चुपके- चुपके भाग- 2




जिसे देखनो को आँखे तरस रही हो और वो अचानक सामने आ जाये तब कैसा महसूस होता है ये बता पाना थोड़ा मुश्किल है। देविका मेरे सामने है उसने मुझे देख भी लिया है बस कुछ कह नही रही। बल्कि उसने तो अपनी नजरे ही फेर ली।
बिना बताये बिना कुछ कहे देविका मेरी जिंदगी से दूर चली गई। मैंने उसके दोस्तो से उसके बारे में जानना
चाहा पर किसी ने कुछ नही बताया। वो मुझसे नाराज थी खफा थी पता नही। लेकिन शायद उसे मुझ पर भरोसा नही था। इसीलिए तो मेरी शादी की बात जोकि किसी और से उसे पता चली वो जानते ही वो
मुझे छोड़कर चली गई बिना सच को जाने।
आज दो साल बाद हम मिले है देविका तो कुछ नही कह रही पर मैं चुप नही रह सकता लेकिन अभी अपने ऑफिस के दोस्तो के सामने कुछ कह भी नही सकता।
बस अगले स्टेशन का इंतजार है।
अगले स्टेशन पर जब गाड़ी रुकी और देविका जैसे ही गाड़ी से उतरी मैं भी फ़ौरन उसके पीछे चला गया।
देविका आगे- आगे और मैं उसके पीछे - पीछे। वो एक टी- स्टॉल के पास रुकी। वो कुछ कहती उसके पहले मैं बोल पड़ा भईया दो ग्लास चाय देना। एक ग्लास मैंने अपने हाथ में लिया और दूसरा ग्लास देविका के हाथ में थमाया। हम दोनो उस लंबी सी चियर पर जाकर बैठ गये जो स्टेशन पर यात्रियों के लिए होती है। आज बिल्कुल वैसी स्थिति थी जैसी उस दिन मॉल
में थी। बात तो करना चाहते है पर शुरू कैसे करे ये समझ ही नही आ रहा था ज्यादा ना सोचते हुए मैंने ही
बात करना शुरू किया।
कैसी हो , उसने कहा- ठीक हूँ। और तुम ?
मैंने कहा मैं भी बढ़िया हूँ।
देविका ने दबी सी आवाज में पूछा - और तुम्हारी वाइफ।
ये सुनते ही मैं पहले तो समझ ही नही पाया की मैं इसे
क्या कहूँ पर फिर मैंने कह दिया हाँ ठीक है।
देविका को देखकर लग नही रहा था की उसकी शादी हो गई है पर फिर भी मैंने जानने के लिए उससे पूछ लिया तुमने शादी की या नही ये पूछते वक्त मन में एक घबराहट सी भी हो रही थी पर जब देविका ने कहा - नही।
ये सुनकर मन में खुशी की एक लहर सी दौड़ गई
पर देविका खुश नजर नही आ रही थी
इसके बाद देविका ने मुझसे एक और सवाल किया
बहुत ही हिचकिचाते दबी-दबी आवाज में उसने मुझसे
पूछा- तुम्हारी वाइफ बहुत खूबसूरत है।
मैंने कहा हाँ वो बहुत खूबसूरत है झील सी गहरी आँखे, सुनहरे बाल और बड़ी प्यारी सी उसकी मुस्कान।
देविका का चेहरा देखने लायक था ऐसा लगा जैसे उसे कुछ खास अच्छा नही लगा मेरी बाते सुनकर।  इसके बाद तो मैंने जमकर अपनी वाइफ की तारीफ करना शुरू कर दिया।
ट्रेन चलने वाली थी देविका ने मुझे टोकते हुए कहा बस- बस बहुत है ट्रेन चलने वाली है चलते है।
हम जाकर वापस गाड़ी में बैठ गये। देविका उदास सा चेहरा बना चुपचाप बैठी हुई थी शायद मन ही मन कुछ सोचे जा रही थी उसका उदास चेहरा मुझे बिल्कुल अच्छा नही लग रहा था पर क्या करूँ दो साल तक मैं भी तो कितना परेशान रहा उदास रहा।
