साथी



वो रेड जैकेट रख ली थी ना और मेरे ग्लब्स अच्छा वो गॉगल्स जो परसो लेकर आया था और वो स्कार्फ जो मैं तुम्हारे लिए लाया था हाँ ,हाँ सब रख लिया मनन के बार - बार पूछने पर चिढ़ते हुए काव्या ने कहा। मनन जब से हम ट्रेन में बैठे है तब से तुम बस कुछ न कुछ पूछ ही रहे हो ये रखा कि नही वो रखा की नही, हम हनीमून पर जा रहे है कोई हमेशा के लिए रहने नही जा रहे है सुबह से अभी तक एक बार भी गौर से देखा मुझे काव्या रूठते हुए बोली ओह! सॉरी कब्बू तुम बहुत खूबसूरत लग रही हो ये ड्रेस तुम पर अच्छी लग रही है मनन ने काव्या को मनाते हुए प्यार से कहा तो काव्या धीमे से मुस्कुरा दी। काव्या का हाथ थामते हुए मनन ने अपनी उंगलियाँ काव्या की उंगलियों में फसा ली और काव्या ने अपना सिर मनन के कंधे से टिका लिया। शादी के बाद सब कुछ कितना अलग सा लगने लगता है एक नया रिश्ता नया सफर आँखों मे मीठे- मीठे सपने ,काव्या और मनन की आँखें भी अपनी नई जिन्दगी के लिए सपने बुन रही है। काव्या तुम खुश तो हो ना, हाँ और तुम , मेरी खुशी तो तुम ही हो आय प्रॉमिस मैं तुम्हे कभी दुखी नही होने दूँगा हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगा कहते हुए मनन ने काव्या का हाथ कसकर पकड़ लिया मैं जानती हूँ मनन, मनन की आँखों मे देखते हुए काव्या ने कहा, अच्छा अब ज्यादा मत सोचो मेरे प्यारे पतिदेव कहते हुए काव्या ने दोबारा मनन के कन्धे से अपना सिर टिका लिया। मुझे पता है मनन तुमने ये सवाल क्यों किया पर कुछ जवाब अधूरे ही सही होते है मनन से टिककर बैठी काव्या मन मे सोच रही थी। आधे घन्टे बाद ट्रेन एक स्टेशन पर रुकी काव्या मैं अभी आता हूँ मनन ये कहकर ट्रेन से उतर गया काव्या खिड़की से बाहर स्टेशन पर खड़े लोगो को देख रही थी तभी उसकी नजर लड़के- लड़कियों के एक ग्रुप पर पड़ी देखने मे कॉलेज स्टूडेंट्स लग रहे थे इन्हें देख काव्या को सपने स्कूलटाइम का वक्त याद आ गया। हमारा भी तो स्कूल में ऐसा ग्रुप बना हुआ था जिसमे मैं और मनन भी थे। स्कूल यूनिफार्म में दो चोटी बाँधे हुए स्कूल बैग टांगे हुए कितने घमंड के साथ मैं क्लास में इंटर होती थी पूरी क्लास में सबसे होशियार जो थी पढ़ने में, इस बात का बड़ा गुमान था मुझे। पढ़ाई में तो मनन भी अच्छा था पर मेरे जितना अकड़ू नही था। शुरू में दोस्ती नही थी हमारे बीच बस क्लासमेट थे लेकिन बाद में दोस्त बन गए और शायद ज्यादा ही खास दोस्त। काव्या ये लो अच्छा कॉफ़ी लेने गए थे हाँ तुम्हारे लिए कॉफ़ी अपने लिए चाय और ये और भी कुछ लाया हूँ रखलो मनन ने पैकेट काव्या को दिया ओके कहते हुए काव्या ने पैकेट बैग में रख दिया। इसके बाद मनन मोबाइल पर बुक की हुई होटल की कुछ डिटेल्स वगैहरा चेक करने लगा और काव्या फिर अपनी स्कूल में जा पहुँची। 

