चिट्ठी



पुराने जमाने में चिट्ठियों का बोहोत ही उपयोग किया
जाता था  प्रेमी जोड़े अपने दिल की बात कहने के
लिए चिट्ठियों का ही सहारा लेते थे हमारी आज की
कहानी ऐसी ही एक प्यार भरी चिट्ठी से जुड़ी हुई है।
      राधिका घर की सफाई करते हुए बड़बड़ाये
जा रही थी कुछ दिनों के लिए मायके क्या चले जाओ
इन पतियो से घर की रेख देख भी नही हो पाती। क्या
हालत कर दी है पूरे घर की। सारा सामान यँहा वँहा
बिखरा पड़ा है। विनय भी ना कुछ नही होता इनसे
बस सब बिगाड़ सकते है ठीक करना तो आता ही नही
है। सफाई करने और अल्मारी  में सामान जमाने के
बाद राधिका की नजर अल्मारी के ऊपर रखे बॉक्स
पर पड़ती है। गुस्सा करते हुए राधिका - इस बॉक्स में
भी न जाने क्या भर कर रखा है पता नही काम का
सामान है भी के नही आज मैं इसे देखती हूँ ।
राधिका बॉक्स को नीचे उतार कर उसमे रखा सामान
देखने लगती है। बॉक्स में विनय का कॉलेज के समय
का कुछ सामान था। सबसे पहले उसमे से एक शर्ट
निकली जिस पर पेन से कुछ लिखा हुआ था
शायद  उसके
दोस्तो ने लिखा था याद रखना भूल मत जाना, किसी ने लिखा था खुश रहो सफल रहो, तो किसी ने
लिखा मेरी शादी में जरूर आना माय फ़्रेंड, तो किसी
ने कुछ कार्टून बनाया हुआ था। ये शर्ट शायद विनय ने
कॉलेज के लास्ट डे पर पहनी होगी। तभी तो विनय के
दोस्तो ने इस पर कुछ न कुछ लिखा है। शर्ट के बाद
राधिका का के हाथ कुछ ग्रीटिंग्स कार्ड और फ़्रेंडशिप
बेंड आये। जिन्हें राधिका ने देखा और फिर रख दिया
उसके बाद हाथ आई एक डायरी जिसमे शायरियां
लिखी थी। विनय को शायरियां आती है  ये तो राधिका
को पता ही नही था। राधिका की परेशानी यही से शुरू  होती है। क्योंकि इस डायरी से राधिका के हाथ
लगती है एक चिट्ठी। जिसे पढ़ राधिका परेशान हो जाती है। आखिर चिट्ठी में ऐसा क्या लिखा था
दरसल चिट्ठी में लिखा था-
 आज तुम ब्लैक सर्ट में बोहोत अच्छे लग रहे थे
 पता है में पूरे समय तुम्हे ही देखती रही एक भी
 लेक्चर ध्यान से नही सुना। और तुम हो की एक
 बार भी मेरी तरफ नही देखा। पर मैं तुम से नाराज
 नही हूँ।  और न ही हो सकती हूँ  तुम से इतना प्यार
जो करती हूँ। कल पार्क मिलेंगे

