बचपन बहुत खूब है



मैं बैठकर आराम से अखबार पढ़ रहा था लेकिन बाहर से आते शौर की आवाज से मुझे अखबार पढ़ने में थोड़ी दिक्कत महसूस हो रही थी। मैं उठकर बाल्कनी में आया मेरे फ्लेट के सामने एक बहुत बड़ा मैदान है जहाँ बच्चे पकड़म पकड़ाई खेल रहे थे।
ये जो शोर सुनाई दे रहा है ये इन बच्चो का ही शोर है।
बच्चे जहाँ भी हो वहाँ हल्ला- गुल्ला तो होता ही है
मैं कुछ देर बाल्कनी में ही खड़ा रहा और बच्चों को देखने लगा। बच्चे एक - दूसरे के पीछे दौड़ रहे थे और साथ ही चिल्लाये जा रहे थे। बच्चों को ज़ोर - ज़ोर से
चिल्लाना बड़ा अच्छा लगता है उन्हें इसमे बड़ा मज़ा आता है।
इन्हें देखकर मुझे अपना बचपन याद आ रहा है। मैं और मेरे दोस्त हम भी कोई कम शैतान नही थे बड़ी शैतानियां किया करते थे और उसमें बड़ा मज़ा भी आता था। किसी बात की कोई फिक्र और परवाह नही रहती थी हमे, के स्कूल में एग्जाम है या घर पर कोई मेहमान है। हर वक्त बस अपनी मस्ती में मस्त।
हम तो बस नई- नई खुराफातों में लगे रहते थे कैसे किसको परेशान करना है और आगे क्या करना है इस सबकी हम प्लांनिग किया करते थे। पड़ोस में जो शर्मा आंटी रहती थी वो हम बच्चों के शौर मचाने से बड़ा चिड़ा करती थी। इसलिए हम उन्हें और परेशान किया करते थे। बार- बार उनके घर की डोर बेल बजाकर भाग जाते और जब वो बाहर निकलकर गुस्सा करती तो हम अच्छे बच्चे बनकर उनके पास जाते और जिस भी दोस्त से लड़ाई चल रही होती उसका नाम लगा देते। और बाद में अपनी ही शरारत पर खूब हस्ते।
वैसे अपने सारे दोस्तों में मैं कुछ ज्यादा ही शैतान था
इसलिये मैं बहुत डाँट भी खाता था और अपने दोस्तों का लीडर बनकर रहता था। मैं अपने आपको बड़ा समझदार और होशियार समझता था और अपने छोटे से दिमाग को बहुत दौड़ता रहता था हर बात का पता लगाने के लिए जैसे की मैं कोई डिटेक्टिव हूँ तो मुझे पता लगाना है की अगर माँ ने तीस पापड़ सुखाने के लिए रखे थे तो पाँच कहाँ गायब हो गये, पड़ोस वाली आंटी स्टील का डब्बा लेकर आयीं थी तो उसमे क्या लायीं या फिर क्या माँगकर ले गयी। मिश्रा अंकल ऑटो से कहीं जा रहे है ये कहाँ जा रहे है वो भी इतना बड़ा बैग लेकर। किसी बात का मुझसे मतलब हो न हो पर मुझे उसका पता लगाना बड़ा जरूरी सा रहता था।