इसलिए इसे थोड़ा परेशान करना तो बनता है।
मैंने आने बहाने कर अपने दोस्त से अपनी जगह बदल ली। अब मैं देविका के बिल्कुल सामने बैठा हुआ था।
देविका की आँखो में मेरे लिए गुस्सा साफ नजर आ रहा था। मैं बस इस इंतजार में था की वो अपनी नाराजगी मुझ पर जताये। पर वो चुप रही। सफर खत्म होने वाला था ट्रेन कानपुर पहुँचने वाली थी।
ट्रेन के रुकते ही यात्री उतरना शुरू हो गये हम सब प्लेटफॉर्म पर थे देविका मुझसे बिना कुछ कहे चली जा रही थी मैंने उसका हाथ पकड़कर उसे रोक लिया
और कहा- पहले भी ऐसे ही बिना बताये मेरी लाइफ से चली गयी थी अभी भी बिना कुछ कहे जा रही हो।
मुझसे जिसकी इतनी तारीफ सुनी क्या एक बार उसकी फोटो भी नही देखोगी। मैंने अपने पॉकेट में से पर्स निकाला और देविका को पर्स में लगी फोटो दिखाई। देविका की आँखो से मोटे- मोटे मोती के जैसे आँसू छलकने लगे। मेरे पर्स में किसी और की नही बल्कि उसी की ही फोटो है। मैंने उससे कहा - कभी भी पूरी बात जाने बिना या सच को जाने बिना हमे कोई भी बड़ा फैसला नही लेना चाहिए।
मैंने किसी से शादी नही की। हाँ बस मेरे घर वाले मेरी शादी के लिए सोच रहे थे। लेकिन फिर मैंने देविका के बारे में अपने घर में सबको बता दिया था और उन्हें हमारे रिश्ते से कोई एतराज नही था पर ये बात मैं देविका को बता ही नही पाया क्योंकि उससे पहले ही वो जा चुकी थी।
और आज जाकर मिली है मैंने उसे सारी बात बता दी है देविका को इस बात का एहसास हो गया है की
उसे इतनी जल्दी फैसला नही लेना चाहिए था। उस वक्त मुझे इस बात से ज्यादा दुख पहुँचा था की उसने मुझ पर भरोसा क्यों नही किया। सोचा था जब भी मिलूँगा खूब गुस्सा करूँगा पर नही कर सका।
देविका को देखते ही सब भूल गया।
मैं खुश हूँ आखिर देविका और मैं फिर मिल गये।












चुपके- चुपके



जब कहीं जाना हो तब लेट जरूर होते है पर फिर भी मैंने जल्दी- जल्दी अपना सामान पैक किया और टेक्सी में बैठ स्टेशन पहुँच गई। दिवाली की पाँच दिन की छुट्टी ऑफिस से मिली ही है पर मैंने पाँच दिन की और लेली। स्टेशन पहुँची तो भीड़ का सामना करना पड़ा । कोई अपने घर अपने शहर जा रहा था तो कोई आ रहा था। कितने ऐसे लोग है जो या तो पढ़ाई के लिए या फिर जॉब की वजह से अपने घर से दूर दूसरे शहर जाकर रह रहे है। मैं भी उनमे से एक हूँ। भीड़ का सामना करते हुए मैं जैसे- तैसे गाड़ी  के पास पहुँच गई और अपनी सीट पर जा बैठी। सीट पर बैठने के बाद मैंने एक लम्बी गहरी साँस ली। बिल्कुल वैसी ही जैसी कोई रेस जितने के बाद लेते है और खुद से कहते है आखिर मैं जीत ही गयी या जीत ही गया।