इसके आगे और भी बहुत कुछ लिखा था जो की
राधिका ने पढ़ा। चिट्ठी के
आखरी में लिखा था मेरे प्यारे विन्नू।
चिट्ठी लिखने वाली के चाहे कितने भी प्यारे हो विन्नू
पर राधिका को जरूर अभी विनय बिल्कुल भी प्यारे
नही लग रहे थे। राधिका ने बॉक्स का सारा समान
 बॉक्स में रख उसे वापस ऊपर रख दिया। और चिट्ठी अपने पास रख ली। अब वह शाम होने का
इंतजार करने लगी। राधिका ने सोच लिया था।
कि जैसे ही विनय आएंगे वह उनसे चिट्ठी के विषय में
बात करेगी। विनय के ऑफिस से आने के बाद
राधिका ने पूछना तो चाहा पर पूछ ना सकी।
अगले दिन राधिका ने बातो ही बातो में  मजाक करते
हुए विनय से कहा- कॉलेज  में तुम्हारी कोई प्रेमिका तो
जरूर रही होगी।
विनय ने हस्ते हुए कहा तुम्हे ऐसा क्यों लगता है
राधिका ने जवाब देते हुए कहा- तुम हो ही इतने अच्छे
कोई न कोई तो जरूर पीछे पड़ गई होगी तुम्हारे।
सच बोलो कोई थी क्या।
विनय ने कहा- ये क्या बाते कर रही हो कोई नही थी
यार। मैं ऑफीस जा रहा हूँ ठीक है बाय।
ऐसा कह विनय चला गया। लेकिन राधिका के मन में
अभी भी चिट्ठी वाली बात चल रही थी।
 उसी दिन दोपहर में विनय फोन करके बताता है की
शाम को कोई मेहमान आने वाले है तो वह उनके
लिए भी डिनर तैयार रखे।
शाम को विनय और राधिका मेहमान के आने
का इंतजार कर रहे थे काफी देर हो गई थी अब तक
कोई नही आया था। तभी डोर बेल बजी विनय और
राधिका दोनो दरवाजे के पास गये। विनय ने दरवाजा
खोला सामने एक खूबसूरत सी महिला खड़ी थी
जिसने लाल रंग की साड़ी पहनी हुई थी। विनय उसे
देखते ही मुस्कुरा दिया और कहने लगा बड़ी देर लगा दी आने में चलो अंदर आओ। महिला अंदर आती
है राधिका उसके लिए पानी लाती है और वही विनय
के बगल में आकर बैठ जाती है। विनय पूछता है तुम
अकेली ही आई हो अन्नू विजय क्यों नही आया। वह कहती है उसे कुछ काम था वह दो दिन बाद आयेगा।
राधिका कहती है आपका नाम अन्नू है।
अन्नू मुस्कुराते हुए कहती है कॉलेज में सारे दोस्त मुझे
अन्नू कहते थे। हम कॉलेज फ़्रेंड है ना इसलिए ये मुझे
अन्नू कह कर पुकार रहा है वैसे मेरा नाम अनामिका
है।
तीनो कुछ देर बैठकर बाते करते है और फिर डिनर करते है डिनर के वक्त अनामिका कहती है तुम्हे
चावल की खीर कितनी पसन्द थी ना विन्नू आज भी पसंद है
या नही। राधिका सुनते ही पूछ पड़ती है विन्नू
क्या इनको भी सब विन्नू कहकर पुकारते थे  विनय
राधिका को बताता है के सिर्फ अनामिका और विजय
ही उसे विन्नू के नाम से पुकारते थे।
राधिका को चिट्ठी याद आ जाती है उसमे भी तो यही
लिखा था विन्नू। राधिका सोचने लगती है कही
वो चिट्ठी अनामिका की ही तो नही है।राधिका के मन
में शक आ जाता है।
डिनर के बाद अनामिका और विनय साथ बैठ कर
बाते करने लगते है जोकि राधिका को मन ही मन बुरा
लग रहा होता है। राधिका अनामिका से कहती है
आप थक गई होंगी आप जाकर सो जाइये। बाते तो
कल भी हो जायेगी। लेकिन बीच में ही विनय बोल
पड़ता है अरे नही अन्नू थोड़ी देर और बात करते है
क्या तुम्हे नींद आ रही है। अन्नू कहती है नही
विनय कहता है तो बस बैठी रहो अरे राधिका तुम्हे
नींद आ रही हो तो तुम जाकर सो जाओ। विनय की
बात सुन राधिका को गुस्सा तो बोहोत आता है पर
वह कुछ कह भी तो नही सकती थी इसलिए खुद ही अपने कमरे में जाकर सो जाती है पर नींद भी कहा आने वाली थी। राधिका तो बस उन दोनो के बारे में ही
सोचे जा रही थी इसी बीच राधिका की आँख लग जाती है और वह सो जाती है।
अगली सुबह राधिका सबके लिए नाश्ता बना रही होती है तभी विनय आकर बताता है की वह आज ऑफिस से जल्दी  आ जायेगा। अनामिका को मार्केट
जाना है तो वह उसे ले जायेगा। राधिका ने बोहोत ही धीरे से कहा ठीक है।
राधिका मन ही मन घुटे जा रही थी।बस अब उसे सच
जानना था। काम से निपट राधिका अनामिका के पास
जा बैठी वह उससे कॉलेज के समय की बाते पूछने
लगी दरसल बातो में फसाकर राधिका अनामिका से
उसके और विनय के रिश्ते के बारे में जानना चाह रही
थी पर इस सब से राधिका के हाथ कुछ नही आया ।
बिचारी राधिका खुद के ही सवालो में उलझे जा
रही थी। परेशान राधिका अचानक उठकर जाती है
और कागज पेन लेकर आती है।वह अनामिक से
कहती है मुझे एक चिट्ठी लिखनी है क्या आप लिख
दोगी। मेरे ताऊजी गाँव में रहते है उन्हें ही यह चिट्ठी
भेजनी है। अनामिका ने कहा- तुम क्यों नही लिख रही
हो।
राधिका भोला सा चेहरा बनाते हुए कहती है वो मेरी उंगली में चोट लग गई है इसीलिए। अनामिका चिट्ठी लिख देती है।राधिका तुरन्त चिट्ठी लेजाकर उस चिट्ठी से लिखावट मिलाती है जो उसे डायरी में से
मिली थी। दोनो चिट्ठी की लिखावट बिल्कुल एक
जैसी थी राधिका को अब यकीन हो जाता है की विनय
के नाम चिट्ठी अनामिका ने ही लिखी थी।
शाम को जब विनय और अनामिका मार्केट से होकर
वापस आते है तब राधिका का व्यवहार अनामिका के साथ बहुत ही रूखा सा होता है। वह इस तरह नाराज
थी की उसने गुस्से में खाने में ढेर सारी मिर्च मिला दी
और खीर में शक्कर की जगह नमक डाल दिया।
जब विनय ने राधिका को बताया की उसने खीर में नमक डाल दिया शक्कर की जगह तो राधिका
नाराज हो गई। और अपने कमरे में चली गई।
अगले दिन भी राधिका अनामिका से रूखा सा
व्यवहार कर रही थी। अनामिका समझ नही पा रही थी के आखिर राधिका उससे क्यों नाराज है।
राधिका ने गुस्से में कल से कुछ नही खाया था जिसके
बारे में विनय को तो पता ही नही था। आज रविवार
था तो विनय घर पर ही था। वो अनामिका के साथ
बाहर गार्डन में बैठा था कुछ बात कर रहा था तभी
विजय भी आ जाता है। विनय विजय से मिल खुश हो
जाता है। दोनो कॉलेज की पुरानी बातो को याद करने लगते है।
इधर राधिका भूख से बेहाल हुए जा रही थी उसने सोचा विनय आकर मनाएंगे तभी वह खाना खाएगी।
पर ऐसा ना हो सका। राधिका से अब भूख बर्दाश
ना हो सकी इसीलिए उसने नाश्ता कर लिया।
वैसे भी वह खाने से थोड़ी नाराज थी।
यहाँ विनय राधिका के गुस्से की असल वजह से
अंजान अपने दोस्तो के साथ योजना बना रहा था की शाम को क्या खास करेंगे।
शाम को राधिका को सब व्यस्त नजर आते है सब उसे देखकर मन्द-मन्द मुस्कूराये जा रहे थे। पर राधिका
को कुछ समझ नही आ रहा था। अनामिका से उसे
इतनी चीड़ हो रही थी की उसने विजय से भी अच्छे से
बात नही की। विनय के साथ अनामिका को हँसते हुए
देख तो उसका खून जले जा रहा था। सब बैठक रूम
में थे और राधिका को वही बुला रहे थे। राधिका ने सोच लिया था कि अब वह विनय से सच सुन कर ही
रहेगी। तो बस गुस्से में राधिका विनय के पास जा
पहुँची और चिट्ठी दिखाते हुए पूछती है - ये चिट्ठी
तुम्हे अनामिका ने लिखी थी ना क्या रिश्ता था तुम
दोनो का बताओ सच बोलो। इतना बोल कर राधिका
रोने लगती है। सब हैरान भरी निगाहों से राधिका
को देख रहे होते है। विनय चिट्ठी देखता है और फिर
अनामिका और विजय को  दे देता है कमरे में सन्नाटा
सा छा जाता है। और कुछ ही देर में सब जोर-जोर से
हँसने लगते है राधिका चौक जाती है।और सब की
ओर देखने लगती है विनय हँसते हुए राधिका को गले
लगा लेता है और विजय से कहता है अब तुही सच बता।
विजय राधिका को बताता है की ये जो चिट्ठी है वह
अनामिका ने कॉलेज के दिनों में मुझे लिखी थी
दरसल उसे गलतफहमी हो गई थी की मेरा नाम
विनय है हमने भी अनामिका को कुछ दिनों तक खूब
मूर्ख बनाया और फिर सच बता दिया। पर विनय ने
उन दिनों को याद कर हँसने के लिए ये चिट्ठी अपने
पास ही रखली। बिचारे को पता नही था के ये आपके
हाथ लगेगी तो क्या होगा।
विनय मुस्कुराते हुए कहता है अब सच जान लिया । चलो केक काटो। आज शादी की सालगिरह है हमारी।
वो तो सच पता चल गया नही तो तुम तो तलाक दे
देती मुझे।
राधिका तो भूल ही गई थी क्या करे उसके दिमाग में
इतनी बाते जो चल रही थी। सालगिरह कैसे याद
रहती। खैर राधिका अब तो खुश थी।और उसने
अपने बुरे व्यवहार के लिए सब से माफी भी मांग ली
थी। विनय तो अभी भी चिट्ठी राधिका को दिखा कर
हँसे जा रहा था। और उसे चिढाए जा रहा था
बस इसी तरह हस्ते चिढ़ाते हुए
ये शाम खत्म हो गई। और ये कहानी भी।



