नन्दिता दीदी ने तो कहा था की स्टेशन से कुल तीस मिनिट ही लगेंगे कॉलोनी पहुँचने में पर ये टैक्सी वाले भईया ने तो पूरा एक घन्टा लगा दिया यहाँ से वहाँ , वहाँ से यहाँ ये गली वो सड़क और न जाने कितने मोड़
ऐसा लग रहा है जैसे टैक्सी वाले भईया हर एक रास्ते से मेरी पहचान करा रहे हो , जाने कितना गोल घुमाये जा रहे है। मैंने भी सोच लिए था की ये चाहे मीटर का कितना भी चार्ज
बताये मैं इन्हें एक पैसा भी ज्यादा नही देने वाली हूँ।
पूरे एक घन्टे बाद टैक्सी वाले भईया ने मुझे पुरानी कॉलोनी पहुँचा ही दिया। और जोकि मैंने पहले से तय कर रखा था वैसा ही किया टैक्सी का किराया भईया ने तो ज्यादा ही बताया पर स्टेशन से यहाँ तक आने का जो असल किराया बनता है मैंने उतने ही पैसे दिये।
ये टैक्सी वाले भी ना कोई अजनबी जो इस शहर में नया हो उसे यहाँ के रास्तो के बारे में कुछ मालूम न हो अगर वो टैक्सी मैं बैठ जाये तो ये पूरा शहर घुमाए बिना उसे सीधा उसकी मंजिल तक पहुँचा दे ऐसा तो
हो ही नही सकता। खुद से ही बाते करते में नन्दिता दीदी के दिये पते पर पहुँची और बेल बजाई। बहुत ही धीरे से दरवाजा खोलते हुए एक आंटी सामने नजर आई उम्र 55- 60 के बीच लगभग होगी। मैंने उन्हें नन्दिता दीदी के बारे में बताया आंटी ने इसके बाद दो चार सवाल किये और फिर मुझे ऊपर वाले कमरे की चाबी दे दी। चलो इस अंजान शहर में नन्दिता दीदी की मदद से रहने का इंतजाम तो हो गया थोड़ी राहत की साँस लेते हुए मैंने कहा।
अगले दिन सुबह जल्दी उठकर मैं कमरे को ठीक करने में लग गई मैंने कमरे का सामान अपने हिसाब से
सेट कर लिया। मुझे कुछ सामान मार्केट से भी लाना था इसलिए आंटी से मैंने आस- पास के मार्केट के बारे में पता किया और मार्केट के लिए निकल गई घर से बाहर निकलते वक्त मेरी नजर पड़ोस के घर की बाल्कनी पर पड़ी जहाँ एक अंकल कुर्सी पर बैठे हुए हाथ में अखबार लिए उसे पढ़ने की वो कोशिश कर रहे थे जोकि शायद वो करना ही नही चाहते क्योंकि उनकी निगाहे तो सामने टिकी हुई थी। रास्ते से कौन निकल रहा है सामने वाले घर से किसकी आवाज आ रही है और ये बच्चे यहाँ क्यों खेल रहे है उनके चहरे पर बार- बार बदलते भाव को देखकर यही लग रहा था की अंकल जी के माइंड में कुछ इस तरह की ही बाते चल रही है
ऐसा नही था कि मैंने ही अंकल जी को देखा उनकी नजर सब से होते हुए मुझ पर भी आ पड़ी और उन्होंने जैसे मुझे घूर कर देखा ऐसा लग रहा था जैसे की मैं कोई पुरानी दुश्मन हूँ जिससे वो आज भी अपना हिसाब बराबर करने के लिए बैठे हो। खैर मुझे तो मार्केट जाना था तो वक्त और न जाया करते हुए मैं मार्केट चली गई।
कानो में सुनाई पड़ता गायत्री मन्त्र मुझे ये बता रहा था की सुबह हो गई आंटी रोज़ सुबह गायत्री मन्त्र सुनती है। मैंने अपने लिए बढ़िया सा नाश्ता और लंच बनाया
और तैयार हो गई आज मेरा ऑफिस में पहला दिन है।
वैसे काम तो ठीक है बस मेरे कलीग्स ही थोड़े अजीब है या फिर वो मुझे ऐसे लग रहे है।
दो सप्ताह होने जा रहे है मुझे अभी तक यहाँ के लोगों
का व्यवहार समझ ही नही आया। कोई अपनापन नही सबका रवैया मेरे लिये बहुत बेरुखा सा लगता है मुझे। इस कॉलोनी का नाम जो पुरानी कॉलोनी है वो यहाँ के लोगों पर बिल्कुल फिट बैठता है ज्यादातर लोग पुराने ख्यालो वाले ही तो है। जब भी बाहर निकलती हूँ मुझे देखकर न जाने क्या आपस में बुदबुदाने लगते है बड़ी चीड़ होती है मुझे। और यहां ऑफिस में भी यही हाल मुझे यहां के बारे में ज्यादा कुछ पता है नही कभी बातो के बीच कुछ पूछ लेती हूँ तो मेरे कलीग्स ऐसे करते जैसे दूसरे शहर से नही आई हूँ मानो दूसरे ग्रह से आई हूँ जो कुछ नही जानती। और फिर मुझ पर हँसने लगते है।