क्लास कि होशियार लड़की जिसका मन किताबों में लगा रहता था अब कुछ - कुछ कहीं और भी लगने लगा था मेरी नज़रे जो किताब कॉपियों में ज्यादा ठहरी रहती थी वो थर्ड रो में फोर्थ बैंच पर बैठे मनन की ओर दौड़ने लगी थी जैसे कोई डोर मुझे खींच रही हो उसकी ओर।इस कच्ची उम्र में ये कौनसा पक्का रिश्ता बनने लगा था मेरे और मनन के बीच ये सोचकर में परेशान हो रही थी ये सब क्या हो रहा है मैं मनन के बारे में इतना क्यों सोचने लगी हूँ हम दोनों दोस्त ही तो है फिर क्यों कुछ अलग सा लगता है। तीन दिन हो गये,  मैंने मनन को अनदेखा करने की कोशिश की ना उससे बात की और ना उसकी तरफ देखा मेरे ऐसे बर्ताव से मनन को बहुत बुरा लगा और मुझे उससे भी ज्यादा। इसके बाद मनन खुद मुझसे दूर हो गया उसने मुझसे बात करना जैसे पूरी तरह ही बंद कर दिया बिल्कुल भी बात नही करता था वो मुझे से हाय हेलो भी नही, आज तो लंच भी वो अकेले क्लास में बैठकर कर रहा था जबकि बाकी हम सब बाहर ग्राउंड में पेड के नीचे, साथ में बैठकर अपना लंच कर रहे थे। अब मेरी और मनन की दोस्ती टूट रही थी बहुत दुख हो रहा था मुझे ये देखकर। काव्या, मेरी सबसे अच्छी दोस्त आरती ने धीरे से कहा मुझे लगता है तुझे एक बार मनन से बात कर लेना चाहिए जो भी बात है उसे समझाएगी तो शायद वो समझ जाये। शायद आरती ठीक कह रही है अपना लंच बॉक्स आरती को देकर में क्लास में चली आई। गुस्सा हो मैने मनन से पूछा, नही तो मनन ने कहा , तो फिर बाहर क्यों नही आये, वो तुम नाराज़ हो ना बस इसलिए , तुम्हारा गुस्सा होना मुझे अच्छा नही लग रहा है बुरा- बुरा सा लग रहा है मनन ने इतना कहा तो मेरी आँखों मे पानी की बूंद भर आई सॉरी मनन मैं तुम्हे दुख नही पहुँचना चाहती थी कहते हुए मैैं रो पड़ी क्या ? हुआ काव्या देखो प्लीज़, प्लीज़ प्लीज़ मत रोओ क्यों तुम्हे बुरा लग रहा है तो क्या मुझे बुरा नही लग रहा मैंने रोते हुए कहा,  देखो सॉरी मैंने जो कहा उसके लिए प्लीज़ चुप हो जाओ नही तो मैं भी रोने लगूँगा मनन ने कहा तो रोते - रोते मुझे हँसी आ गई और फिर मैं चुप हो गई। छोटी उम्र में मन किसी नन्हे फूल की तरह कोमल होता है जो सुबह के सूरज को देख खिल उठता है और ज़रा धूप बढ़ जाने पर मुरझाने भी लगता है। लंच ब्रेक खत्म हो गया था साथ ही मेरे और मनन के बीच की प्रॉब्लम भी। उस दिन हम दोनों ने मिलकर एक फैसला लिया था जब तक हम बड़े नही हो जाते समझदार नही हो जाते किसी रिश्ते को कैसे जिया जाता किसे निभाया जाता है, जब तक इन बातों को ठीक से जानने और समझने लायक नही हो जाते तब तक हमारे रिश्ते में हम दोस्ती को ज्यादा रखेंगे और प्यार वो दोस्ती के पीछे धीरे- धीरे अपने कदम बढ़ाएगा। अब सब कुछ ठीक चल रहा था हम अच्छे दोस्त की तरह साथ थे हम साथ पढ़ते, खेलते ,लड़ते झगड़ते पर आँखों- आँखों वाला वो प्यारा सा एहसास भी किसी इत्र की तरह मन मे महकते हुए साथ रहता। फेयरवेल स्कूल में हमारा आखरी दिन, हमारे जूनियर्स ने स्कूल में हमारे इस आखरी दिन को अपनी परफॉमेंस से खास बना दिया हम सब खुश भी थे और थोड़ा सा दुखी भी क्योंकि हम सब अब बिछड़ने वाले थे लेकिन मनन और मैं थोड़ा ज्यादा भावुक थे क्योंकि अब रोज़ की तरह हम नही मिल पायेंगे जूनियर्स की परफॉमेंस के वक्त भले ही मनन मुस्कुरा रहा था पर उसके चेहरे पर एक उदासी भी थी मैने चुपके से उसका हाथ थाम लिया हम मिलते रहेंगे सच भूल तो नही जाओगी ना मेरे कहने पर मनन ने पूछा। नही कभी नही अपना सिर ना में हिलाते हुए मैंने उससे कहा। इसके बाद हम सब फ्रेंड्स ने सारा स्कूल घूमते हुए यहाँ बिताई अपनी यादों को एक फिर से ताज़ा किया। हँसी - खुसी और बिछड़ने के थोड़े से दुख के साथ ये दिन बीत गया। काव्या काव्या हाँ कुछ कहा तुमने , इतनी देर से मैं ही तो कह