निमिशा



ये कहानी मयंक की है मयंक की पत्नी का नाम दिशा हैऔर इन दोनो की एक बेटी भी है जिसका नाम है
निमिशा।
निमिशा नाम से मयंक की कुछ खास यादे जुड़ी है।
ये कहानी यँहा से शुरू हुई थी।
आज की सुबह बड़ी अलग सी लग रही थी धीरे-धीरे
ठंडी-ठंडी हवा मयंक को छूते हुए गुजर रही थी।
सड़क पर सब कुछ एक दम शांत सा नजर आ रहा था
बस पक्षियों की आवाज ही सुनाई दे रही थी जो कि
कानो को मधुर लग रही थी पेड़ो की पत्तिया भी होले-
होले डोल रही थी ऐसा लग रह था जैसे
वे खुशी से मुस्कुरा कर मयंक की ओर ही देख रही हो
ये सारा नजारा मयंक के लिए बडा ही आनन्दित
कर देने वाला था। सूरज की किरणे भी तपिश नही
बल्कि सुकुन दे रही थी वैसे मयंक को लग रहा था कि
सूरज भी शायद आज जल्दी निकला है लगे भी क्यों
न आखिर आज पहली बार वो जल्दी उठा था वो भी
छे बजे। नही तो जनाब रोज दस बजे के बाद ही उठते
है पर क्या करे प्यार की खातिर सब करना पड़ता है।
जल्दी उठना भी पड़ता है।
दरसल दिशा ने मयंक से कहा था की वो सुबह जल्दी
उठकर वॉक पर जाये।ये हेल्थ के लिये अच्छा होता है।
अगर उसने ऐसा नही किया तो वो उससे बात नही
करेगी। मयंक  करता भी क्या दोस्तो को तो नाराज
किया भी जा सकता है पर प्रेमिका को नाराज बिल्कुल
नही किया जा सकता। इसलिए दिशा की बात को
मानते हुए आज मयंक जल्दी उठा भी और वॉक पर गया भी।  वॉक के बाद मयंक एक पार्क मे जा बैठा।
जहा और भी कई लोग थे मयंक की नजर वही
पार्क में टेहल रही एक लड़की पर पड़ी जो एक
आंटी के साथ टेहलते हुए खूब बाते किये जा रही थी
काफी खुश लग रही थी
पता नही पर उस लड़की में कुछ तो ऐसा खास था
जिसकी वजह से मयंक की नजरे उस लड़की की ओर
जा रही थी। दिशा जैसी तो नही दिख रही थी वो और
ना ही जानी पहचानी थी फिर भी उसे देख मयंक को
ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कोई अपना हो।
 कुछ देर बाद वह लड़की मयंक जँहा बैठा था  उसी
जगह आकर बैठ गई। पार्क की जो और सीटे थी वे
खाली नही थी इसीलिए शायद वह यंहा आकर बैठ
गई। वह जिन आंटीजी से बात कर रही थी  वे अपनी
हम उम्र महिलाओं के साथ पार्क से जा रही थी। जाते-
जाते उन्होंने कहा बाय निमिशा
निमिशा।उस लड़की का नाम निमिशा था उसने भी
आंटीजी को मुस्कुराते हुए बाय कहाँ।
निमिशा नाम मयंक ने पहले कभी नही सुना था पर उसे ये नाम अच्छा लगा। निमिशा मयंक के बगल में
चुपचाप बैठी थी पर उसके चेहरे पर जो चमक थी वह
सूर्य की किरणों से भी तेज थी। मयंक निमिशा की ओर
देख रहा था  शायद कुछ पूँछना चाह रहा था पर
फिर  कुछ सोचकर  उसने कुछ नही कँहा और दूसरी ओर देखने लगा।
निमिशा मन की बात जानने में माहिर थी उसने मयंक
की ओर देख लिया था सो खुद ही बोल बैठी। आप
कुछ कहना चाह रहे है।
मयंक ने लड़खड़ाये शब्दो में कहा जजी नही , नही,जी
हाँ,मेरा मतलब है हाँ। वो मैं आपको काफी देर से देख
रहा हूं आप बोहोत खुश नजर आ रही है क्या आप
हर वक्त इतनी खुश रहती है।
निमिशा ने हस्ते हुए कहा- क्यों क्या कोई  हर वक्त
खुश नही रह सकता।
मयंक ने जवाब देते हुए कहा- मेरे ख्याल से नही।
निमिशा ने ज्यादा सवाल -जवाब ना करते हुए सिर्फ
इतना कहा-हो सकता हैं आप सही हो।
निमिशा ने अपनी घड़ी में टाइम देखा और  वह
उठकर जाने लगी।
तभी मयंक ने कहा आप से मिलकर अच्छा लगा
निमिशा जी। निमिशा पलटी और मयंक फिर बोल
पड़ा वो आंटीजी को आपका नाम लेते हुए सुन लिया
था।
वैसे मेरा नाम मयंक है।
निमिशा ने कुछ नही कहा जरासा मुस्कुराई और चली
गई।
अगली सुबह जब निमिशा पार्क में आई तब मयंक
वँहा पहले से ही मौजूद था वो वही बैठा था जँहा कल
बैठा हुआ था। निमिशा भी पार्क में थोडा टेहलने के
बाद मयंक के पास जा बैठी। बैठते ही निमिशा ने पूछा
आज भी आपको कुछ कहना है। मयंक ने कहा नही
वैसे क्या आप यहाँ रोज आती है।
निमिशा ने सर हिलाते हुए हाँ कहा। फिर दोनो के बीच
बाते शुरू हो गई। कभी यहाँ की तो कभी वँहा की। अब दोनो रोज पार्क में मिलने लगे थे। वे इस तरह
घुलमिल गये थे जैसे की सालो से एक दूसरे को जानते हो। मयंक को निमिशा का हमेशा मुस्कुराकर बोलना अच्छा लगता था। निमिशा का सिर्फ चेहरा ही
खूबसूरत नही था उसका मन भी खूबसूरत था। कुछ ही दिनों की मुलाकात में दोनो एक दुसरे के मन की
बातो को समझने लगे थे। अब मयंक निमिशा को
निमिशा जी नही सिर्फ निमिशा कहकर पुकारता था।
निमिशा को शायरी पढ़ने का बडा शौक था वो मयंक को रोज कुछ ना कुछ सुनाती मयंक गंभीर होकर सुनता और फिर दोनो साथ में हँसते।
पर इन सबके बीच क्या मयंक किसी को भूल रहा था।
दिशा। कहीं वो दिशा को भूल तो नही गया था।
निमिशा और मयंक को साथ देख ऐसा ही लगता था
की शायद मयंक दिशा को भूल ही गया है।
मयंक और निमिशा का रिश्ता दोस्ती से कुछ ज्यादा आगे बड़ गया था।
आज भी मयंक रोज की तरह पार्क में बैठ कर निमिशा
का बेसब्री से इंतजार कर रहा था। शायद आज कुछ खास था।
 निमिशा जैसे ही आई मयंक ने तुरन्त उसे
आवाज लगाई। निमिशा ने मयंक की ओर देखा और
प्यार से मुस्कुराते हुए मयंक के पास आई। और पास
आते ही खुशी से गले लग गई। और फिर तीनो साथ
बैठकर बाते करने लगे।
हाँ तीनो निमिशा,मयंक और दिशा। यही तो खास था
आज। निमिशा जिसके गले लगी वह दिशा ही थी निमिशा कब से दिशा से मिलना चाहती थी। और
आज मिल ही ली। मयंक ने दिशा के बारे में निमिशा
को पहले ही बात दिया था। और दिशा भी मयंक और
निमिशा की दोस्ती के बारे में अच्छी तरह जानती थी।
मयंक और निमिशा का रिश्ता दोस्ती से ज्यादा तो था
पर प्यार का नही था मयंक का प्यार तो दिशा ही है।
आज तीनो बोहोत खुश है खासकर निमिशा वो मयंक
और दिशा को साथ में देखना चाहती थी। निमिशा ने
मुस्कुराते हुए मयंक और दिशा से कुछ                               कहा- तुम ऐसे ही हमेशा साथ रहना
                ज़िन्दगी का हर पल खुशी से
                जीना कभी अगर हम मिल न
                पाये तो उदास न होना बस
                मुस्कुराकर एक बार याद कर
                लेना यादो में ही मिल लेना।
             
