खूबसूरत आँखे



धीरे-धीरे हिल-डुल कर चल रही बस मे सफर करना
महेश बाबू के लिए आसान नही लग रहा था।
बस जिस तरह से हिल-हिल कर चल रही थी ऐसा लग रहा था मानो जैसे अभी ही बस के सारे पुर्जे खुलकर बिखर जायेंगे और बस धराशाई हो जायेगी
बस की खड़खड़ आवाज महेश बाबू की चिंता और
बढा रही थी। खिड़की से बाहर देखते हुए महेश बाबू
सोचे जा रहे थे कि सफर कैसे पूरा होगा। आधे घन्टे में
ही कमर अकड़ सी गई है अभी डेढ़ घन्टे का सफर
बाकी है। मंजिल तक पहुँचते जाने कैसी हालात हो
जायेगी। महेश बाबू बैंक में काम करते है वे बैंक से
जुड़े किसी काम के सिलसिले में शहर के पास स्थित
शोमपुर गाँव जा रहे है। हिलती डुलती चल रही बस कुछ दूर आगे जाकर रुकती है कुछ यात्री बस से उतरते है तो कुछ यात्री बस में चढ़ते है।बस में चढ़े यात्रियों में दो महिला यात्री भी होती है। जोकि महेश बाबू की सीट के बगल वाली सीट पर आकर बैठ जाती है। वे दोनो अपनी ही बातो में व्यस्त होती है।
इधर महेश बाबू  सफर को लेकर अभी भी परेशान थे
चेहरे पर परेशानी का भाव लिये वे कभी खिड़की से
बाहर देखते तो कभी बस में बैठे अन्य यात्रियों को
देखते। इन सबके बीच उनकी नजर बगल वाली सीट
पर बैठी उन दोनो महिलाओं पर भी पड़ी। आश्चर्य की बात यह थी कि उस वक्त उनमे से एक महिला महेश बाबू की ओर ही देख रही थी। ज्योही महेश बाबू की नजर उस महिला की नजर से मिली महेश बाबू की नजर थमी सी रह गई।कुछ देर तोउनकी पलके भी ना झपकी। महिला की आँखे बेहद खूबसूरत थी झील सी गहरी घनी पलको वाली आँखे।इतनी खुबसूरत की नजरआँखों पर ही ठहर कर रह जाए। महेश बाबू महिलाकी आँखों से आकर्षित हो गये थे वे बार बार उसकी आँखों को देखे जा रहे थे। हाव-भाव से ऐसा ही प्रतीत हो रहा था। पर शायद ऐसा नही था इन आँखों को देख उन्हें तो किसी और की आँखें याद आ गई थी या कहे की कोई ऐसा याद आ गया था जिसकी आँखो की खुबसुरती उनके मन में आज भी बसी हुई है। जिन यादो को मन के कोने में छिपा रखा है वे  आज उमड़-उमड़ कर बाहर आ रही थी।ये यादे अनुषा की थी जिनकी आँखो के महेश बाबू दीवाने ने थे। बात पाँच साल पहले की है जब महेश बाबू कॉलेज में थे।अनुषा और उनकी मुलाकात कॉलेज में ही हुई थी। जब वे
पहली बार अनुषा से मिले बिना कुछ कहे उसकी
आँखो में देखते ही रह गये।बस यही से इनके रिश्ते
की शुरुआत हुई थी।आने बहाने रोज मिलते रहने का
दौर शुरू हो गया।और एक दिन महेश बाबू ने दिल की
बात कह ही दी।उस दिन अनुषा बहुत खुश थी दोनो
ने सारा दिन साथ बिताया था।महेश बाबू पूरा दिन
अनुषा की आँखो की तारीफ करते रहे। वो दिन उनकी
मुलाकात का आखरी दिन था उसके बाद अनुषा कभी
मिलने नही आई। महेश बाबू ने कई दिनों तक इंतजार
किया। पर वह नही आई।वह क्यों नही आई यह
सवाल आज भी महेश बाबू के मन में है।उसकी यादो