   अब मन में थोड़ी खुशी महसूस हो रही है वो इसलिए के आखिरकार मैं घर जा पा रही हुँ। छूट्टी तो मिल गई थी पर रिजर्वेशन कंफर्म नही हो पा रहा था। जोकि बाद में हो ही गया। वैसे ये पहली बार ही है जो मैं अकेले जा रही हूँ वर्ना हमेशा जब भी घर जाना हो तब पापा मुझे लेने आते है।इस बार किसी वजह से वो नही आ सके तो मैंने उन्हें  कह दिया है की वो फिक्र ना करे मैं अकेले बिना किसी परेशानी के ठीक से आ जाउंगी।
घड़ी में चार बजे और ट्रेन चलना स्टार्ट हो गई। यात्री अपनी - अपनी सीट पर आकर बैठ गये।
मेरे बगल वाली सीट पर एक शादी शुदा जोड़ा बैठा हुआ है  जोकि साथ में बड़े अच्छे लग रहे है। और सामने वाली सीट पर भी कुछ लोग है जोकि आपस में खूब बाते किये जा रहे है इन्हें देखकर लगता है कि
शायद ये एक ही ऑफिस के स्टाफ मेंम्बर्स है क्योंकि वे साथ मिलकर  किसी  टॉपिक पर डिस्कशन कर रहे है इनके साथ बैठा एक और शक्स है जिसको शायद अपने साथियो के डिस्कशन में कोई दिलचस्पी नही है वह अपने हाथ में मैग्ज़ीन थामे कुछ पढ़ रहा है जिस तरह से उस व्यक्ति ने मैग्ज़ीन पकड़ी हुई है उससे उसका चेहरा नजर नही आ रहा है।
वैसे मैं कभी किसी पर ऐसे ज्यादा ध्यान नही देती हूँ  वो तो अभी मैं अकेली हूँ और थोड़ा बोर हो रही हूँ इसलिए नजर आसपास बेठे लोगों पर जा रही है।
थोड़ी देर शांत बेठे रहने के बाद मैं अपने मोबाइल से गाने सुनने लगी। गाने सुनते वक्त मेरी नजर दोबारा
सामने बैठे लोगों पर पड़ी और साथ ही उस सक्श पर भी जो मैग्ज़ीन पढ़ रहा था इस वक्त उसका चेहरा साफ नजर आ रहा था काले चमकीले बाल गेहुआ रंग और हल्की भूरी आँखे। हम दोनो की ही नजरे टकरा गई और कुछ पल के लिए तो थम सी ही गई। देवांश, ये देवांश है उसे देख साफ पता चल रहा था कि उसने भी मुझे पहचान लिया।
हमारी मुलाकात कॉलेज में युवा उत्सव फंक्शन के दौरान हुई थी। मुझे याद है मैं और मेरे फ़्रेंड्स अपनी परफॉमेंस के लिए रेडी थे और बैक स्टेज अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। तभी देवांश आया ट्रेडिशनल लुक में थोड़ा हैरान सा उसने आते ही हमसे कहा सुनिये हमारी परफॉमेंस आपसे पहले है प्लीज़ हमे आगे जाने दीजिये। देवांश और उसका ग्रुप दूसरे कॉलेज से थे। वो सिर्फ युवा उत्सव में अपनी परफॉमेंस देने आये थे। ये हम पहली बार मिले थे। हमारे ग्रुप को
सेकेंड प्राइस मिला जबकि देवांश के ग्रुप को फर्स्ट
प्राइस मिला। फिर प्रतिभागईयो की साथ में फोटो
ली जाने लगी। मैं फर्स्ट न आने की वजह से थोड़ी सेड थी इसलिए उदास सा चेहरा बनाकर खड़ी हुई थी। तब देवांश ने मुझे मुस्कुराते हुए स्माइल करने का इशारा दिया। मैं समझ गई थी कि देवांश मुझे फोटो के लिए स्माइल करने को कह रहा है मैं थोड़ा सा मुस्कुराई और फोटो क्लिक हो गई। इसके बाद सभी
प्रतिभागी एक दूसरे से मिले , जो जीते उन्हें बधाई दी गई। इसी बीच देवांश और मेरी बात भी हुई बहुत ज्यादा नही बस थोड़ी। पर मेरे लिए ये बहुत थी क्यों