        ठीक है। इतना कहकर निमिशा हसने लगी।
     मयंक उस समय निमिशा की बातो को समझ नही
पाया था उस दिन वो काफी देर तक पार्क में रुके थे
उस दिन के बाद भी निमिशा और मयंक की कुछ दिनों
तक मुलाकात होती रही। मयंक को तो अब मोर्निंग
वॉक की आदत ही पड़ गई थी। और निमिशा से
मिलने की भी।
लेकिन पता नही क्यों अभी दो दिनों से निमिशा पार्क में
टहलने नही आ रही थी मयंक काफी देर उसका
इंतजार करता और फिर चला जाता। मयंक को फिक्र
भी हो रही थी के निमिशा कही बीमार तो नही हो गई।
मयंक ने उन आंटीजी को देखा जो निमिशा के साथ
टेहला करती थी। उसने उनसे निमिशा के बारे में पता
किया।
उन्होंने जो बताया वह सुन मयंक के दिल को धक्का
सा लग गया। वह कुछ समझ नही पा रहा था के वह
 क्या करे। उसने दिशा को फोन कर बुलाया और वे
दोनो हॉस्पिटल पोहोच गये। दूसरी मंजिल के रूम
नम्बर 11 में जैसे ही वे गये उन्होंने देखा हमेशा
मुस्कुराने वाली निमिशा आज चुपचाप बेड पर लेटी
हुई थी।कुछ भी नही कह रही थी सिर्फ देख रही थी
मयंक की आँखो से आँसू बहे जा रहे थे दिशा मयंक को सम्हाल ने की नाकाम कोशिश कर रही थी।
मयंक ने निमिशा का हाथ थामे हुआ था निमिशा ने
मयंक की ओर देखते हुए मयंक से कहाँ- उदास ना
होना बस मुस्कुराकर एक
बार याद कर लेना। ये निमिशा के आखरी शब्द थे जो
की उसने अभी भी मुस्कुराकर कहे थे।
निमिशा ने कभी भी मयंक को इस बात का पता नही
चलने दिया था की उसे एक गम्भीर बीमारी और उसकी जिंदगी कुछ दिनों की ही है।
निमिशा मयंक के जीवन का एक एहम हीस्सा थी जिसे
मयंक कभी नही भूल सकता।
निमिशा बहुत ही कम समय के लिए मयंक के जीवन
में आई थी। और बस यादो में ही रह गई ।