रहा हूँ कहाँ खो जाती हो यार अच्छा वो जो पैकेट मैंने दिया था वो बताओ हाँ ये रहा, खोलो इसे मनन ने कहा इमली मैं खुश होते हुए बोली स्कूल में इतनी इमलियाँ तोड़ी है तुम्हारे लिये इसका सबूत आज भी है अपने हाथ मे लगी चोट का निशान दिखाते हुए मनन ने कहा। हाँ तो मैंने थोड़ी कहा था कि पेड़ पर चढ़ जाओ मैंने कहा हाँ वो तो मेरा ही मन किया था पेड़ से गिरने का ठीक है चलो ,अब खालो इमली मनन ने कहा। मैंने चटकारे लेते हुए इमली खाने लगी। 

स्कूल से निकलने के बाद अब हम कॉलेज स्टूडेंट हो गए थे पर मनन और मेरा कॉलेज अलग - अलग था मनन के बिना मुझे बहुत बुरा लगता था याद आती थी मुझे उसकी,  वैसे कभी - कभी हम मुलाकात कर लिया करते थे पर फिर भी अब हमारे बीच दूरियाँ आती जा रही थी क्योंकि हम अपनी - अपनी लाइफ में बिज़ी होते जा रहे थे एक शहर में होते हुए भी हम दूर हो गए थे कभी - कभी तो मैं मनन का कॉल आने पर उसे रिसीव भी नही कर पाती थी कल मेरा और मनन का किसी बात पर छोटा सा झगड़ा हो गया पता नही वो मुझसे मिलने आज आएगा भी की नही नाराज़ होगा शायद, लेक के पास झील की ओर देखते हुए मैं बैठी उसका इंतज़ार कर रही थी काव्या मनन आ गया अच्छा मैं खाने के लिए कुछ लेकर आती हूँ कहकर आरती चली गई। ऐसे खोमोश क्यों? बैठी हो मनन ने कहा, वो तुम नाराज हो ना बस इसलिए मैंने कहा। मनन मेरे करीब आकर बैठ गया बोला ,तो तुम मुझे मना लो ना कैसे मैंने उसे देखते हुए पूछा इसे लेकर ,मनन ने गुलाब का एक फूल मेरी ओर बढ़ाया अब तो रेड रोज़ दे सकता हूँ ना अब हम थोड़े बड़े हो गए है बड़ी सी मुस्कुराहट के साथ अपना सिर हिलाते हुए मैंने रोज़ ले लिया। ह, हाथ रख लूँ तुम्हारे कन्धे पर मनन ने थोड़ी काँपती हुई सी आवाज़ में पूछा मैंने अपनी पलकों से हाँ का इशारा दिया तो मनन ने झट से अपना हाथ मेरे कन्धे पर रख लिया ये देख मुझे हँसी आ गई। आरती नही आई अभी तक वो घर चली गई मनन ने कहा। मनन मैंने मनन को घूरते हुए कहा जाने दो ना यार उसे किसी बच्चे की तरह मनन बोला।वो हमारी दोस्त है इसलिए हमारे लिए सोचती है हम कितने दिन बाद मिल रहे है पता है उसे भी। इसके बाद मनन और मैं बहुत देर साथ बैठकर बातें करते रहे काव्या एक बात पूछूँ हाँ बोलो ना शादी करोगी ना मुझसे ,हाँ करूँगी।वो शाम हर शाम से बहुत खूबसूरत थी मेरे लिए, ढलता सूरज कुछ सिंदूरी सी होती ये शाम, झील का ठहरा हुआ पानी किनारे पर खड़ी मैं और मेरा साथी। मुझे एक फ़िल्म का गाना याद आ गया ये रातें ये मौसम नदी का किनारा ये चंचल हवा। बस गाने के बोल के हिसाब से अभी रात नही शाम हो रही थी। 

जिन्दगी की कहानी वैसी नही होती जैसा हम चाहते है जिंदगी में आते मोड़ के साथ कहानी को भी मुड़ना पता है कहीं ओर  किसी अलग दिशा में। प्यार हुआ इज़हार हुआ और अब इंतज़ार था 5 साल हो गए थे मैं और मनन मिले नही थे वो इंदौर जा चुका था एक सॉफ्टवेयर कम्पनी में सीनियर डेवलपर की पोस्ट पर मनन जॉब कर रहा था और मैं भोपाल की ही एक कम्पनी में थी। प्रोफेशनल लाइफ इतनी आसान नही होती आगे बढ़ने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है मैंने और मनन ने भी की पर सबसे मुश्किल था एक - दूसरे से बिना मिले ये 5 साल गुजार पाना। इन 5 सालों ने हमे ये एहसास दिलाया कि कितने अधूरे