यहाँ सब कुछ मेरे शहर से अलग है। सब पराया सा लगता है कुछ अपना नही है यही सोच - सोचकर काफी देर तक मुझे नींद नही आई पर फिर ऑफिस का ख्याल आया तो अपनी पलकों को मुंध कर मैं सो गई।
रविवार का दिन था कॉलोनी के कुछ लोग साथ में सुबह की सैर पर जा रहे थे मेरी मकान मालकिन आंटी ने मुझे भी चलने को कहा हालांकि उनके साथ वाली अंटियों का मन नही था पर मैं फिर भी चली गई।
बातो बातो में जब पड़ोस की नीलू आंटी ने मुरब्बे की बात की तो मैं भी बीच में बोल पड़ी की मेरी माँ के हाथ का मुरब्बा सबसे बेस्ट है आंटी ने अपनी भौहों को ऊपर उचकाते हुए कहा अच्छा खिलाना तब देखेंगे कितना अच्छा है। नीलू आंटी को मुरब्बा वाकई अच्छा लगा और शायद अब मैं भी थोड़ी अच्छी लगी। ऐसे ही जब पड़ोस के अंकल जी वही बाल्कनी वाले उनको किसी पॉलिसी के बारे में जानकारी चाहिए थी तब मैंने सारा कुछ सर्च किया और उन्हें बताया।
वैसे वो कुछ खास खुश तो नही हुए पर अब वो मुझे उतने नाराज से नही लगते जितना पहले लगते थे। अब मैं कभी किसी की हेल्प करती तो कोई कभी मेरी हेल्प कर देता।
धीरे- धीरे ऑफिस में भी मेरी सबके साथ बनने लगी थी दो चार अच्छे फ़्रेंड्स भी बन गये।इधर कॉलोनी वालो को मेरी और मुझे उनकी आदत अब होने लगी आहिस्ता- आहिस्ता ही सही पर मैंने सबके मन मैं थोड़ी सी जगह पा भी ली और अपने मन में सबके लिए जगह बना भी ली। सच कहुँ तो पहले मुझे भी यहाँ के लोग कुछ खास अच्छे नही लगते थे पर अब अच्छे लगने लगे है। पहले सुबह - सुबह गायत्री मन्त्र सुनना यानी नींद का खराब होना पर अब वही सुनकर मुझे बड़ा सुकुन सा लगता है। पहले यहाँ के लोगों को देख जो चीड़ वाला भाव था वो अब मुस्कुराहट में बदल गया है।इस नये शहर में कहीं दबा छुपा सा मुझे अपना शहर दिखने लगा है इन अनजाने की भीड़ में कुछ अपनो का साथ अब मिलने लगा है।
ये टैक्सी वाले भी ना कोई अजनबी जो इस शहर में नया हो उसे यहाँ के रास्तो के बारे में कुछ मालूम न हो अगर वो टैक्सी मैं बैठ जाये तो ये पूरा शहर घुमाए बिना उसे सीधा उसकी मंजिल तक पहुँचा दे ऐसा तो
हो ही नही सकता। खुद से ही बाते करते में नन्दिता दीदी के दिये पते पर पहुँची और बेल बजाई। बहुत ही धीरे से दरवाजा खोलते हुए एक आंटी सामने नजर आई उम्र 55- 60 के बीच लगभग होगी। मैंने उन्हें नन्दिता दीदी के बारे में बताया आंटी ने इसके बाद दो चार सवाल किये और फिर मुझे ऊपर वाले कमरे की चाबी दे दी। चलो इस अंजान शहर में नन्दिता दीदी की मदद से रहने का इंतजाम तो हो गया थोड़ी राहत की साँस लेते हुए मैंने कहा।
अगले दिन सुबह जल्दी उठकर मैं कमरे को ठीक करने में लग गई मैंने कमरे का सामान अपने हिसाब से
सेट कर लिया। मुझे कुछ सामान मार्केट से भी लाना था इसलिए आंटी से मैंने आस- पास के मार्केट के बारे में पता किया और मार्केट के लिए निकल गई घर से बाहर निकलते वक्त मेरी नजर पड़ोस के घर की बाल्कनी पर पड़ी जहाँ एक अंकल कुर्सी पर बैठे हुए हाथ में अखबार लिए उसे पढ़ने की वो कोशिश कर रहे थे जोकि शायद वो करना ही नही चाहते क्योंकि उनकी निगाहे तो सामने टिकी हुई थी। रास्ते से कौन निकल रहा है सामने वाले घर से किसकी आवाज आ रही है और ये बच्चे यहाँ क्यों खेल रहे है उनके चहरे पर बार- बार बदलते भाव को देखकर यही लग रहा था की अंकल जी के माइंड में कुछ इस तरह की ही बाते चल रही है