काला लड़का

हे भगवान अभी तो बैंक से कुछ दूर चली ही थी कि ये
जान लेवा धूप मेरी त्वचा को जला ही देगी। ये
मुसीबतों का अंत भी कभी नही होता। एक तो मैं इस
तपते हुए सूरज जोकि मेरे सिर के ऊपर ही बैठा है
इसकी गर्मी से  पहले ही परेशान हूँ ऊपर से ये
सिग्नल का ट्रेफिक।ट्रेफिक तो ट्रेफिक , ये होर्न बजाने
वालो की भी कमी नही है। कभी-कभी तो मन करता
है कि इन हॉर्न बजाने वालो का कान हॉर्न के पास कर
हॉर्न तेजी से बजाऊ और कहु अब कैसा लगा। तब
इन्हें पता चलेगा की हमे कैसा लगता है।
खैर साहठ सेकेंड होने वाले थे। लेकिन पाँच सेकेंड
पहले ही गाड़ीयां ट्रेफिक से निकलना शुरू हो गई थी
आखिर इस गर्मी में कौन पाँच सेकेंड भी ट्रेफिक में
रुकना चाहता है। ट्रेफिक से निकलते ही थोड़ी राहत की साँस मिली थी कि मेरे मोबाइल की घण्टी बजना
शुरू हो गई। मैने अपनी गाड़ी साइड में रोकी और
बैग में से मोबाइल निकाल कर देखा- प्रीति
अब इस प्रीति को क्या काम है कुछ देर बाद कॉलेज
में मिल ही लेते।
हेलो हाँ प्रीति बोलो
प्रीति- अरे अनिता सुनना मुझे आने में थोड़ा लेट हो
जायेगा। कम से कम आधा घण्टा
आधा घण्टा मैने तेज आवाज में कहते हुए कहा
प्रीति-  हाँ, तु नाराज मत होना मेरा इंतजार करना
प्लीज़, प्लीज,प्लीज
हाँ जल्दी आ ये कहकर मैने फोन काट दिया।
देखलेना भगवान उन दोस्तो का भी अलग से हिसाब
करेंगे जो हमे तो जल्दी बुलाते है पर खुद समय पर
नही आते।
मैने गाड़ी स्टार्ट कि और कॉलेज की ओर निकल पड़ी
इस तप्ति गर्मी में गन्ने का जूस अमृत सा और ठेले
वाले भईया भगवान की तरह लगते है अगर जूस दस
रुपये का हो तो।
खैर कॉलेज से कुछ दूर पहले ही मैं गन्ने की जूस की
दुकान पर रुक गई। वहाँ पहले से ही कुछ लोग बैठे
हुए थे मैं भी वहाँ बैठ कर प्रीति का इंतजार कर रही
थी और मन ही मन उस पर गुस्सा भी कर रही थी।
तभी वहाँ एक छोटी से लड़की आई। यही कोई पाँच
सात साल की होगी। कड़क बिखरे से बाल रूखा सा
चेहरा लाल रंग की मैंली सी फ्रॉक उसके पैरो में
चप्पल भी नही थी। वो एक-एक कर किसी के भी
पास जाती और उनसे जूस मांगती शायद उसे जूस
पीना था पर लड़के-लड़कियाँ उसकी बात को सुन
अनसुना कर देते वो फिर किसी ओर के पास जाती
वे भी उससे मुँह फेर अपनी बातो में लग जाते। ये
सिलसिला दस मिनट तक चलता रहा। मैं लगातार
उसे देखे जा रही थी पर वो मेरे
पास नही आई। दस मिनट बाद एक लड़का साइकिल
से आता है जो दिखने में थोड़ा सावला था या कहु के
थोड़ा ज्यादा ही काला था छोटे बाल बारह से पन्द्रहा
साल का, स्कूल की यूनिफॉर्म में, पतला दुबला सा।
देखने में वह बिल्कुल साधारण लग रहा था। बच्ची
ने उस लड़के की ओर देखा पर वह उसके पास नही
गई। शायद उसे लगा की यह काला सा लड़का
जोकि खुद साइकिल से आया है दिखने में कुछ खास
भी नही लग रहा था वह उसकी क्या सहायता करेगा।
दरसल बच्ची उन लोगों के पास ज्यादा जा रही थी जो
दिखने में थोड़े आकर्षक बडे ही अच्छे तैयार थे
 बच्ची के दिमाग में शायद ये बात
थी के जो सुन्दर दिखते है वे बहुत अच्छे होते है
इसीलिए तो वह उन्ही के पास ज्यादा जा रही थी
लेकिन कुछ देर बाद
वो बच्ची उस सांवले लड़के के पास भी गई। वो लड़का जेब में हाथ
डालकर कुछ ढूंढता है। और फिर हाथ बाहर निकाल
कर अपनी हथेली में देखता है शायद उसने पैसे
निकाले थे नजर नीची कर जिस तरह से वह पैसे
देख रहा था उसके हाव-भाव से लग रहा था कि उसके
पास ज्यादा पैसे नही है। उसने बच्ची से कहाँ चल।
उसने एक ग्लास जूस लिया और बच्ची के हाथ में
ग्लास थमा दिया। जूस वाले भईया को दस का
नोट दिया। अपनी साइकिल उठाई और वो वँहा से
तेजी से चला गया। मैने दूर तक उस लड़के को जाते
हुए देखा। प्रीति पर जो गुस्सा आ रहा था वह।अब यह
सब देख ठंडा हो गया था सच है सच्ची नेकि का कोई
नाम, कोई उम्र, कोई रंग नही होता वह तो केवल एक
सच्ची भावना से जुड़ी होती है।