को महेश बाबू ने दिल में संजोकर रखा हुआ है।उन्हें
उम्मीद है की एक दिन अनुषा जरूर वापस आयेगी।
बस शोमपुर पहुँच चुकी थी अब महेश बाबू यादो से
बाहर आ चुके थे बस से उतर अनुषा को याद किये
मन ही मन उसकी आँखो की तारीफ किये। वे अपनी
राह चले गये।खूबसूरत आँखो वाली लड़की अनुषा
और महेश बाबू की कहानी अधूरी रह गई।

तेरी आँखे बहुत खूबसूरत है
इनमे डूब जाने को जी करता है
इनमे खो जाने को मन मेरा करता है
नही पता इनमे बसी
किसकी सूरत है
है बस इतना पता
तेरी आँखे बहुत खूबसूरत है
तेरी आँखे बहुत खूबसूरत है।

वो एक दिन




दोस्तो हमारे साथ कभी-कभी कुछ ऐसा हो जाता है जो हमे बहुत कुछ सीखा देता है।और साथ ही हमारी सोच में बदलाव ला देता है।आज की कहानी ऐसी ही है। ये कहानी है अनुज की। माँ का दुलारा दोस्तो का प्यारा,मन का सच्चा,जिम्मेदारियो में कच्चा।दोस्तो के साथ मौज करने वाला अपने में ही मस्त रहने वाला।ऐसा है अनुज। जोर-जोर से मंत्रो के जाप के साथ घंटी की आवाज सुन बार-बार करवट बदलने के बाद आखिर अनुज नीद से जाग जाता है।माँ के जगाने पर अनुज कभी भी आसानी से नही उठता है पर क्या करे दादी के मंत्रो की शक्ति के आगे अनुज की नींद भक्ति कहा टिकने वाली थी। जागना ही पड़ेगा। दादी पुजा खत्म कर आँगन में आकार बैठ चुकी थी।अनुज के पिताजी भी दुकान पर जाने के लिये तैयार हो गये उनकी कपड़ो की दुकान है। जाने से पहले वे कुछ देर दादी के पास जरूर बैठते है। और कुछ देर  बात करते है। माँ नाश्ता बनाकर बाहर ही ले आती है तभी अनुज हँसते हुए अपनी दादी के पास आकर बैठ जाता है और दादी के साथ हँसी मजाक करने लगता है दादी पोते के बीच हँसी मजाक रोज की बात है। पिताजी अनुज की तरफ देखते हुए बड़े ही शांत स्वर से कहते है बेटा पढ़ाई पर ध्यान दे रहे हो या सिर्फ दोस्तो के साथ मौज कर रहे हो। बड़े हो चुके हो जिम्मेदारियां समझो हँसी मजाक में समय बर्बाद ना करो। तुम्हे  बहुत कुछ करना है जीवन में। अनुज चुपचाप सारी बात ऐसे सुन राहा था जैसे वह किसी नेता का भाषण सुन रहा हो। जिसे सिर्फ सुनना होता है समझना नही होता।जब कोई नेता हाथ हिला हिलाकर चेहरे के भाव बदलकर बोल रहा होता है वह सब देखकर बच्चो को जो अनुभूति होती है वैसी ही अनुभूति अनुज को भी हो रही थी।मानो के कोई फर्क ही नही पड़ रहा हो।पिताजी को अनुज पर अपनी बात का कोई असर ना होते हुए अलग ही दिख रहा था।वे नीराशा का भाव लिये दुकान चले जाते है।उन्हें अनुज के दोस्तो के साथ घूमने फिरने से कोई दिक्कत नही है वे जानते है कि इस उम्र में बच्चे थोडा मौज मस्ती करते ही है।लेकिन उन्हें जिम्मेदारी और कर्तव्य का भान होना चाहिये।सही गलत की पहचान भी होनी चाहिये। अनुज के पिताजी चाहते है की अनुज कभी दुकान पर आये वहाँ के काम को देखे समझे ताकि जरूरत पड़ने पर सहायता कर सके। काम को सम्हाल सके।