ऐसा नही था कि मैंने ही अंकल जी को देखा उनकी नजर सब से होते हुए मुझ पर भी आ पड़ी और उन्होंने जैसे मुझे घूर कर देखा ऐसा लग रहा था जैसे की मैं कोई पुरानी दुश्मन हूँ जिससे वो आज भी अपना हिसाब बराबर करने के लिए बैठे हो। खैर मुझे तो मार्केट जाना था तो वक्त और न जाया करते हुए मैं मार्केट चली गई।
कानो में सुनाई पड़ता गायत्री मन्त्र मुझे ये बता रहा था की सुबह हो गई आंटी रोज़ सुबह गायत्री मन्त्र सुनती है। मैंने अपने लिए बढ़िया सा नाश्ता और लंच बनाया
और तैयार हो गई आज मेरा ऑफिस में पहला दिन है।
वैसे काम तो ठीक है बस मेरे कलीग्स ही थोड़े अजीब है या फिर वो मुझे ऐसे लग रहे है।
दो सप्ताह होने जा रहे है मुझे अभी तक यहाँ के लोगों
का व्यवहार समझ ही नही आया। कोई अपनापन नही सबका रवैया मेरे लिये बहुत बेरुखा सा लगता है मुझे। इस कॉलोनी का नाम जो पुरानी कॉलोनी है वो यहाँ के लोगों पर बिल्कुल फिट बैठता है ज्यादातर लोग पुराने ख्यालो वाले ही तो है। जब भी बाहर निकलती हूँ मुझे देखकर न जाने क्या आपस में बुदबुदाने लगते है बड़ी चीड़ होती है मुझे। और यहां ऑफिस में भी यही हाल मुझे यहां के बारे में ज्यादा कुछ पता है नही कभी बातो के बीच कुछ पूछ लेती हूँ तो मेरे कलीग्स ऐसे करते जैसे दूसरे शहर से नही आई हूँ मानो दूसरे ग्रह से आई हूँ जो कुछ नही जानती। और फिर मुझ पर हँसने लगते है।
यहाँ सब कुछ मेरे शहर से अलग है। सब पराया सा लगता है कुछ अपना नही है यही सोच - सोचकर काफी देर तक मुझे नींद नही आई पर फिर ऑफिस का ख्याल आया तो अपनी पलकों को मुंध कर मैं सो गई।
रविवार का दिन था कॉलोनी के कुछ लोग साथ में सुबह की सैर पर जा रहे थे मेरी मकान मालकिन आंटी ने मुझे भी चलने को कहा हालांकि उनके साथ वाली अंटियों का मन नही था पर मैं फिर भी चली गई।
बातो बातो में जब पड़ोस की नीलू आंटी ने मुरब्बे की बात की तो मैं भी बीच में बोल पड़ी की मेरी माँ के हाथ का मुरब्बा सबसे बेस्ट है आंटी ने अपनी भौहों को ऊपर उचकाते हुए कहा अच्छा खिलाना तब देखेंगे कितना अच्छा है। नीलू आंटी को मुरब्बा वाकई अच्छा लगा और शायद अब मैं भी थोड़ी अच्छी लगी। ऐसे ही जब पड़ोस के अंकल जी वही बाल्कनी वाले उनको किसी पॉलिसी के बारे में जानकारी चाहिए थी तब मैंने सारा कुछ सर्च किया और उन्हें बताया।
वैसे वो कुछ खास खुश तो नही हुए पर अब वो मुझे उतने नाराज से नही लगते जितना पहले लगते थे। अब मैं कभी किसी की हेल्प करती तो कोई कभी मेरी हेल्प कर देता।
धीरे- धीरे ऑफिस में भी मेरी सबके साथ बनने लगी थी दो चार अच्छे फ़्रेंड्स भी बन गये।इधर कॉलोनी वालो को मेरी और मुझे उनकी आदत अब होने लगी आहिस्ता- आहिस्ता ही सही पर मैंने सबके मन मैं थोड़ी सी जगह पा भी ली और अपने मन में सबके लिए जगह बना भी ली। सच कहुँ तो पहले मुझे भी यहाँ के लोग कुछ खास अच्छे नही लगते थे पर अब अच्छे लगने लगे है। पहले सुबह - सुबह गायत्री मन्त्र सुनना यानी नींद का खराब होना पर अब वही सुनकर मुझे बड़ा सुकुन सा लगता है। पहले यहाँ के लोगों को देख जो चीड़ वाला भाव था वो अब मुस्कुराहट में बदल गया है।इस नये शहर में कहीं दबा छुपा सा मुझे अपना शहर दिखने लगा है इन अनजाने की भीड़ में कुछ अपनो का साथ अब मिलने लगा है।