खामोशी



खामोशी कभी-कभी अच्छी लगती है लेकिन
अगर ये ज्यादा समय तक रहे तो परेशानी की
वजह भी बन सकती है। आज की कहानी कुछ
ऐसी ही है।
ये कहानी आशुतोष और निहारिका की है दोनो
पति-पत्नी है।ये बात उस समय की है जब दोनो की
नयी-नयी शादी हुई थी।
आशुतोष और निहारिका दोनो की शादी परिवार वालो
की मर्जी से हुई थी यानि के अरेंज मैरिज। निहारिका
और आशुतोष को भी इससे कोई एतराज नही था।
दोनो की शादी राजी खुशी हो गई थी ।
आशुतोष बोहोत ही खुशमिजाज तरह का हस्ते
मुस्कुराते रहने वाला लड़का है और बहुत ही बाते
करने वाला चुप रह पाना तो उसके बस की बात ही
नही।
लेकिन निहारिका शांत स्वभाव की लड़की है जल्दी ही
किसी से घुलमिल नही पाती।
कहानी अब शुरू होती है।
 नयी-नयी शादी हुई हो तो
खुशी ही कुछ और होती है ऐसी ही खुशी आशुतोष
को भी हो रही थी। शादी थी तो घर में मेहमान भी थे।
आशुतोष नजाने कब से इस फिराक में थे की
निहारिका से कुछ देर बात करने को मिल जाये।
पर इतने सब लोगों के बीच बात कर पाना आसान
ना था। जैसे-तैसे मौका मिला तो निहारिका ने ये कह
दिया कि उसे ज्यादा बाते करना पसंद नही है। ऐसा
कहकर निहारिका चली गई। और आशुतोष अकेले
बैठे रह गये।
तीन-चार दिन बाद मेहमान भी घर से जा चुके थे। नई
बहु को सब खुब लाड़ लड़ाये जा रहे थे। सब खुश थे
इधर आशुतोष आने बहाने निहारिका से बात करने
की कोशिश करते। पर निहारिका उनकी बातो का
ज्यादा जवाब ना देती। खैर धीरे-धीरे निहारिका सबके
साथ घुलने-मिलने लगी थी।पर आशुतोष के साथ
वह अभी भी सहज नही हो पा रही थी। आशुतोष
समझ नही पा रहे थे कि निहारिका उनसे नाराज क्यों
है। कुछ दिन इसी तरह बीत गये। आज आशुतोष ने
घर पर बताया के उसका ट्रांसफर रायपुर में हो गया।
है। दो दिन बाद ही आशुतोष और निहारिका रायपुर
चले गए। वे रायपुर आ चुके थे नई जगह नये घर में।
निहारिका में यहाँ आकर भी कुछ खास परिवर्तन नही
हुआ था। वह अभी भी खामोश ही रहती थी साथ
होते हुए भी आशुतोष और निहारिका अजनबी की
तरह रहते थे। आशुतोष खुब बोलते बतियाते पर
निहारिका कुछ ना कहती बस चुपचाप सुनती रहती।
आशुतोष निहारिका को खुश करने के लिए कुछ ना
कुछ जतन करते रहते। कभी कोई तोफा लेकर आते
तो कभी फूल लेकर आते निहारिका धीरे से मुस्कुरा
देती पर कुछ ना कहती। बस खामोश रहती। शायद
निहारिका को अपने मन की बात कहना ही नही आता
था। इसीलिए तो वह खामोश ही रहती थी।
खैर आशुतोष ने अभी भी हार नही मानी थी उन्हें
पूरा भरोसा था की जल्द ही निहारिका अपनी खामोशी
तोड़ेगी और अपनी मन की बातो को आशुतोष से
साझा करेगी।
एक दिन मौसम खराब था शायद बारिश होने वाली
थी। आशुतोष जल्दी घर आ गये थे। आशुतोष के मन
में ये ख्याल आया की लड़कियों को बारिश अच्छी
लगती है।
हो ना हो निहारिका को भी बारिश पसंद होगी।
बस आशुतोष बारिश होने का इंतजार करने लगे।
और मन ही मन खुश भी हुए जा रहे थे दरसल बारिश
आशुतोष के मन को गुदगुदाने लगी थी उन्हें उम्मीद
थी कि बारिश की बूंदे निहारिका के मन को जरूर
छु जाएंगी। जो आशुतोष ना कर पाये वह ये बूंदे कर
जायेंगी। निहारिका के मन में प्यार भर  जाएंगी।
उसकी खामोशी को खिलखिलाती हँसी में बदल
जाएंगी।हम दोनो मौसम की इस पहली बारिश में
साथ में जरूर भीगेंगे। कुछ इस तरह के ख्यालो में
आशुतोष गुम हुए जा रहे थे कि तभी बिजली कड़कती
है और बारिश होने लगती है। आशुतोष जैसे-तैसे
करके निहारिका को घर से बाहर ले आते है और वे बारिश में भीगने लगते है निहारिका कहती है के उसे
बारिश में भीगना पसन्द नही है ऐसा कह वह घर में
चली जाती है आशुतोष की सारी खुशी बारिश के पानी
के साथ बह जाती है बिचारे आशुतोष अकेले ही
भीगते रह जाते है।
आशुतोष को हर उम्मीद टूटती नजर आने लगती है।
अगले ही दिन आशुतोष निहारिका को बताते है की
उन्हें ऑफिस के काम से चार दिन के लिए शहर से
बाहर जाना है। वो निहारिका को मायके छोड़ आएंगे।
उसे भी सबसे मिल कर अच्छा लगेगा और फिर वह
अपना काम खत्म कर उसे लेने आ जायेंगे।
आशुतोष निहारिका को मायके छोड़।चले जाते है।
निहारिका को अपने परिवार से मिलकर अच्छा तो
लगता है,
पर वह खुश नजर नही आ रही थी।चार दिन बीत चुके
होते है पर आशुतोष नही आते। निहारिका को भी
कही ना कही लग रहा था के शायद आशुतोष नही
आएंगे। क्योंकि जब आशुतोष निहारिका को छोड़ कर
जा रहे थे तब उनकी आँखो में खामोशी सी नजर आ
रही थी जैसे की फिर मिल पाना मुश्किल हो बस
निहारिका को एक सार देखे जा रहे थे।
निहारिका को आज अपना ही घर पराया सा लग रहा
था उसे बार-बार बस आशुतोष की बाते याद आ रही
थी। जो एहसास आज तक निहारिका को नही हुआ
शायद वो आज हो रहा था। उसे आशुतोष की कमी
खल रही थी कुछ दिनों की दूरी ने निहारिका को बहुत
सी बातो का एहसास दिला दिया था। चार से आठ
दिन हो गये थे पर आशुतोष  उसे लेने नही आये।
निहारिका मन ही मन खुद से सवाल किये जा रही थी
क्या आशुतोष उसे लेने आएंगे। या फिर नही आएंगे।
यह सब सोच निहारिका उदास सी हो जाती है।
तभी निहारिका की छोटी बहन की आवाज आती है।
वह निहारिका को पुकारते हुए कहती है-
दीदी जल्दी नीचे आओ जीजाजी आये है निहारिका
उस वक्त ऊपर वाले कमरे में थी सुनते ही निहारिका
दौड़ते हुए जल्दी से नीचे आ जाती है।और सीढ़ियों
के पास खड़ी हो जाती है। आशुतोष निहारिका के
पिताजी के पास बैठे हुए थे निहारिका की माँ
निहारिका को कहती है की जल्दी अपना समान
रखलो कुछ ही देर में तुम्हे और दामाद जी को
निकलना है।
निहारिका और आशुतोष रायपुर के लिए निकल जाते
है पूरे सफर के दौरान आशुतोष ने निहारिका से
कोई बात नही की वह बिल्कुल खामोश थे। अब
वे घर पहुँच चुके थे। आशुतोष काफी थक गये थे
इसलिए  चुपचाप कमरे में जाकर सो गये। निहारिका
आशुतोष से कुछ कहना चाह रही थी पर कह ना
सकी।
सुबह हो गई थी आशुतोष ऑफिस के लिए तैयार हो
गये थे। लेकिन वह अभी भी कुछ चुप से थे।
निहारिका पूछना चाह रही थी पर उन्होंने कुछ ना कहा
और वह चले गये।
निहारिका को आशुतोष की खामोशी परेशान किये जा
रही थी हमेशा मुस्कुराते रहने वाले आशुतोष को
इस तरह खामोश देख पाना  निहारिका के लिए
बड़ा मुश्किल सा हुए जा रहा था।
निहारिका इस बात को अच्छी तरह जानती थी कि
कही ना कही इस खामोशी की वजह वही है।
शाम हो चुकी थी आशुतोष के आने का समय हो गया
था दरवाजे की खट खट आवाज होती है निहारिका
दरवाजा खोलती है तो देखती है के आशुतोष पूरी
तरह भीगे हुए थे
अचानक मौसम खराब हो जाने के कारण बारिश हुई
थी जिसकी वजह से आशुतोष भीग जाते है।
आशुतोष कपड़े बदल हॉल में आकर बैठ जाते है।
निहारिका चाय  टेबल पर रख देती है और वही पास
में खड़ी हो जाती है आशुतोष चाय पीते है।
निहारिका इंतजार कर रही होती है के आशुतोष कुछ
तो बोलेंगे। लेकिन वह कुछ नही कहते।चाय खत्म
करने के बाद आशुतोष कमरे की ओर जाने लगते है
निहारिका समझ नही पाती है कि वह क्या करे
बस वह झटसे आशुतोष का हाथ पकड़ कर उन्हें रोक
लेती है आशुतोष निहारिका की ओर देखते है।
और उन्हें नजर आता है के जिस बारिश में वह भीग के
आये है वैसी ही बारिश निहारिका की आँखो से हो रही
थी। जिससे उनका हाथ भीगे जा रहा था। इससे पहले
कि आशुतोष कुछ कह पाते। निहारिका खुद ही बोल
पड़ी। निहारिका ने कहा-
खामोशी सब पर अच्छी नही लगती और आप पर तो
बिल्कुल अच्छी नही लगती। आशुतोष।
आशुतोष ने बड़े ही प्यार से निहारिका की ओर देखते
हुए कहा- खामोशी किसी पर भी अच्छी नही लगती
कभी-कभी ये रिश्तो में दूरियों की वजह भी बन जाती
है। खामोश रहना फिर भी आसान है पर किसी अपने
की खामोशी सहना बोहोत मुश्किल है निहारिका
खामोश मत रहा करो।
   खामोशी तुम पर भी अच्छी नही लगती।
उस दिन के बाद निहारिका और आशुतोष के बीच
कभी खामोशी नही रही।
आशुतोष को उनकी निहारिका मिल गई थी
वो निहारिका जो मन की बाते करना जानती है जो
मुस्कुराना
जानती है।जिसे बारिश में भीगना पसन्द है। और
   ये कहानी बस यही खत्म हो जाती है।