ऐसे ही कोई भी खिलौना कैसे बना है ये पता करने के लिए मैं उसे पूरा खोल दिया करता था मलबत तोड़ दिया करता था पर दिक्कत तब हो जाती थी जब मेरे भाई को पता चल जाता था की मैंने उसके खिलौने भी तोड़ दिये तब हम टॉम एंड जैरी की तरफ दौड़ लगाते थे मेरा भाई जब मुझे पकड़ नही पाता था तो रोने लगता था फिर माँ उसको चुप करती और मुझको डाँट लगाती। वैसे मुझ पर माँ की डाँट का कोई असर नही होता था। क्योंकि तब मेरे दिमाग में कुछ और ही चलता रहता था। मैं रोज रात को आसमान में देखकर तारे भी गिनता था और सोचता था की ये तारे आसमान में किसने लगाये होंगे ये नीचे क्यों नही गिरते। मेरे छुटकू से दिमाग में कई सवाल चलते रहते थे ये चाँद तारों से बड़ा क्यों है, रात में अंधेरा कैसे हो जाता है, मैं इतना छोटा क्यों हूँ। ऐसे कई सवाल मेरे दिमाग में आते और मैं खुद ही उसके उत्तर ढूंढता रहता या फिर माँ से पूछता रहता। कभी तो माँ मेरे सवालो के उत्तर बड़े अच्छे से देती और कभी डाँट देती। लेकिन तब भी मेरा सवालों का पूछना बंद नही होता। मैं तो बारिश देखकर भी यही सोचता था की आखिर पानी ऊपर से कैसे बरसता है क्या बादल में पानी भरा रहता है। खैर अपने सवाल का जवाब मिले न मिले पर मैं बारिश के मज़े बहुत लेता था अपने दोस्तो के साथ उछल- उछलकर झूमझूम कर बारिश में खूब नहाता था। और कागज की नाँव बनाकर पानी में चलाता था मेरी नाँव ही सबसे आगे रहती थी क्योंकि मैं उसे आगे ही रखता था। इस बात पर मेरी मेरे दोस्तो से लड़ाई भी हो जाती थी। मैं तो लड़ता भी खूब था और फिर अगले ही दिन अपने दोस्तो के साथ खेलने भी लगता था। ये तो आये दिन की बात रहती थी आज कट्टी होते तो दूसरे दिन चुप्पी। ऐसे ही जब घर में कोई मुझे डाँट देता था तो मैं थोड़ी देर के लिए मुँह फुलाकर बैठ जाता था पर जैसे ही पापा मुझे चौपाटी ले जाने की बात करते तो मैं खुशी से उछलने लगता जैसे कि वो मुझे आगरा का ताजमहल दिखाने ले जा रहे हो। बात कितनी ही छोटी हो या बड़ी हो
मेरे लिए तो हर बात खुशी मनाने वाली होती थी।
बचपन बड़ा ही खूब होता है अपनी ही धुन में रहना, हर बात में खुश होना, बेफ़िक्री में जीना।
कितना प्यारा होता है न बचपन। अपने बचपन को याद कर मैं वैसे ही मुस्कुरा रहा हूँ जैसे बचपन में कोई शैतानी करने के बाद मुस्कुराता था। शायद फिर से दिमाग में कोई खुराफ़ात चल रही है।

