मेला



ये जो दुनिया है ये एक भीड़ भरा मेला है जहाँ चलना तुझे अकेला है। ये दुनिया बहुत बड़ी है जिसमे लोगों की भीड़ है जैसे किसी मेले में होती है वैसे ही। यहां कोई समान नही है बल्कि सबका अपना एक अलग प्रकार है और हर एक अपने प्रकार को चमकाने में लगा हुआ है। ताकि मेले की इस भीड़ में उसकी चमक सबसे तेज़ हो जिससे कि वो आकर्षण का केंद्र बन सके। जब हम किसी मेले में जाते है तो किसी एक जगह ज्यादा देर खड़े नही रहते हम चलते रहते है एक शॉप से दूसरी शॉप इस स्टॉल से उस स्टॉल।
ऐसा ही कुछ हाल इस दुनिया वाले मेले का है। यहाँ कोई कहीं रुका हुआ नही है सब चल रहे है कोई आगे चल रहा है तो कोई पीछे चल रहा है और जिसे भीड़ में चलने में कोई दिक्कत हो रही है तो वो किसी और को धक्का देते हुए चल रहा है। सब अपनी सहूलियत अनुसार चल रहे है।
ये दुनिया का मेला बड़ा रंगीन और अजब गजब है।
यहाँ मन को लुभाने वाली कई चीजें है। कुछ लोभ में आकर फंस जाते है तो कुछ बचकर निकल जाते है।
यहाँ लोग तो कई मिलते है पर कितने सही मिलते है ?
 जो सच्चा है तो वो अभी बच्चा है , जो चालाक है वो अच्छा है। जिसके पास बटर है ब्रेड वही खायेगा दूसरा तो बस चने चबाएगा।
दोस्त यार रिश्तेदार साथी संगी तो कई है पर साथ कोई भी नही है। वैसे तो सब साथ नजर आते है पर धूप के पड़ते ही सब अकेला कर जाते है।
इस मेले में मेरे आसपास लोग तो कई है बस अपना ही कोई नही है। समझदार तो यहां  बहुत है बस किसी को समझने ने की समझ ही नही है।
भीड़ चाहे यहां कितनी हो पर चलना तुझे अकेला है। यहाँ साथ छोड़ने वाले तो बहुत है पर साथ देने वाले बहुत ही कम है। सही राह दिखाने वाले बहुत कम है पर राह से भटकाने वाले ज्यादा है।
किस ओर जाना है किस मोड़ मुड़ना है ये तुझे खुद ही तय करना है अपना रास्ता तुझे खुद चुनना है।
गुरु कोई नही मिलेगा तुझे यहाँ अपना गुरु तुझे खुद ही बनना है। कोई रोशनी नही करेगा तेरे रास्ते पर अपना रास्ता खुद तुम्हे ही रोशन करना है।
मदद की उम्मीद किसी से मत करना खुद का सहारा खुद ही बनना। इस मेले के लोग बड़े अजीब है हर बात को गोल-गोल घुमाते है सही कभी कुछ भी नही बताते है। गलत खुद किये जाते है पर गलती दूसरे की बताते है। किसी के खुश होने पर मुँह बनाते है किसी के रोने पर खुश हुए जाते है। झूठ का रायता बनाते है और उसमे सच का नमक स्वाद अनुसार मिलाकर आनन्द के साथ पिये जाते है। बड़े जोश में आकर दूसरो से सवाल किये जाते है और जब खुद जवाब देने की बारी आये तो बहाने पर बहाने लिए जाते है। बड़े निराले रूप है यहाँ लोगों के। भले ही कोई किसी को नही भाता है पर अपनेपन का दिखावा करना यहाँ सबको आता है। इस मेले में भीड़ तो बहुत है लोग भी कई है
पर कोई किसी का नही है। तु खुद ही तेरा साथी है ,तु ही तेरा गुरु है ,अंधेरे रास्तो पर तु ही तेरी रोशनी है
तु ही तेरा सहारा है। हमेशा याद रख ये भीड़ भरा मेला है जहाँ चलना तुझे अकेला है।