स्टील का डब्बा




गाड़ी स्टेशन पर आ चुकी थी मैं जल्दी-जल्दी चलकर
गाड़ी की ओर जा रहा था। तभी पीछे से मेरे दोस्त
अजय ने आवाज लगाई। नीरव रुकना मुझे छोड़कर
जाने वाला है क्या।
मैने पीछे पलट कर कहा जल्दी आना धीरे-धीरे
चलकर क्यों आ रहा है। यही रहने का इरादा है क्या।
इस तरह जैसे-तैसे मैं और अजय दोनो ट्रेन में बैठ
गये। शुक्र है के सीट मिल गई थी। जनरल डिब्बे में
सीट मिलना आसान नही होता है।
मैं खिड़की के पास वाली सीट पर बैठ गया था। और
अजय मेरे बगल में बैठ गया था। हम दोनो काफी
थके हुए थे। इसलिए बिना बाते किये चुपचाप बैठ
गये। अजय का तो पता नही पर हाँ मुझे मन ही मन
चिंता सी हो रही थी। सरकारी नौकरी के लिए परीक्षा
देकर आ रहे है। पिछले बार भी परीक्षा दी थी। उसमे
तो कुछ भी ना हो सका। इस बार प्रभु पास करा ही
देना। वरना बाऊजी इतना सुनाएंगे । इतना सुनाएंगे।
कि पड़ोसियों के कान के पर्दे भी हिल जाएंगे।
बाऊजी के लिए सरकारी नौकरी का मिल जाना ऐसा
है जैसे भगवान का मिल जाना। रोज पूजा कर
भगवान से यही तो मांगते है कि मेरी सरकारी नौकरी
लग जाये। हे भगवान मेरे बाऊजी की प्रार्थना जरूर
सुन लेना।
मन ही मन भगवान से ये विनती कर मैं पीछे सर
टिकाकर बैठ गया। सामने वाली सीट खाली थी।
जहाँ अभी-अभी एक अंकल व आंटी और उनके साथ
एक छोटा सा बच्चा आकर बैठ गये थे। ये बच्चा देखने
में उनका पोता लग रहा था। और वे उसे कान्हा-कान्हा
कहकर पुकार रहे थे। वह मेरे बिल्कुल सामने बैठा था
उसके हाथ मे एक स्टील का डब्बा था।
ट्रेन स्टेशन से चल चुकी थी। सब अपनी-अपनी सीट
पर आराम से बैठे हुए थे। बस अजय और मेरी ही
हालत थोडी खराब थी। दो दिन से मैं और अजय यहाँ
वहाँ दौड़े जा रहे थे। परीक्षा का सेंटर इंदौर मिला था।
इसलिए यहाँ आना पड़ा। परीक्षा तो हो गई है और
अब वापस घर भी जा रहे है। लेकिन इस दौड़ -भाग में
थोड़ी थकान सी हो गई है। अजय तो आँख बंदकर
टिक्कर आराम से बैठ गया। मेरा भी सिर थोड़ा भारी
सा हो रहा था। सोचा मैं भी थोड़ी देर आँख बंदकर
बैठ जाता हूँ। सो बैठ गया । कुछ ही देर हुई होगी।
आराम से बैठे हुए। कि आवाज सी आने लगी। जैसे
की कुछ बज रहा हो। आँख खोलकर देखा तो सामने
बैठा बच्चा अपनी गोद में रखे स्टील के डब्बे को हाथो
से बजाये जा रहा था। मेरे मना करने पर वह उसे और
जोर से बजाने लगा। कुछ देर तो मैने सहन किया। पर
फिर मैने आंटीजी से केही दिया-
'आंटीजी बच्चे से कहिये की वह इस तरह डब्बा ना
बजाये मुझे इस शोर से दिक्कत हो रही है' आंटीजी
के समझाने पर वह शांत बैठ गया। मैं भी उससे ध्यान
हटा खिड़की से बाहर की ओर देखने लगा।
अगला स्टेशन आ चुका था जहाँ गाड़ी कुछ वक्त के
लिए रुकी थी। हम जिस ओर बैठें थे वहाँ खिड़की से
थोड़ी-थोड़ी सूरज की रोशनी स्टील के डब्बे पर पड़
रही थी जिसकी चमक मेरे आँखो पर लग रही थी।
पर गाड़ी के आगे बढ़ते ही ये समस्या हल हो गई थी।
लेकिन अचानक आंटीजी ने उठकर डब्बा मेरे हाथो
में थमाते हुए कहा की- बेटा कुछ देर इसे रख लो।
कान्हा को नींद आ रही है। मैं उसे सुलादूँ  फिर डब्बा
लेलूंगी। "ये लो जिस डब्बे पर चीड़ आ रही थी अब
मैं खुद उसे लेकर बैठा था" थोड़ी देर तो में उसे लेकर
बैठा रहा।लेकिन थकान की वजह से नींद आ रही थी
इसलिए मैं आंटीजी को डब्बा लेने के लिए कहने वाला था
कि उन्होंने खुद वह मेरे हाथो से ले लिया।अब में
सुकुन महसूस कर रहा था। लेकिन सुकुन कहा
मिलना था। आँख बंद कर बैठा ही था कि ना जाने
कहा से बड़ी अच्छी खुशबू  सी आने लगी। मेरा मन
यह जानने के लिए आतुर होए जा रहा था की यह
खुशबू किस चीज की है और कहा से आ रही है।
जब मैने सामने बैठे अंकल आंटीजी की तरफ देखा।
तो पता चला के यह खुशबू उसी स्टील के डब्बे से आ
रही थी। दरसल आंटीजी डब्बे का ढक्कन खोल कर
उसमे से कुछ निकाल कर अंकल जी को दे रही थी।
जिसकी खुशबू बड़े जोर से आ रही थी। उसी बीच
आंटीजी ने हमारे ओर भी देखा और उन्होंने हमसे
पूछा- बेटा मूंगदाल का हलवा खाआगे।
"मूंगदाल का हलवा" वाह सुनते ही मुझे तो भूख ही
लगने लगी थी। पर में कुछ बोल पता उसके पहले
अजय ही बोल पड़ा "नही-नही " आंटीजी आप ही
लीजिये। अजय के पहले ही मना कर देने पर मैं कुछ
ना कह सका।और चुपचाप बैठा रहा। पर मेरा मन तो
बार -बार उस स्टील के डब्बे की ओर ही जा रहा था।
उससे हलवे की इतनी अच्छी खुशबू जो आ रही थी।
इस वक्त तो मुझे वह डब्बा भी बड़ा खूबसूरत नजर
आ रहा था। कितना अच्छा डब्बा है कितने काम आता
है। हलवे के साथ तो बडा ही अच्छा दिख रहा है।
ऐसे सब विचार मेरे मन में आ रहे थे। और साथ ही
अजय पर गुस्सा आ रहा था आखिर उसने क्यों मना
कर दिया उसका मन नही था पर मेरा
मन तो था हलवा खाने का।
इधर आंटी व अंकल जी को हलवा खाते देख मेरी लालसा
और बढ़ी जा रही थी पर क्या करता। इसलिए मन को
मनाये में खिड़की से बाहर की ओर देखने लगा। हलवे
की खुशबू अभी भी आ रही थी। पर में लगातार बाहर
की ओर देखे जा रहा था तभी एक स्पर्श सा महसूस
हुआ।मैंने देखा तो आंटीजी थी। आंटीजी को शायद मेरे
मन की स्थिति का आभास हो गया था।इसीलिए तो
उन्होंने बिना कुछ कहे हलवे का डब्बा मेरी ओर बढ़ा
दिया था।पहले तो मैने आंटीजी की तरफ देखा और
फिर चेहरे पर गंभीर से भाव बना मैंने चुपचाप हलवा
ले लिया। पर मन में तो बड़ी खुशी हो रही थी ठीक
वैसी ही जैसी बचपन में कोई चीज बोहोत मांगने पर
आखिर में बाऊजी दिलाही देते थे सच में आज वैसा ही
महसूस हो रहा था।
 