से है हम एक - दूसरे के बिना। आज की सुबह मुझे बहुत प्यारी लग रही है जैसे लम्बी रात के बाद आज सवेरा हुआ हो, सुबह के निकलते इस सूरज के साथ मेरी जिन्दगी की रोशनी फिर लौट आई हो, हाँ आज खुशी से जो मेरा चेहरा गुलाबी हो रहा है उसकी वजह मनन ही है कल शाम मनन लौट आया हमेशा के लिए और आज ही मिलने की ज़िद कर रहा है मैं ना नही कह पाई जितना बेचैन उसका मन मुझसे मिलने के लिए है उतनी ही बेचैन मेरी आँखें भी है उसे देखने के लिए । मैं बनसवर कर अपने कमरे से बाहर निकली मम्मी के चेहरे पर थोड़ी घबराहट और थोड़ी मुस्कुराहट दोनों ही एक साथ दिख रही थी और बाकी घर वाले वो खुश थे  खास मेहमान जो आये हुए थे। आज मनन से मिलने से पहले लग रहा था ना जाने कितना बदल गया होगा वो, फोन पर बातें तो बड़ी समझदारों वाली करता है , कई बातें चल रही थी दिमाग़ में और तभी मनन सामने आ खड़ा हुआ। ये,ये पल कैसा है मनन मेरे सामने है और मैं उसे कुछ बोल ही नही पा रही मनन भी खामोश खड़ा है मानो लम्हा ठहर गया हो , मेरी पलकें झपकी मैं कुछ कहना चाह रही थी कि मनन ने रोक दिया उसने मेरा हाथ पकड़ लिया अपना पैर घुटने से मोड़ते हुए जमीन पर बैठ गया और एक खूबसूरत सी अंगूठी मेरी उंगली में पहना दी। जिसकी तमन्ना की हो अगर वो मिल जाए तो मन खुशी के पंख लगाकर आसमान में उड़ेगा ही, मेरा मन भी खुशी के पंख लगाकर उड़ गया मनन के साथ प्यार के खूबसूरत आसमान में और भूल गया सब कुछ। अपने कमरे में यहाँ से वहाँ चक्कर लगाती मैं परेशान हो रही थी कल उसे बताने का मौका ही नही मिला वैसे मौका मिला था मुझे, पर मैंने जानबूझकर कुछ नही बताया अब क्या करूँ?मैं। मैं सोच रही थी तभी मेरे फोन की रिंगटोन बजने लगी मनन का ही कॉल था कॉल रिसीव करते ही मैंने उसे सब बता दिया मनन मेरा रिश्ता तय हो गया है परसो जब तुम से मिलने आने वाली थी उस दिन विशाल और उसकी फैमिली वो घर आये थे। सॉरी मैंने तुम्हें कल नही बताया मैंने रोते हुए कहा। आज रात सोई नही थी मैं बस सुबह होने का इंतज़ार कर रही थी और हिम्मत जुटा रही थी कुछ कहने के लिए, सुबह होते ही मैंने घर मे मनन के बारे में सबको बता दिया और फैसला हो गया शादी एक महीने बाद होगी। ट्रेन के रुकने की आवाज सुनी तो पता चला कि उसने हमें मंजिल तक पहुँचा दिया हम मनाली आ गए स्टेशन से सीधा होटेल पहुँचे। तो मैडम सुबह ज़रा जल्दी तैयार हो जाइयेगा आपको अपनी खूबसूरत आँखों से मनाली के दर्शन करने है मनन ने कहा तो मैंने भी कह दिया जी सर जैसा अपने कहा है वैसा ही होगा मनन ने किसी बॉस की तरह अकड़ते हुए अपना सिर ज़रा सा हिला दिया और हम दोनों मुस्कुरा दिए। मुझे होटेल के मैनेजर से कुछ पूछना है ठीक है आता हूँ अभी कहकर मनन मैनेजर से मिलने चला गया। उस दिन जब फैसला हुआ उसके बाद मनन आया था घर सबसे मिलने। शादी की तारीख नज़दीक थी उससे पहले मनन एक बार मिलना चाहता था हम लेक के पास मिले हाँ वहीं जहाँ मनन ने पूछा था शादी करोगी ना मुझसे। कुछ मुश्किलों के बाद ही सही मैंने अपना प्रॉमिस पूरा किया एक साल के इंतज़ार के बाद मैंने मनन से शादी करली। तब शादी की डेट नज़दीक थी पर शादी नही हुई क्योंकि मैंने विशाल को बता दिया था कि मैं खुश नही हुँ इस रिश्ते से। मनन ने जब उस दिन मिलने बुलाया तब उसने मुझे हर वादे और अपने रिश्ते से आज़ाद कर दिया कोई शिकायत न करते हुए उसने कहा बीते सालों को भूल जाओ और सबकी बात मान लो। 