फैसला



वैसे तो पैकिंग में बहुत समय लगता है पर मुझे कुछ ज्यादा सामान रखना ही नही है जो जरूरी लगा बस वो रख लिया। और साथ में ये फ़ैमिली फोटो रख ली।
जब सबकी याद आयेगी तो इसे देख लूंगी। माँ गाड़ी आ गई है उदास स्वर में आर्यन ने कहा। आसान मेरे लिए भी नही है पर मैं अब पीछे नही हट सकती। मेरी बेटी अवनि भी आज अपने ससुराल से आई है अपनी माँ से मिलने। सबसे मिलने के बाद मैं गाड़ी में बैठ गई। ड्रायवर ने गाड़ी स्टार्ट कर आगे बढ़ाई जैसे - जैसे गाड़ी आगे जा रही थी मेरा परिवार मुझसे दूर होता जा रहा था मैं गाड़ी की खिड़की से उन्हें देख रही थी। वो अपना हाथ ऊपर कर मुझे बाय कर रहे थे।
अब घर का रास्ता पीछे छूट गया और मैं एक नये रास्ते की ओर बढ़ रही हूँ। तीस साल पहले शादी कर मैं अपने ससुराल आई थी। बहुत सारे ख्वाब तो कभी थे ही नही बस छोटे - छोटे कुछ अरमान थे। मेरा ग्रेजवेशन नही हुआ था उसके पहले ही पापा ने मेरी शादी कर दी। तब मैं फर्स्ट ईयर में थी। मेरे पापा बहुत स्ट्रीक थे और उस समय लड़कियों को ज्यादा आज़ादी मिलती भी नही थी इसलिए मुझे भी नही मिली। मैं जब स्कूल में थी तब मुझे साइकिल चलाने का बड़ा शौक था पर मेरा साइकिल चलाना ना दादी को पसन्द था और न पापा को। उस वक्त हालात ऐसे थे की हर बात में डर लगता था के अगर कोई गलती हो गई तो कितनी डाट पड़ेगी। ये परिस्थितियां मेरे बड़े होने तक ऐसी ही रही। और फिर एक दिन शादी हो गई। अभी मैं फर्स्ट ईयर में ही थी पर पापा के फैसले के आगे किसी की नही चलती थी। ससुराल में पहला दिन ग्रह प्रवेश हुआ मुँह दिखाई हुई सभी ने सुखी जीवन की दुआएं दी। सब कुछ ठीक ही लग रहा था मुझे। शादी को दो महीने होने जा रहे थे सबके अच्छे व्यवहार से मेरे मन में कुछ अरमान पलने लगे थे मेरी सासुमां ने मुझे आगे पढ़ने के लिए सपोर्ट किया। और मैं फिर से पढ़ने लगी। पर दीपेश को मेरा फिर से पढ़ाई शुरू करना मंजूर नही था। धीरे- धीरे उनका बर्ताव बदलने लगा था वो हर बात में बस अपना फैसला मुझे सुनाते। मेरी किसी भी बात को नही सुनते जैसे की मैं उनके लिए कुछ हूँ ही नही। हर बात पर बहस करना , लड़ना उनकी आदत सी हो गई थी। मैंने जैसे तैसे ग्रजवेशन तो कर लिया था पर  चुनोतियों से भरा जीवन मेरे सामने था। मुझे हर वक्त दीपेश के इशारो पर ही चलना पड़ता था अब तो आर्यन और अवनि भी मेरी ज़िन्दगी में आ गये थे। जिनके लिए मुझे जीना था। दीपेश के अंदर न तो एहसास थे और न ही जज़्बात मेरे मन को समझने की उन्होंने कभी कोई कोशिश नही की। उनके लिये तो शायद मैं कठपुतली थी जो उनकी परमिशन के बिना मुस्कुरा भी नही सकती थी। दीपेश के हर दिन के बेरुखे व्यवहार से मेरे मन को ठेस तो बहुत पहुँची पर मैं टूटी नही। मैं यही सोचती रही के अभी नही कुछ वक्त बाद सही दीपेश में बदलाव जरूर आयेगा। दिन गुजरते रहे वक्त बीतता गया। शादी को बीस साल हो गये पर कुछ नही बदला
उनका हर बात पर गुस्सा करना मुझ पर नाराज होना अभी भी जारी रहा। अभी भी बस खुद का फैसला सुनाना बाकी सब क्या चाहते है ये वो नही जानना चाहते। घर के माहौल का असर मैंने अवनि और आर्यन पर कभी नही पड़ने दिया। दोनो बड़े हो रहे थे और अब कॉलेज भी जाने लगे थे। दोनो की पढ़ाई पूरी होते ही सबकी सहमति से दोनो बच्चो की शादी हो गई। तीस साल मुझसे जितना हो सका मैंने अपना हर फ़र्ज निभाने की पूरी कोशिश की। अब इतने साल बाद मैंने दीपेश को अपना एक फैसला सुनाया। और ना ये जानने की कोशिश की वो क्या चाहते है। मैं अपने ननिहाल कानपुर जा रही हूँ अब वही रहूंगी। मेरी एक सहेली है जो घरेलू उधोग चलाती है मैं भी उसके साथ मिलकर काम करने वाली हूँ। मैं अपने आगे का जीवन अपने मन मुताबिक जीना चाहती हूँ किसी के सुनाये फैसलों पर नही चलना चाहती। मैं जानती हूँ की हर व्यक्ति का स्वभाव अलग होता है सब एक जैसे नही होते कुछ सख्त होते है तो कुछ नरम होते है। हम सिर्फ
कोशिश कर सकते है उनके स्वभाव में बदलाव लाने की पर उन्हें बदल नही सकते।
मुझे ये समय ही सही लगा नया रास्ता चुनने के लिए।
तो बस चल पड़ी। मैं किसी को अकेला करके नही आयी हूँ बस खुद अकेले आयी हूँ।