  न कोई फिक्र न कोई परेशानी, बस थोड़ी समझ
  और नादानी।
  पता नही है के किस रास्ते जाना है , फिर भी चलते है
  कभी गिरते है , तो कभी सम्हलते है।
  हस्ते भी बहुत है और खूब मुस्कुराते है ,
  पर जरा डाँट पड़ जाये तो आँसू भी बहाते है।
  धूप को समझते छाँव और छाँव को समझते धूप है,
  बचपन बहुत खूब है बचपन बहुत खुब है।





परेशान



परेशान जो देखन मैं चला परेशान मिला हर कोई जो दिल खोजा आपना मुझसा परेशान न कोई।
भागते - दौड़ते मैं ऑफिस तो पहुँच गई पर मैं थोड़ा
लेट हो ही गई जैसे ही मैंने ऑफिस में इंटर किया बॉस सामने ही खड़े नजर आये। और मोबाइल में बजते अलार्म से मेरी नींद खुल गई अच्छा हुआ की ये सपना था पर अगर मैं अभी जल्दी से रेडी नही हुई तो ये सच भी हो सकता है। आज माँ को न जाने क्या हो गया है
मैं उठ भी गई तैयार भी हो गई पर माँ ने अभी तक मुझसे कोई बात ही नही की। मैं नाश्ता करते हुए बाल्कनी की ओर ही देख रही हूँ जहाँ माँ कुर्सी पर बैठे हुए दोनो हाथो में सलाइयां लिए कुछ बुने जा रही है।
वो बार - बार पहले कुछ बुन रही है और फिर उसे उधेड़ रही है। मुझसे रहा नही गया और मैंने जाकर पूछ ही लिया के ये आप क्या कर रही है दरसल माँ एक स्वेटर बना रही है और उसमे एक सुन्दर सी डिजाइन बनाना चाह रही है जोकि अभी उनसे नही बन पा रही है इसलिए वो बार- बार स्वेटर बुन रही है और फिर उसे उधेड़ रही है इस तरह माँ परेशान हो रहीं है। मेरा ऑफिस जाने का टाइम हो गया था। इसलिए मैं ऑफिस के लिए निकल गई और बिना लेट हुए टाइम पर पहुँच भी गई। लंच ब्रेक में रुचि से बात हुई रुचि थोड़ी परेशान है वो होम लोन लेना चाह रही है पर होम लोन मिलने में उसे थोड़ी मुश्किले हो रहीं है। शाम को झूले पर अकेले बैठे हुए मैं माँ और रुचि के बारे में ही सोच रही हूँ। माँ परेशान है क्योंकि उनसे
वो डिजाइन नही बन पा रही जो वो चाहती है और रुचि इसलिए परेशान है क्योंकि उसे लोन नही मिल पा रहा। जब मैंने ध्यान से अपने और उन लोगों के बारे में सोचा जो मुझसे जुड़े हुए है या मैं जिन्हें जानती हूँ तो मुझे यही समझ आया की हम सब किसी न किसी वजह से परेशान है हम बड़ी से लेकर हर छोटी बात पर परेशान हो जाते है ये कही न कहीं हमारी आदत सी होती जा रही है। हम वजह बेवजह परेशान होने लगते है। जरा थोड़ी दिक्कत आई नही के हम परेशानी महसूस करने लगते है फिर उस परेशानी के बारे में सोच- सोचकर हम उसको बड़ा बना लेते है और फिर ये मान लेते है की इस दुनिया में हम ही है जो सबसे ज्यादा परेशान है। पर हम परेशान क्यों है? जब हम कुछ चाहते है या जिस तरह से चाहते है वो अगर वैसे न हो पाये या हमे न मिल पाये तो हम परेशान होने लगते है जैसे की माँ।
वो एक सिम्पल स्वेटर आसानी से बुन सकती है लेकिन वो उसमे डिजाइन चाहती है रुचि को एक अच्छे फ्लेट के लिए लोन चाहिये, अनु को 90% मार्क्स चाहिए, विवेक का कहना है ये जॉब अच्छी नही है वो जॉब ज्यादा अच्छी है, ये बाइक ठीक नही है वो वाली बाइक ज्यादा अच्छी है।
सभी की यही सोच है हम इसलिये परेशान नही है की हमारे पास कुछ नही है हम इसलिए परेशान है की हमारे पास जो है हमे उससे अच्छा चाहिए।
और जब वो अच्छा मिल जाएगा तब हम उससे भी अच्छा पाने के लिए परेशान रहेंगे।
हमे बेहतर , बेहतर और उससे और बेहतर चाहिए।