13 साल जिस एहसास को जिया है क्या उसे आसानी से भुलाया जा सकता है इतनी कच्ची डोर तो नही है हमारे रिश्ते की जो कहने भर से टूट जाये मनन ने भले कह दिया पर मैं नही भूल सकती ना मनन के साथ को ना उसके लिए किए इंतज़ार को और ना ही मनन को। मैंने एक साल तक सबको मानने की पूरी कोशिश की और आखिर सब मान गए पर दिल से नही बस मेरी ज़िद से। मैं जानती हूँ अभी भले ही दिलों में थोड़ी नाराज़गी है पर एक दिन वो जरूर खत्म हो जाएगी और सब ठीक हो जाएगा।

मैं खुश हूँ मनन मेरे साथ है हर सफर खूबसूरत हो जाता जब किसी साथी का साथ मिल जाता है। बस ऐसे ही मनन का हाथ मेरे हाथों में रहे और जिंदगी चलती जाए ,चाहे तेज़ बारिश आये या तीखी धूप पड़ जाए बस तेरे साथ ये जिंदगी चलती जाए बस चलती जाए मनन को प्यार देखती हुई काव्या का मन यही कह रहा है।


आदत


सुबह की होती भोर में रात का अंधेरा धीमे - धीमे गायब होने लगता है और उम्मीदों की किरणें दरवाज़े पर दस्तक देने लगती है, पक्षियों की आवाज़ कानों में मीठी गुदगुदी करती हुई वृन्दा को कब से जगाने की कोशिश कर रहीं थी और वृन्दा जाग गई पक्षियों की आवाज़ से नही बजती डोर बेल की आवाज़ से। वृन्दा देख तो कौन है दरवाज़े पर हाँ जा रही हूँ ,पता था मुझे, दरवाज़ा खोलने मुझे ही जाना पड़ेगा जैसे कि मेरे अलावा तो कोई और घर मे है ही नही धीरे- धीरे बड़बड़ाती हुई कुछ नींद में अलसाई सी वृन्दा दरवाज़े के पास जा पहुँची और दरवाज़ा खोल दिया दरवाज़े पर एक लड़का खड़ा था जिसका क़द 5 फुट 6 इंच होगा और रंग गेहुँआ था वृन्दा कौन है बेटा माँ ने आवाज लगाकर पूछा आप खुद ही देखलो कौन है वृन्दा ने थोड़ी नाराज़गी भरी आवाज़ में कहा। वृन्दा की माँ ने दरवाज़े पर आकर देखा तो उनका चेहरा खुशी से खिल उठा अधीश बेटा, अरे बाहर क्यों खड़े हो अंदर आओ, वृन्दा जाओ अधीश के लिए पानी ले आओ तब तक वृन्दा की माँ संध्या ने अधीश को हॉल में बैठाया और घर - परिवार का हालचाल पूछने लगीं तभी  वृन्दा पानी ले आई जिस तरह से वो पानी लेकर आयी लग नही रहा था कि वो ये पानी अधीश के पीने के लिए लाई है ऐसा लग रहा था जैसे कि वो गिलास का पानी अधीश के मुँह पर फेंक देगी पर ऐसा नही हुआ ये देख अधीश ने गहरी साँस ली और पानी पी लिया। अधीश बेटा अपने खाने- पीने का ख़्याल नही रखते हो क्या कितने दुबले- पतले दिख रहे हो वृन्दा की माँ ने कहा। नही मैं अपना ख़्याल रखता हूँ पर शायद किसी की नज़र लग गई है , वो क्या है कि मुझे लोगों की नज़र बहुत जल्दी लग जाती है अधीश ने कहा तो वृन्दा उसे घुरने लगी। कुछ देर बाद वृन्दा का छोटा भाई लक्ष्य भी आधी नींद में चलता हुआ अपनी आँखों को मसलता हुआ हॉल में आ पहुँचा कैसे हो लक्ष्य। आप, कहते हुए लक्ष्य मुस्कुराया और जाकर अधीश के गले लग गया मैं ठीक हूँ आप बताइये मेरी याद आ रही थी क्या? आपको ,इसलिए मुझसे मिलने आये है लक्ष्य ने छेड़ने वाले अंदाज़ में कहा। अधीश मुस्कुराया अरे! नही दरसल मैं यहाँ पटना ऑफिस के कुछ काम से आया हूँ सोचा आप सबसे मिलता हुआ चलूँ अभी थोड़ी देर में मुझे होटल भी पहुँचना है क्यों? लक्ष्य ने पूछा। मैं पटना 5 दिनों के