ये तो पता ही नही।
इस दिन के बाद हम फिर मिले मेरे फ़्रेंड की पार्टी में। फंक्शन के दौरान शायद ऋषि और देवांश की दोस्ती हो गई थी  इसलिये तो ऋषि ने देवांश को भी बुलाया था आज हमारी बात तो नही हुई हाँ बस मुलाकात
हुई चुप-चुपके मेरी नजरे देवांश को ही देख रही थी।  करीब दो महीने बाद ,
मैं एक दिन शॉपिंग के लिए मॉल गई हुई थी तब वहीं
अचानक देवांश और मेरी एक बार फिर मुलाकात हो गई। सबसे पहले हमने एक दूसरे को हाय - हेलो कहा बिल्कुल उसी तरह जब दो लोग एक दूसरे को पहचानते तो हो बस जानते नही वैसे ही। वैसे मेरी शॉपिंग पूरी हो गई थी पर मैं थोड़ा थक भी गई थी जो शायद देवांश को मुझे देखकर समझ आ गया था। इसलिए उसने मुझे कॉफी ऑफर की और मैंने हाँ कह दिया क्योंकि मैं कुछ देर आराम से बैठना चाह रही थी मैं और देवांश कैफे में बिल्कुल आमने -सामने बैठे थे कॉफी तो पी ली थी पर अब बात क्या करे ये समझ नही आ रहा था मैं कभी यहाँ- वहाँ देखती तो कभी देवांश की ओर देखती
और देवांश , वो भी कभी कॉलेज के फंक्शन की बात करता तो कभी ऋषि की पार्टी की। कुछ देर बाद तो वो भी चुप बैठ गया। फिर मैंने ही बात करना शुरू किया।
कॉफी अच्छी थी ना, मैं पहले भी यहाँ आ चुकी हूँ फिर देवांश ने कहा हाँ। ऐसे ही धीरे-धीरे बात करते हमने दो
घन्टे तक बाते की। और क्योंकि अब दोस्ती हो गई तो कभी - कभी मुलाकाते भी होने लगी। लेकिन अब हम जब मिलते थे तो होता ये था की देवांश बाते करता और मैं चुपचाप उसे देखती रहती क्या करती मुझे उसे देखते रहना ही अच्छा लगता था। ऐसे ही ही हमारी लाइफ आगे बढ़ी जा रही थी। पर
एक दिन मुझे पता चला कि देवांश की शादी फिक्स हो गई है उसके घरवालो ने ही उसके लिए एक लड़की पसन्द कर ली है। देवांश ने मुझे इस बारे में कुछ नही
बताया पर मुझे उसके दोस्तो से ये बात मालूम हुई।
मैं नही जानती थी के देवांश का क्या फैसला है पर मैंने
एक फैसला ले लिया। मैं बिना कुछ कहे बिना कुछ बताये देवांश की लाइफ से दूर हो गई।  ना कोई बात ना मुलाकात। मुझे जबलपुर में जॉब मिल गई और मैं यहाँ आ गई। मैं नही चाहती थी की मेरी वजह से उसकी लाइफ में कोई भी प्रोब्लम आये। बस इसलिए यहाँ आ गई।
आज दो साल बाद मैंने देवांश को देखा बिल्कुल नही बदला वैसा ही है पहले जैसा। उसने भी मुझे देख लिया है पर ना वो कुछ कह रहा है और ना मैं। आज हम दोनो ही चुप है। हम एक दूसरे को पहचानते भी है और जानते भी है  पर फिर भी आज अजनबी है।















एक चुटकी प्रेम

मार्च बित गया था ठंड के नख़रे अब कम हो गए थे कम क्या यूँ कहें कि अब खत्म ही हो गये थे सूरज के तीखे तेवर जो शुरू हो गये थे। अब गर्मागर्म पकोड़े...

Sonal bhatt MULAKAT-KAHANIYO-SE STORY OF OUR LIFE