शुभ दिवाली




त्यौहार के पहले ही बाजार जो जगमगाता है वो देखकर ही मन बड़ा उत्साहित हो जाता है। झिलमिल करती लाइट घर के सजावट का सामान , नये- नये प्रकार के दिये, अलग-अलग रंगों की रंगोली। दिवाली
की रोनक ऐसी होती है की हर एक घर रोशन हो जाता है। चारो ओर प्रकाश ही नजर आता है। आँगन में बनी सुन्दर रंगोली उसमे रखे जलते दिये अपनी रोशनी बिखरते अच्छे लगते है। बचपन में दिवाली पर लक्ष्मी माता की पूजा करने के लिए मैं सबसे ज्यादा उत्साहित रहता था क्योंकि मैंने अपनी दादी को कहते सुना था की लक्ष्मी माता की पूजा करने से लक्ष्मी आती है। मैं तब यही सोचता था के मैं पहले पूजा करूँगा तो सबसे ज्यादा पैसे मेरे पास ही आयेंगे। तब ज्यादा समझ तो थी नही। उस वक्त हर बच्चे ही तरह मेरे लिए भी दिवाली का मतलब नये कपड़े लेना पटाखे चलना और घर में बनी मिठाई गुजिया शक्करपारे का आनन्द लेना था। लेकिन जब बड़ा हुआ तब दिवाली का सही महत्व समझ आया।
दिवाली खुशियों का त्यौहार है हम खुशियां मनाते है खुशियां बाँटते है बड़े जोश और उत्साह के साथ परिवार के सभी सदस्य मिलकर साथ में इस त्यौहार को मनाते है ये त्यौहार फैमली मेंम्बर्स के लिए भी आपस में मिलने का एक बहुत अच्छा मौका होता है। ज्यादातर फैमली मेंम्बर्स किसी न किसी वजह से अपनी फैमली से दूर रह रहे है सब इस तरह बिज़ी है की उनके लिए अपने ही परिवार से मिल पाना मुश्किल हो जाता है।
ऐसे में हमारे ये त्यौहार ही है जो इस मुश्किल को हल करते है दिवाली पर न जाने कितने लोग अपने घर वापस जाते है भले ही बहुत ज्यादा नही पर कुछ वक्त अपने परिवार के साथ बिता पाते है। उनके अपने भी उनका इंतजार कर रहे होते है ये सोचकर की इस बार
दिवाली के बहाने उनका अपना जो उनसे दूर है वो घर आयेगा और खुशी के  कुछ पल उनके साथ बिताएगा।
मैं ये सब बाते इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि मैं भी अपनो से, अपने परिवार से दूर हूँ आठ साल हो गये है उनके बिना रहते हुए। इन आठ साल में मैं दो बार ही दिवाली पर घर जा सका। लेकिन पिछली दिवाली मैंने डिसाइड कर लिया था की इस दिवाली अपने घर जरूर जाऊंगा। ऑफिस से छुट्टी भी मिल गई थी मैं बिल्कुल रेडी था लेकिन जिस फ्लाइट से मैं जाने वाला था किसी वजह से उसका जाना केंसिल हो गया। और इतने अचानक से
जाने का कुछ और अरेंजमेंट नही हो सका। मैं मन ही मन उदास हो गया। जब हम कहीं जाने वाले होते है तो पहले से ही बहुत कुछ प्लानिंग मन में कर लेते है मैंने भी की थी सभी के लिए गिफ्ट्स लिए थे की सबको गिफ्ट्स दूँगा और हमेशा की तरह पापा से अपना मन चाहा कुछ लूँगा। पर ये होना सका। मैं अपने फ्लेट की बाल्कनी में बहुत देर उदास हुए बैठा रहा। जब मुड़ थोड़ा ठीक हुआ तो अपने उदास मन को ठीक करने के लिए
मैं घर से बाहर घूमने निकल पड़ा। मैं एक पार्क में जाकर बैठ गया यहाँ मैं अक्सर आता रहता हूँ  मैं बैठे हुए वहाँ आते - जाते हुए लोगों को देख रहा था। कुछ देर बाद मेरे मन मैं कुछ ख्याल आया मैंने अपने दोस्त को कॉल किया और फटाफट अपने फ्लेट पर जा पहुँचा और 20 मिनिट मैं वापस पार्क मैं आ गया। तब तक मेरा दोस्त भी आ गया था मैंने जो गिफ्ट्स अपनी फैमली के लिए थे वो मैंने यहाँ आये लोगों को शुभ दिवाली कहते हुए दे दिये और वीडियो कॉल पर अपनी फैमली से बात करते हुए मैंने अपने दोस्त के साथ मिलकर  दिवाली के दिये भी जलाएं इस तरह मैंने पार्क में ही दिवाली सेलिब्रेट की जिसमे वहाँ मौजूद लोग भी इस सेलिब्रेशन में शामिल हुए।
घर जैसी खुशी भले न मिली हो पर खुशी मिली।
मगर हाँ इस बार मैं दिवाली पक्का अपनी फैमली के साथ ही मनाऊंगा क्योंकि मैं अपने घर आ गया हूँ।
और सबके लिए गिफ्ट्स भी लाया हूँ। मैं बहुत खुश हूँ
अपनो के साथ दिवाली ही मेरे लिए शुभ दिवाली है।

 


एक चुटकी प्रेम

मार्च बित गया था ठंड के नख़रे अब कम हो गए थे कम क्या यूँ कहें कि अब खत्म ही हो गये थे सूरज के तीखे तेवर जो शुरू हो गये थे। अब गर्मागर्म पकोड़े...

Sonal bhatt MULAKAT-KAHANIYO-SE STORY OF OUR LIFE