लिए आया हूँ। अपना घर होते हुए तुम होटल में क्यों रहोगे भला मैंने कह दिया तुम्हें यही रहना होगा वृन्दा की माँ ने आदेश देते हुए अंदाज में कहा  पर मैं अधीश बोला। पर मैं मगर कुछ नही तुम यही रहोगे माँ ने कहा तो अधीश ने खुशी - खुशी उनकी बात मान ली पर वृन्दा अधीश के यहाँ रुकने से खुश नही थी वो इतनी गुस्सा थी कि उसके उसने सबके साथ नाश्ता भी नही किया। नाश्ते के बाद जब अधीश मीटिंग के लिए जा रहा था तब वृन्दा अपने कमरे की खिड़की के पास खड़ी उसे देख रही थी लेकिन जब अधीश की नज़र उस पर पड़ी तो वृन्दा ने अपनी नजरें फेर लीं। शाम को डिनर के वक्त माँ लक्ष्य और अधीश तीनो खूब बातें किये जा रहे थे और वृन्दा मुँह फुलाये इन तीनो को देखे जा रही थी। लक्ष्य अपने कॉलेज फ्रेंड्स के बारे में अधीश को कुछ बता रहा था जो सुन अधीश भी अपने कॉलेज के वक्त के किस्से सुनाने लगा। वृन्दा को किसी से बात न करते देख अधीश ने कोशिश की उससे बात करने की पर उसने उसकी बात का कोई जवाब नही दिया। दो दिनों तक ऐसे ही चलता रहा वृन्दा नाराज़- नाराज़ रही और अधीश उससे बात करने की कोशिश करता रहा। आज सुबह अधीश जब हॉल में बैठे हुए फोन पर बात कर रहा था तब वृन्दा चोरी-  छुपे अधीश की बातें सुनने की कोशिश कर रही थी क्योंकि अधीश उस वक्त किसी लड़की से बात कर रहा था। वैसे अधीश जान गया था कि वृन्दा उसकी बातें सुन रही है इसलिए उसे परेशान करने के लिए अधीश फोन कट हो जाने के बाद भी बड़े इतराते हुए बात करता रहा जैसे किसी खास दोस्त से बात कर रहा हो। और इसके बाद घर से लक्ष्य को ये कहकर चला गया कि वो ऑफिस के ही किसी काम से जा रहा है। जबकि उसने कल ही लक्ष्य को बताया था कि सन्डे को उसकी कोई भी मीटिंग नही है वो घर पर ही रहेगा फिर अचानक अधीश कहाँ चला गया वृन्दा टेरिस पर यहाँ से वहाँ वहाँ से यहाँ घूम - घूमकर यही सोचकर परेशान हुए जा रही थी। शाम को जब अधीश घर आया तब वृन्दा का चेहरा देखने लायक था हॉल में बैठे हुए सब साथ मे टीवी देख रहे थे वृन्दा अधीश को इस तरह घूरे जा रही थी जैसे चोर की दाढ़ी में तिनके को खोज ही लेगी पर ऐसा कुछ हुआ नही। माँ और लक्ष्य से बात करते हुए अधीश के चेहरे पर ऐसे कोई भाव नही थे और ना ही उसने ऐसी कोई बात की जिससे ये कहा जाये कि उसका कोई झूठ पकड़ा गया। वृन्दा थोड़ा उदास हो गई , क्योंकि अधीश की वो चोरी जोकि खुद वृन्दा के मन की कल्पना है वो उसे पकड़ नही पाई लेकिन अधीश खुश था किसी बहाने ही सही वृन्दा उसके के बारे सोच तो रही है बस उसका उदास सा चेहरा देख अधीश को थोड़ा बुरा लग रहा था अ ,  वृन्दा रिमोर्ट देना प्लीज़ अधीश ने कहा तो बिना कुछ बोले वृन्दा ने टीवी का रिमोर्ट टेबल पर रख दिया और उठकर अपने कमरे में चली गई। एक बार फिर अधिश की कोशिश नाकाम हो गई। वृन्दा छोटी - छोटी बातों पर बहुत जल्दी उदास हो जाती है आदत है उसकी, लेकिन जब कोई अपना उदास हो तो भला अपने मन को सुकून कैसे से मिल सकता है। रात को काफी कोशिश के बाद भी अधीश को नींद नही आ रही थी तीन दिन गुजर गए अब सिर्फ दो दिन ही बाकी है जैसा सोचा था अगर वैसा नही हो पाया तो , एक के बाद एक ना जाने कितने सवाल कितनी बातें अधीश को परेशान करने लगी। रात के 2 बज गए नींद तो नही आई पर भूख का एहसास जरूर होने लगा अधीश उठकर किचन में चला आया और खाने के लिए कुछ ढूंढने लगा। तभी पीछे से वृन्दा भी आ पहुँची उसे देख अधीश झिझकते हुए बोला वो मैं पानी लेने आया था अधीश ने पानी की बोतल ली और अपने कमरे में चला आया। अब तो नींद और कोसों दूर हो गई पेट मे चूहे जो दौड़ने लगे। अधीश बार - बार लेटता और फिर उठकर बैठ जाता। 