नन्ही अभिलाषा



ये कहानी एक छोटी सी बच्ची अभिलाषा की है जोकि
अपनी दादी और माँ के साथ रहती है। दिन का समय था अभिलाषा की माँ अंजलि घर के कामो में लगी थी और अभिलाषा की दादी आँगन में पापड़ सुखा रही थी। छोटी बच्ची अभिलाषा पड़ोस की बच्ची रानु के साथ वही पास में खेल रही थी
जाने क्या हुआ। रानु बीच खेल में घर चली गई और
अभिलाषा भी उदास सी दादी के पास आकर बैठ गई।
दादी के पूछने पर उसने कुछ ना कहा। कुछ देर में
अंजलि भी बाहर आ गई।अभिलाषा को उदास देख
अंजलि ने भी उससे उदासी की वजह जानने की
कोशिश की। बोहोत पूछने पर अभिलाषा ने अपनी चुप्पी तोड़ी। अभिलाषा ने बताया की रानु आज  अपने पिता के साथ कही घूमने जाने वाली है। इसलिए वह अपने घर चली गई। अभिलाषा की बात सुन अंजलि ने कहा  बस इतनी सी बात के लिए मेरी बेटी उदास है कोई बात नही रानु के साथ कल खेल लेना आज दादी और माँ के साथ खेल लो। अभिलाषा ने माँ की बात का कोई जवाब नही दिया। उसका गुमसुम चेहरा देख माँ और दादी दोनो ही उसे अपने-अपने तरीके से खुश करने में लग गये। वे दोनो ही अभिलाषा की उदासी की असली वजह से अंजान थी। जब अभिलाषा किसी भी बात से खुश होती नही दिखी। तब अभिलाषा की माँ
अंजलि ने खुद अभिलाषा से पूछा की वह क्या चाहती है। तब अभिलाषा ने अपनी मासुमियत भरी निगाहों से माँ और दादी की ओर देखते हुए कहा- पापा। मुझे मेरे पापा चाहिए। माँ मुझे पापा से मिलना है। उनके साथ घूमने जाना है। जैसे रानु जाती है अपने पापा के साथ। बस इतना केह अभिलाषा रोने लगी। शायद आज अभिलाषा को अपने पिता की कमी खल रही थी अभिलाषा की माँ व दादी दोनो अभिलाषा की बात सुन थमी सी रह गई। दोनो की आँखो में आंसू भर आये। अभिलाषा की माँ ने उसे जोर से गले लगा लिया। और उसे चुप करने लगी। अभिलाषा की माँ अंजलि ने अभिलाषा को यह भरोसा दिलाया के उसके पापा इस दिवाली उससे मिलने जरूर आएंगे। अभिलाषा के पिता दूसरे शहर में रहकर नोकरी करते है। वे वही से घर खर्च के लिए पैसे भेज देते है।दो साल से तो वे एक बार भी घर नही आये थे। लेकिन शायद वह इस दिवाली घर जरूर आएंगे। क्योंकि अंजलि ने अपने पति यानी अभिलाषा के पिता को चिट्ठी के माध्यम से अभिलाषा की इक्छा के बारे में बता दिया था। इधर अभिलाषा दिवाली आने का इंतजार कर रही थी और दिवाली आने पर अभिलाषा दिवाली वाले दिन घर के दरवाजे पर नजर गढ़ाए अपने पिता का इंतजार कर रही थी।सुबह से शाम हो चुकी थी। लेकिन अभिलाषा के पिता घर नही आये थे।अभिलाषा का मन इस बात से दुखी हो जाता है। अभिलाषा की माँ और दादी अभिलाषा का मन बहलाने की कोशिश करते है पर अभिलाषा पर उनकी कोशिश का कोई असर नही होता है।अंजलि यह सोचने में लगी रहती है कि कैसे अभिलाषा को खुश किया जाये। और उसे इसका उपाय मिल जाता है। कुछ दिनों बाद ही  अभिलाषा का जन्मदिन आने वाला होता है। बच्चे अपने जन्मदिन को लेकर उत्साहित होते है अभिलाषा भी जरूर उत्साहित होगी। यह सोच अंजलि अभिलाषा के जन्मदिन की बात उसके दोस्तो को बताती है और अभिलाषा के जन्मदिन वाले दिन सबको घर बुलाती है। अभिलाषा सबको देख खुश तो होती है पर ज्यादा नही। लेकिन थोड़ी देर बाद वह सबके साथ खेलने लगती है और धीरे-धीरे उसका मन बेहलने लगता है। कुछ देर में ही वह सब बच्चो के साथ हँसने खिलखिलाने लगती है। आखिर अभिलाषा है तो एक बच्ची। अब वह अपने दोस्ते के साथ जन्मदिन की खुशी मना रही थी। माँ और दादी अभिलाषा को खुश देख प्यार से निहार रही थी। इस सब के बीच दरवाजे पर किसी के होने की आहट होती है सब दरवाजे की ओर देखते है। दरवाजे पर कोई ओर नही अभिलाषा के पिता होते है जिन्हें देख अभिलाषा खुशी से दौड़कर उनके गले जा लगती है अभिलाषा के पिता की आँखे भी नम हो जाती है पिता पुत्री के इस मिलन को देख कर अभिलाषा की माँ और दादी की आँखो से आँसू झलक आते है। ये पल उन सब के लिए बहुत ही भावुक पल था।

एक चुटकी प्रेम

मार्च बित गया था ठंड के नख़रे अब कम हो गए थे कम क्या यूँ कहें कि अब खत्म ही हो गये थे सूरज के तीखे तेवर जो शुरू हो गये थे। अब गर्मागर्म पकोड़े...

Sonal bhatt MULAKAT-KAHANIYO-SE STORY OF OUR LIFE