लेकिन अनुज को दुकान पर जाना बिल्कुल पसंद नही है।उसे वह बोझ सा लगता है। हर रोज की तरह आज भी अनुज  कॉलेज से निकलने के बाद दोस्तो के साथ पास स्थित चाय की होटल पर जाता है चाये समोसे ऑडर कर सभी बातो में लग जाते है।बातो के बीच चाय की चुस्कियां लेते हुए अनुज की नजर एक शक्स पर पड़ती है। जो दिखने में किसी दफ्तर के बाबू लग रहे होते है। वह होटल के मालिक चाचाजी से कुछ देर बात कर  हिसाब वाला रजिस्टर देखते है फिर वह काम कर रहे लड़को से कुछ बोलते नजर आते है तो कभी चाये पीने आये ग्राहको से कुछ पुंछते नजर आ रहे थे।अनुज का पूरा ध्यान उस शक्स पे इस तरह था कि उसने अभी तक अपनी चाय भी खत्म नही की थी उसके मन में कई तरह के सवाल आ रहे थे जिन्हें वह उस शक्स से पूछना चाह रहा था।।जब अनुज उस शक्स को बाहर की ओर जाते देखता है तब वह उन्हें सर रुकिए कहकर रोक लेता है वह कहता है सर में आपको काफी देर से देख रहा हु आप दिखने में तो किसी दफ्तर के बाबू नजर आ रहे है। फिर आप चाचाजी की होटल  में आकार काम क्यों कर रहे थे।  उस शक्स ने उत्तर देते हुए कहा में एक सरकारी दफ्तर में अच्छी पोस्ट पर कार्यरत हूं। ये होटल मेरे पिताजी की है जिन्हें सब चाचाजी कहते है वह मेरे पिताजी है। उन्होंने यहां दिन रात मेहनत कर अपने परिवार की देखरेख की है और मुझे एक काबिल इंसान बनाया है।आज यहां उनकी सहायता के लिए कुछ काम करने वाले लडके भी है जो सारा काम सम्हालते है जिसका उन्हें वेतन मिलता है।लेकिन मेरे यहां आने से पिताजी के चेहरे पर एक अलग सा  संतोष दिखाई देता है चाहे में कुछ ही देर यहां रुकु उतने समय के लिए वह निश्चिंत महसूस करते है।हर पिता की  ख्वाइश होती है के उसका बेटा बडा होकर उसका सहारा बन साथ खड़ा रहे।मै वही कर रहा हूं।यह सिर्फ एक होटल नही है यह मेरे पिताजी की मेहनत की पूंजी है जिसे सहज कर रखना मेरी जिम्मेदारी है। उस शक्स की इतनी गंभीर बातो को सुन अनुज चुपचाप दोस्तो के पास जा बैठता है।और उनकी किसी भी बात पर कोई प्रतिक्रिया नही देता।रातभर भी अनुज को उस शक्स की बाते याद आती रही।
सवेरा हो चुका था आज अनुज किसी के जगाने के पहले ही उठ गया था दादी के पैर छुकर आशीर्वाद ले ।दादी से थोड़ी हँसी ठिठोलि कर अनुज पिताजी के पास जाता है ओर कहता है मेरी परीक्षा समाप्त हो गई है क्या खाली समय में मै आपके साथ दुकान पर आ सकता हूं मुझे भी तो थोड़ा पता होना चाहिए कि वहां काम कैसे सम्हाला जाता है और इस बहाने में आपकी कुछ सहायता भी कर पाऊंगा।आखिर मेरी भी कुछ जिम्मेदारियां है यह सुन सब आश्चर्य से अनुज की ओर देखते है अनुज पिता का हाथ थाम मुस्कुराते हुये कहता है चलें। अनुज  कुछ ही दिनों में बहुत कुछ सिख जाता है और काफी जिम्मेदार भी हो जाता है। अब वह अक्सर दुकान पर आता जाता रहता है।दोस्तो के साथ मौज-मस्ती आज भी जारी थी।फर्क इतना है कि अब वह हर काम समय के अनुसार किया करता था।और आज अनुज वो एक दिन याद कर रहा था जिस दिन अनुज की मुलाकात उस शक्स से हुई थी जिसका काफी गहरा प्रभाव अनुज पर हुआ था।और अनुज की जिंदगी बहुत बदल गई थी।अनुज के लिए वो एक दिन हमेशा के लिए यादगार रहेगा।