10 मिनिट बाद वृन्दा कुछ लेकर आई और अधीश को दे दिया ये क्या? है अधीश ने पूछा,  सेवई अब इतनी जल्दी तो यही बन सकती थी यहाँ - वहाँ की बातें सोचकर देर तक जागते हो और जब भूख लगने लगती है तो आधी रात में किचन की ओर भागते हो आदत है ना तुम्हारी , फिर भले ही कोई तुम्हारी वजह से परेशान हो तुम्हे उससे क्या झूठा गुस्सा दिखाते हुए वृन्दा बोली। जब मेरी आदत इतने अच्छे से मालूम है तो क्यों? चली आयीं अधीश ने वृन्दा को देखते हुए कहा। वृन्दा ने एक नज़र अधीश को देखा और जाने लगी अधीश ने झट से वृन्दा का हाथ पकड़ लिया एक बार तो बात कर लो,अच्छा सुन तो लो प्लीज़।वृन्दा चुपचाप बैठ गई। सॉरी , मुझे गुस्सा नही करना चाहिए था कभी - कभी न चाहते हुए भी हमसे कुछ गलतियाँ हो जाती है हम अपना पेशेन्स खो देते है मैंने भी खो दिया था आय एम सॉरी अधीश ने बोला, इसके बाद वृन्दा उठकर चली गई। 

जब हम किसी से नाराज़ होते है तो हम ये तो नही जानते कि हमारी नाराज़गी का सामने वाले पर क्या असर हो रहा है,  पर हाँ हमारा खुद का मन जरूर बेचैन रहता है और चाह कर भी हम अपने मन को खुश नही रख पाते वृन्दा का मन भी बेचैन है। इस तरह नाराज़ होकर मैं अधीश को सज़ा दे रही हूँ या खुदको मुझे कुछ समझ नही आ रहा अपने कमरे में बैठे हुए वृन्दा मन ही मन सोच रही थी। सुबह जब वृन्दा की माँ उसके कमरे में आई तो वृन्दा बेड से टिके हुए फर्श पर बैठी हुई थी वृन्दा क्या?  हुआ बेटा कहते हुए माँ वृन्दा के पास जा बैठी वृन्दा ने अपना सिर माँ के कन्धे पर रख दिया मैंने गलत किया क्या, मुझे इस तरह नाराज़ होकर नही आना चाहिए था हम अपनो पर ही तो गुस्सा होते है किसी पराये पर नही और गलती मेरी भी तो थी उसने सॉरी भी कहा मम्मा, वो मन का बहुत अच्छा है वृन्दा बोले जा रही थी और माँ उसकी बातों को खामोश होकर सुन रही थी  बचपन मे भी जब वृन्दा को अपनी किसी गलती पर अफसोस होता था तब भी वो ऐसे ही अपनी मम्मा को धीरे - धीरे थोड़ा रो - रोकर सारी बात बताती थी अभी भी वैसे ही है जल्दी गुस्सा हो जाना नाराज होना और फिर दुखी होकर रोने लगना नादानियाँ अभी भी भरी हुई है वृन्दा में। वृन्दा की बातों को बीच मे रोकते हुए माँ ने उसका हाथ अपने हाथों में ले लिया जो गलती होने , ना होने पर भी खुद माफ़ी मांगे वो मन का अच्छा ही होता है माँ ने कहा। आज नाश्ते के वक्त वृन्दा थोड़ी बदली हुई सी थी उसके चेहरे पर कोई गुस्सा जो नज़र नही आ रहा था पर अधीश कुछ जल्दी में था माँ के पूछने पर उसने बताया वो मुझे ज़रा जल्दी जाना है जिस काम के लिए मैं आया था शायद वो आज पूरा हो जाएगा तो फिर मैं कल वापस चला जाऊँगा। जबसे वृन्दा ने अधीश के वापस लौटने की बात सुनी है उसका मन परेशान सा हो गया है शाम को खिड़की के पास बैठकर वृन्दा रास्ते की ओर देख रही थी शायद अधीश के आने का इंतजार कर रही है। 

