एक हाथ से अपना बैग पकड़े उसे खींचते हुए और दूसरे हाथ में फोन पकड कर अपने दोस्त से बात करते हुए मैं स्टेशन पर चला जा रहा था और मेरी ट्रेन
आ गई। जिन यात्रियों को स्टेशन पर उतरना था वो उतर गये और जिन्हें ट्रेन में बैठना था वो ट्रेन में चढ़ने लगे। मैं भी ट्रेन में चढ़ा और अपनी सीट ढूंढकर
वहाँ बैठ गया। मैं पहली बार जयपुर जा रहा हूँ इस बार मीटिंग वहाँ पर है। मैं अपने बॉस से बड़ा ही खुश हूँ। वो हमेशा अलग-अलग जगह मीटिंग फिक्स करते है ताकि काम का काम हो जाये और थोड़ा घूमना भी।आम तौर पर सफर के दौरान लोगों को नींद आने लगती है पर मुझे तो बिल्कुल भी नींद नही आती। मैं इधर - उधर देखते हुए कभी बुक पढ़ते हुए अपना समय निकालता हूँ। क्योंकि आज का सफर रात का है तो शायद मैं सो भी सकता हूँ। वैसे फिलहाल मैं अभी अपनी बुक ही पढूंगा गाड़ी भी स्टेशन से चल दी। मैंने बुक पढ़ना शुरू ही किया की आवाज आई अंकल ये सीट मेरी है। मैंने नजर उठा कर देखा तो एक लड़की दिखी जोकि सामने की सीट पर बैठे
अंकल से ये कह रही थी। अंकल जी उठकर अपनी सीट पर जा बैठे और वो लड़की अपनी सीट पर बैठ गई। मुझे तो वो लड़की गुस्से में लग रही थी। खैर मुझे क्या करना भई मैं तो वापस अपनी बुक पढ़ने लगा। कुछ देर बाद जब मेरी नजर उस लड़की पर पड़ी तो मैने देखा की वो मेरी ओर ही देख रही है कुछ देर तक मैं भी बुक की आड़ में उसकी ओर देखता रहा वो तब भी मेरी ओर ही देख रही थी पहले तो मैं मन में बड़ा ही खुश हो गया ये सोचकर की मैं इतना अच्छा लगता हूँ की लडकियाँ मुझे देखती ही रह जाती है। मैं बड़े ही इतराते हुए पीछे टिक्कर थोड़ा तिरछा होकर बैठ गया। और बड़े ही ध्यान से बुक पढ़ने लगा। वैसे उस वक्त मैं पढ़ नही रहा था बल्कि मैं
चोरी से उस लड़की की ओर ही देख रहा था कि क्या वो मुझे अभी भी देख रही है।
लेकिन उसने मेरी सोच को गलत साबित करते हुए मुझे इशारे में समझाते हुए बताया की वो मुझे नही बल्कि मेरे हाथ में जो बुक है उसे देख रही है।
शायद वो बुक पर लिखे लेखक का नाम पढ़ने की कोशिश कर रही थी। और मैं ना जाने क्या सोचने लगा। आधे घन्टे बाद एक स्टेशन पर गाड़ी कुछ वक्त के लिए रुकी। तभी उस लड़की ने पानी की खाली बोतल अपने बैग से निकाली और उसे पकड़ कर बैठ गई शायद उसे पानी चाहिए था पर वो उठकर जाना नही चाह रही थी। उसने बस एक बार मेरी ओर देखा तब मैं उठकर बाहर ही जा रहा था इसीलिए मैंने उसकी ओर हाथ बढ़ा दिया और उसने तुरन्त बोतल मेरे हाथ में थमा दी और मैने उसे पानी लाकर दे दिया। गाड़ी स्टेशन से चलने लगी और बाकी के यात्री भी अपनी सीट पर आकर बैठ गये रात के करीब 10 बज गये थे मुझे भूख का एहसास हो रहा था। माँ ने जो खाना मेरे लिए रखा था मैंने वो खा लिया मैंने अपने बगल में बैठे अंकल और सामने बैठी उस लड़की से भी पूछा पर अंकल ने भी मना कर दिया और उस लड़की ने भी एक छोटी सी मुस्कुराहट के साथ ना का इशारा कर दिया। उस वक्त मैं उसकी ना से नही बल्कि इस बात से हैरान
था की शुरू में गुस्से में लग रही और बाद में एक दम चुपचाप सी बैठी लड़की अभी थोड़ा मुस्कुराई भी।
खैर मुझे उससे क्या करना मैंने तो खाना खाया और अपनी बुक लेकर फिर पढ़ना शुरू कर दिया। पढ़ते- पढ़ते रात के 1 बज गये आसपास नजर घुमाकर देखा तो सारे यात्री सोये नजर आ रहे थे। पर जब सामने देखा तो वो लड़की जाग रही थी। शांत चुपचाप खिड़की से बाहर की ओर देख रही थी। शायद कुछ सोच रही होगी। उसने मुझे नही देखा पर मैं जरूर उसे देख रहा था
पता नही क्यों नजर बार-बार उसकी ओर जा रही थी।
वैसे मैं कभी किसी की तरफ इतने गौर से नही देखता हूँ। हाँ पर आज देख रहा था। उसकी झपकती पलके देखना मुझे अच्छा लग रहा था। लेकिन जैसे ही उसकी नजर मुझ पर पड़ी मैं घबरा गया ये सोचकर की कही वो मुझे बुरा व्यक्ति ना समझले। इसलिए मैने जल्दी से नजरे फेर ली। कुछ देर तक मैंने सामने की ओर देखा ही नही। पर ज्यादा देर तक मैं खुद को रोक ना पाया बुक को अपने चहरे के सामने कर मैं फिर से उसकी आड़ में चुपके से उस लड़की को देखने की कोशिश करने लगा ये जानने के लिए की कही उसकी नजर मेरी ओर तो नही है पर उसने मुझे देख लिया वो गुस्से में मुझे घूरे जा रही थी मैं डर गया। उसने आँखो से हाथ की ओर इशारा किया। मैंने देखा तो उसके हाथ में चाय का ग्लास था
जोकि उसने मेरी ओर बढ़ाते हुए हाथ में थमा दिया।
उसके दूसरे हाथ में भी एक चाय का ग्लास था वो फिर थोड़ा सा मुस्कुराई और चाय पीने लगी। मुझे पता ही नही चला था की कब अगला स्टेशन आ गया और सुबह के 5 बज गये। खैर मैने चाय पीली। अब हाल ये था की थोड़ी थोड़ी देर में हम दोनो की ही नजरे बार बार एक दूसरे पर पड़ रही थी और इसी तरह कुछ घन्टो में ये सफर खत्म हो गया। गाड़ी जयपुर आ गई और हम दोनो अपनी-अपनी राह चले गये बस मन में एक बात रह गई की उसका नाम क्या था। वैसे मुझे उससे क्या करना पर फिर भी मैं यही सोच रहा हूँ की उसका नाम क्या था।