अंजाना रास्ता



दोस्तो हम सभी कभी ना कभी ऐसे अंजाने रास्ते से गुजरते है जिससे हम बिल्कुल  भी परिचित नही होते है। वह हमारे लिए पूरी तरह अंजाना होता है।आज कि कहानी ऐसे ही रास्ते से जुड़ी हुई है। ये कहानी सोनिका की है। सोनिका बी.ए. की छात्रा है। सोनिका बिल्कुल वैसी है जैसी उन्नीस से बीस वर्ष की छात्राए होती है। कभी बिल्कुल निडर ,तो कभी थोड़ा डर, कभी बड़ बोली, तो कभी शांत सहज गंभीर। ये तो सोनिका का परिचय था।हाँ तो अब कहानी पर आते है।ये उस दिन की बात है जब सोनिका कॉलेज जाने के लिए तैयार हो रही थी सोनिका की माँ अपने कार्य में व्यस्त थी घड़ी में साढ़े दस बज रहे थे। तभी टेलिफोन की घण्टी बजती है।माँ आकार फोन उठाती है। फोन सोनिका की सहेली रुचि का था। माँ ने सोनिका को बुलाया और फोन सोनिका के हाथ में दे दिया। सोनिका ने रुचि से बात की। रुचि ने बताया की वो आज कॉलेज नही आ पायेगी ।उसकी दादी की तबियत खराब है।रुचि कहती है की मैडम ने जो लेखन कार्य मुझे दिया था वह पूरा हो गया है आज ही उसे मैडम के पास जाकर देना है क्या? तुम ये काम कर दोगी । सोनिका ना नही कह सकी। रुचि का घर का पता ले माँ को सारी बात  बता कर सोनिका रुचि के घर के लिए अपनी स्कूटी लिये निकल गई जो की आदेश नगर में था। सोनिका  ने आदेश नगर कभी नही देखा था उस रास्ते वह कभी नही गई थी। उसके लिए वह अंजाना रास्ता था ।रुचि के बताये पते के अनुसार सोनिका जैसे ही आदेश नगर के रास्ते पर बढ़ी शुरुआती रास्ता काफी सुनसान था।सड़क के दोनो ओर घने पैड़ ही पैड़ सड़क पर सोनिका के अलावा कोई ओर नजर ही नही आ रहा था।सड़क भी कच्ची थी सोनिका को तो ऐसा लगा जैसे की वो जंगल में आ गई हो।कुछ दूर पहुचने पर सोनिका को एक व्यक्ति आते दिखाई देता है जो देखने में थोड़ा डरावना सा लग रहा होता है।अपनी लाल बड़ी-बड़ी आँखो से घूरते हुए।वह चलकर सोनिका के नजदीक आता है सोनिका थोड़ा सेहम जाती है वह सोनिका से पूछता है मैडम क्या आप इस रास्ते पर जा रही है ? सोनिका सिर्फ अपना सर हिलाकर हाँ का इशारा करती है। यह रास्ता थोड़ा कठिन है सम्हल कर जाना।लोग जाते तो दिखते है पर आते नही दिखते। ऐसा कहकर वह व्यक्ति चला जाता है। यह सुन सोनिका कुछ पल थम सी जाती है।शायद  वह कुछ सोचने लगती है। वह क्या सोच रही थी पता नही।लेकिन वह अपने रास्ते पर आगे जरूर बढ़ती है।