यादें




समंदर किनारे बैठकर पानी की आती लहरों को देखना उन लहरों की आवाज सुनना अच्छा लगता है।
ये लहरें पानी को तेज़ उछाल के साथ आगे की ओर
धकेलती है। ऐसा लगता है जैसे कुछ पुराना जो पीछे रह गया हो उसे समेटकर ये लहरें आगे ला रही हो और हमे फिर से उसकी याद दिला रही हो।
वैसे मुझे नही पता के मेरे अलावा ये समंदर की लहरे किसी ओर को कुछ याद दिलाती है भी के नही पर इतना जरूर पता है कि मन के समंदर में उठती लहरे सभी को कुछ न कुछ याद दिलाती है। यूँ तो मेरे पास वक्त की कमी रहती है पूरे समय व्यस्त रहता हूँ पर जब भी समय मिलता है मैं यहाँ आ जाता हूँ। मुझे यहाँ
चुपचाप बैठकर पानी को देखते रहना अच्छा लगता है। पर हमेशा की तरह आज मैं अकेला नही हूँ। 
ये फोटो एल्बम मेरे साथ है सुबह अपने कपड़ो की अल्मारी देखी पूरी अस्त- व्यस्त नजर आ रही थी क्यों
न हो रोज बस जो कपड़े पसन्द आये वो निकाल लेता हूँ और बाकी कपड़ो को बिखर देता हूँ और न ही मैं उन्हें बाद में दोबारा ठीक करके रखता हूँ। इसलिए कपड़ो के ये हाल है आज पूरी अल्मारी की सफाई की। सफाई करते वक्त नीचे वाली रॉ में कपड़ो के नीचे दबी पड़ी पुरानी फोटो एल्बम हाथ में आई। इसे देखकर मेरे होंटो पर
मुस्कान आ गई। यहाँ आते वक्त मैं ये एल्बम भी साथ ले आया सोचा यहाँ के सुकुन में अपनी यादों से मिलना
ज्यादा सही रहेगा। एल्बम में जो ये सबसे पहले ब्लैक एंड वाइट सी फोटो नजर आ रही है ये मेरे दादा - दादी की फोटो है। हर बच्चे की तरह मैं भी अपने दादा - दादी का लाडला रहा हूँ जो जिद मम्मी पापा के पास पूरी नही हो पाती है वो दादा - दादी के पास जाकर झट से पूरी हो जाती है। ज्यादा मेहनत भी नही करनी पड़ती थोड़ा सा रोतलु मुँह बनाया और दादी की गोद में जाकर सो जाओ या फिर दोनो बाहों को दादी के गले में डाल उनकी पीठ से चिपक जाओ और कुछ बोलो नही बस चुपचाप रहो फिर दिखो कैसे आपके सारे काम बनते है दादी तो मेरा मुरझया चहरा देख सारे घर के सदस्य की क्लास ही ले लेती थी। और मैं मासूम बच्चा बना उनसे लिपटा रहता था। और मेरे दादा तो मुझे हर जगह अपने साथ ले जाया करते थे।
मेरी मनपसन्द जलेबियाँ भी मुझे खिलाया करते थे।
वो मुझे बहुत प्यार करते थे।
अगली फोटो में पापा अपनी मिलेट्री ड्रेस में है वो अपने साथी से कुछ कहते नजर आ रहे है। पापा को किसी भी काम में किसी भी तरह की लापरवाही बिल्कुल पसन्द नही थी। वो हमेशा एक्टिव रहे है और आज भी उतने एक्टिव है वो अब रिटायर्ड है पर अभी भी सख्त शेड्यूल को फॉलो करते है।
ये जो फोटो है जिसमे मम्मी पापा साथ में है इसमे पीछे जो सुन्दर वादियाँ है वो शिमला की है। हम सब साथ में शिमला गये थे। वैसे पापा ज्यादा वक्त हमारे साथ नही रह पाते थे पर जितना भी रहते थे वो उतने समय में बाकी वक्त की भरपाई कर देते थे।
