इसके बाद मैंने अंकल जी से पूछा अंकल आप घर देर से पहुँचेंगे तो क्या आँटी आप पर नाराज होंगी मेरे ऐसा पूछने पर वो बोले नही जब मैं घर पहुँचूँगा तो ना कोई नाराज़ होने वाला होगा और ना ही ये पूछने वाला की देर कैसे हो गई। क्यों ? मैंने पूछा। अंकल जी चेहरे के भाव अब अचानक बदले नज़र आये।उन्होंने कहा क्योंकि चार साल पहले ही आशा जी हम से दूर हो गयीं वो हमे छोड़कर चलीं गयी, पर लगता नही है कि वो हमारे पास नही है हमे तो हर पल साथ होने का एहसास होता है। अंकल की बात सुन मैं ज़रा दुखी हो गया बहुत बुरा लग रहा था मुझे उनके लिए, स्वीट स्टोरी का शायद ये सेड टर्न था। आपको आंटीजी की याद आती होगी ना, नही बिल्कुल नही याद तो तब आयेगी जब मैं उन्हें भूलूँगा और आशा जी,  वो तो कभी हमें खुदको भुलाने नही देंगी गहरी साँस भरते हुए अंकल जी ने कहा। मैं फिर कुछ पल खामोश होकर बैठ गया पर अंकल कुछ गुनगुना रहे थे शायद आँटी को याद कर गुनगुनाने लगे। फिर कुछ देर बाद मुझसे बोले अरे! इतना दुखी सा चेहरा मत बनाओ देखो शाम कितनी सुहानी लग रही है और तुम्हारी बस भी आने ही वाली है तो अब खुश हो जाओ हँसते हुए अंकल ने कहा तो मैं उनकी ओर देखने लगा। ओह हो ऐसे क्यों देख रहे हो, तुम आजकल के बच्चे भी ना बड़ी जल्दी इमोशनल हो जाते हो चलो एक राज़ की बात बताता हूँ हमारे दोस्तों के जो प्रेमपत्र थे ना वो सब हमने चोरी से पढ़ लिये थे और एक बार हमने भी लता को प्रेम पत्र देने की कोशिश की थी पर वो गलती से उसकी सहेली आशा के पास पहुँच गया , फिर क्या हुआ । फिर , प्यार हुआ इकरार हुआ और आशा जी और हमारी शादी हो गई। अंकल की बात सुन मैं कुछ कन्फ्यूज़ सा हो गया वो ऐसे आराम से कह रहे थे जैसे उन्होंने कुछ अजीब कहा ही न हो , लो भई बस आ गई चलो अब। आज आशा जी बड़ा नाराज़ होंगी हम पर। क्या?  मैंने चौंकते हुए कहा तब अंकल जी मुझे देखते हुए बोले बेटा ऐसी ठंड में बैठकर 1 घन्टे बस का इंतज़ार करना कोई आसान थोड़ी ना है इसलिए मैं तुम्हें कहानी सुनाने लगा, इससे हम दोनों का वक्त भी कट गया और ठंड का एहसास भी जरा कम रहा। अब कहानी में कही सारी बातें हमेशा सच्ची हो ऐसा जरूरी तो नही, सामने वाला हमारी कहानी मन लगा के सुने इसलिए बहुत कुछ खुद की तरफ से भी जोड़ना पड़ता है फिर चाहे वैसा हुआ हो या ना हुआ हो कहकर अंकल जी ज़ोर से मुस्कुरा दिये पहले तो उनकी बात सुन मैं सोच में पड़ गया और फिर सब समझ आते ही मैं भी धीरे से मुस्कुरा दिया। अंकल जी से मेरी ये मुलाकात बड़ी दिलचस्प रही और यादगार भी। 

एक चुटकी प्रेम

मार्च बित गया था ठंड के नख़रे अब कम हो गए थे कम क्या यूँ कहें कि अब खत्म ही हो गये थे सूरज के तीखे तेवर जो शुरू हो गये थे। अब गर्मागर्म पकोड़े...

Sonal bhatt MULAKAT-KAHANIYO-SE STORY OF OUR LIFE