उस शाम भी वृन्दा इंतज़ार ही तो कर रही थी अधीश जल्दी घर आने वाला था पर शाम बीत गई और अधीश रात को घर पहुँचा वो भी 10 बजे के बाद अधीश के आते ही वृन्दा ने उस पर नाराज़ होना शुरू कर दिया कुछ देर अधीश चुप रहा लेकिन फिर अपना पेशेन्स खो बैठा और वृन्दा पर उसका सारा गुस्सा निकल पड़ा वो गुस्सा जो कुछ दिनों से अधीश की प्रोफेशनल लाइफ में चल रही प्रॉब्लम्स की वजह से था उस रात जब अधीश घर लौटा तब वो परेशान था शायद कुछ हुआ था ऑफिस में जिसका असर अधीश पर इतना हुआ कि वो भूल गया कि वृन्दा उसका इंतज़ार कर रही होगी। अधीश के इस तरह गुस्सा करने पर वृन्दा को बहुत दुख पहुँचा वो नाराज़ होकर पटना चली आई। जब किसी अपने से हमेशा हँसाने की उम्मीद हो और वो रुला दे तो दुख तो होता ही है। रात को खुले आसमान के नीचे बैठने से मन को सुकून मिलता है,है ना लक्ष्य ने कहा तो वृन्दा और अधीश धीमे से मुस्कुरा दिये जैसे ज्यादा मुस्कुराए तो उन्हें टैक्स देना पड़ जायेगा। रात के डिनर के बाद अधीश, वृन्दा और लक्ष्य टेरिस पर थे लक्ष्य ही दोनों तो को ले आया ये कहकर की रात में चलती ठंडी हवा जब दिमाग़ से टकराती है तो वी एक दम शांत हो जाता है और हम बड़ा रिलैक्स फील करते है। अधीश और लक्ष्य दोनों आपस मे खूब गपशप किये जा रहे थे कि तभी लक्ष्य को किसी का कॉल आ गया लक्ष्य कॉल रिसीव करते हुए टेरिस पर ही थोड़ा दूर जाकर खड़ा हो गया। अधीश वृन्दा से बात करना चाह रहा था पर उसे समझ नही आ रहा था शुरू कैसे करें वो आज की मीटिंग बहुत अच्छी रही अधीश ने कहा , अच्छा वृन्दा ने कहा ,हाँ मैं फिर कल चला जाऊँगा अधीश ने कहा , तो फिर वृन्दा बोली तो फिर क्या?  अधीश ने पूछा वृन्दा चाह रही थी अधीश कुछ बोले पर वो समझ ही नही पा रहा था वृन्दा को थोड़ा गुस्सा आ गया अधीश वृन्दा को देख सोचने लगा अब क्यों? गुस्सा हो गई। थोड़ी देर दिमाग लड़ाने पर अधीश समझ गया सॉरी अब कभी गुस्सा नही करूँगा मैं तुम्हे फोर्स तो नही कर सकता पर तुम अपनी नाराज़गी खत्म करके मेरे साथ अधीश ने इतना कहा और वृन्दा ने उसके हाथ मे इलायची दे दी तुम्हे डिनर के बाद इलायची खाने की आदत है वृन्दा ने कहा। आदत तो तुम्हारी भी है जब हम किसी के साथ रहते है तो हमें उसकी और उसकी आदतों की आदत होने लगती है मुझे भी तो हो गई है तुम्हारे साथ रहने की आदत अधीश ने बोला और टेरिस से चला गया। सच ही तो है आदत ही तो हो गई है अधीश को वृन्दा के साथ कि उसकी नादानियों की उसके रूठ जाने की और उसे मनाने की। वृन्दा अधीश जितनी मैच्योर नही है अभी भी थोड़ी सी नासमझ है ये बात अधीश जानता है इसलिए वो खुद उससे नाराज़ कभी नही होता। सुबह जब अधीश अपना बैग लेकर दरवाज़े पर पहुँचा तो पीछे से वृन्दा ने आवाज़ लगा कर रोक लिया अकेले ही जाओगे अपनी वाइफ को साथ नही ले जाओगे बस तुम्हे ही मेरी आदत है और मुझे नही है अधीश होले से मुस्कुराकर वृन्दा को देखने लगा वृन्दा ने पास आकर कहा ज्यादा मत मुस्कुराओ घर चलकर तुमसे पूछना है क्या? अधीश ने पूछा दो दिन पहले फोन पर किस खास दोस्त से बात कर रहे थे।



 



एक चुटकी प्रेम

मार्च बित गया था ठंड के नख़रे अब कम हो गए थे कम क्या यूँ कहें कि अब खत्म ही हो गये थे सूरज के तीखे तेवर जो शुरू हो गये थे। अब गर्मागर्म पकोड़े...

Sonal bhatt MULAKAT-KAHANIYO-SE STORY OF OUR LIFE