कैरी देखकर मुँह में पानी आ गया। ये फोटो मैंने ही अपने कैमरे से ली थी। छत पर धूप में माँ और दादी दोनो मिलकर कैरियाँ सूखा रही है आम का अचार बनाने के लिए।
घर में कभी भी बाजार का अचार आया ही नही। माँ और दादी घर पर ही अचार बनाती थी। दादी के हाथ का बना अचार और माँ के बनाये दाल-चावल
खाकर मज़ा आता था। दादी के हाथ का अचार याद आते ही आज भी मेरे मुँह में उसका स्वाद घुल जाता है।
ये जो सब इमोशनल नजर आ रहे है ये फोटो मेरी दीदी की शादी की है। रीति दीदी मुझसे तीन साल बड़ी है। पर फिर भी सब कुछ मुझसे ही पूछती थी।
ये गेम कैसे खेलते है , ये ऐप क्या काम करता है, जा मेरे लिए मार्केट से ये ले आ। ये अच्छा नही है अब जाओ इस बदलकर लाओ। बस दीदी का यही काम रहता मुझे दौड़ाते रहना। कभी- कभी तो मैं गुस्सा हो जाता था। पर जब दीदी की शादी हो गई तो मैं उन्हें मिस भी करता हूँ।
ये फोटो तो मेरे बर्थडे की है जब मैंने अपनी लाइफ के बीस साल पूरे कर लिए थे। बड़ा ही यादगार बर्थडे रहा है मेरा। सभी फैमली मेम्बर मेरे सभी फ़्रेंड्स सबके साथ मैंने अपना बर्थडे सेलिब्रेट किया था। उसके बाद से फिर कभी ऐसे बर्थडे सेलिब्रेट कर ही नही पाया।
आगे पढ़ने के लिए पहले पुणे चला गया था और फिर उसके बाद जॉब करने यहाँ मुम्बई आ गया और यही  सेटल हो गया। चार साल पहले दादी हम सबको छोड़कर चली गयी। तब मैं बहुत रोया था। दादी से मैं हर बात शेयर करता था और जब मुझे किसी भी बात की परमिशन पापा से चाहिए होती थी तो मैं दादी से ही बोलता था। वो मेरे दिल के बहुत करीब थी। अभी काफी वक्त से मैं यहीं रह रहा हूँ। कभी - कभी जब मौका मिलता है तो घर कानपुर हो आता हूँ अभी लास्ट टाइम जब गया था तो शायद तभी ये फोटो एल्बम भी कपड़ो के साथ आ गई होगी। कितनी सारी यादें है जो मेरे मन में इकट्ठी है। मेरा बचपन , दीदी और मेरी बचपन में हुई लड़ाईयाँ,  पापा का हर गलत बात पर टोकना। मम्मी का मुझे लड्डू बेटा कहना, दादा- दादी का हर ज़िद पूरी कर देना , दीदी का चिढाना, और दोस्तो के साथ कुल डूड बनकर घूमना यादें तो इतनी सारी है कि पूरी एक किताब ही लिख दूँ। यादें भूली नही जाती वो हमेशा याद आती है। हमारा आज कल बनकर यादों में बदल जाता है और फिर जरा जिक्र होते ही सब कुछ याद आ जाता है कभी यादों से चहरे पर मुस्कान आ जाती है तो कभी आँखे नम हो जाती है। यादें ऐसी ही होती है। हम सभी के पास यादों का पिटारा होता है जिसके खुलते ही कई यादें ताज़ा हो जाती है।















एक चुटकी प्रेम

मार्च बित गया था ठंड के नख़रे अब कम हो गए थे कम क्या यूँ कहें कि अब खत्म ही हो गये थे सूरज के तीखे तेवर जो शुरू हो गये थे। अब गर्मागर्म पकोड़े...

Sonal bhatt MULAKAT-KAHANIYO-SE STORY OF OUR LIFE