कुछ दूर पहुचने पर सोनिका को एक घर नजर आता है घर दिखने मे सुन्दर लेकिन सुनसान होता है ऐसा लगता है जैसे शायद ही इस घर में कोई रहता होगा।ज्योही सोनिका घर के सामने से निकलती है उसे पीछे से एक आवाज आती है।मानो कोई सोनिका को रुकने के लिए केह रहा हो।सोनिका पलटती नही है सोनिका अब डर चुकी होतीहै वह तेज गति से आगे जाने लगति है।इतने में ही अचानक एक कार आती दिखाई देती है वह सोनिका की ओर आ रही होती है।सोनिका घबरा जाती है उसकी साँसे तेज तेज चलने लगति है घबराई डरी सी सोनिका कुछ सोच समझ नही पाती है। तब ही सोनिका के कानो के पास जोर जोर से आवाज आती है यह आवाज अलार्म की होती है घड़ी में सुबह केआठ बज चुके होते है सोनिका अब नींद से जाग चुकी होती है ओर एक गहरी साँस लिए कहती है।हे भगवान यह सपना था।                                           

गर्मियो की छुट्टिया



नमस्कार ,  दोस्तो आज से मैं अपना ब्लॉग लेखन शुरू कर रही हूँ  अपने ब्लॉग  के जरिये मैं जीवन से जुड़ी कुछ कहानिया कुछ किस्से व रोचक घटनाये साझा करने वाली हूं आशा करती हूं आपको पसंद आयेगी। दोस्तो सभी बच्चो को गर्मियो की छुट्टियों का इंतजार होता है क्योकि उन्हें मामा, बुआ ,दादा-दादी के पास छुट्टिया बिताने का मोका जो मिलता है ये कहानी भी ऐसे दो बच्चो की है मीरा और अभिषेक जो अपनी वार्षिक परीक्षा खत्म होने के बाद मिलने वाली छुट्टियों को लेकर खुश थे मीरा और अभिषेक को माँ मीरू और अभि कहकर पुकारा करती थी मीरू अभि से बड़ी थी इसलिये अभि मीरू को दीदी कहकर पुकारा करता था मार्च का महिना था परीक्षा समाप्त हो चुकी थी शाम के खाने के बाद मीरू ओर अभि दोनो झूले पर बैठे हुए बाते कर रहे थे के इस बार वे कहा जाने वाले है मीरू अभि से कुछ कहने वाली होती है तभी माँ आकार कहती है इस बार तुम दादी के पास गाँव जाने वाले हो माँजी का बोहोत मन है के इस बार तुम छूट्टीयो मे उनके पास रहो। मीरू और अभि चेहेक उठे की वे दादी के पास जाने वाले है रात को सोते वक़्त भी वह सोचते रहे की गाँव मे दादी के साथ कितना मजा आने वाला है  यह सोचते -सोचते उनकी आँख लग गई। और अगले दिन ही सुबह पिताजी मीरू और अभि को लेकर गांव के लिए निकल गये । गांव जाते समय दोनो ही बच्चे बस की खिड़की से बाहर देखते जा रहे थे बाहर का दृश्य उन्हें  लुभावना लग रहा था   कभी पहाड़ तो कही हरियाली नजर आ रही थी सड़क किनारे बने कबेलू के घर  यह सब देख उन्हें कुछ नया सा लग रहा था देखते-देखते सफर खत्म हो गया और वे गांव आ पहुचे । बस से उतरते ही वे तेज कदम बढाये दादी के घर की ओर चले जा रहे थे घर पहुचते ही अभि ने जोर से आवाज लगाई दादी दादी देखो हम आ गये ।फिर क्या था आवाज सुन दादी भी झटपट बाहर आई । बच्चो को देखते ही स्नेहपूर्वक गले से लगा लिया और उन्हें दुलारने लगी ।मीरू अभि के पिताजी ने अपनी माँताजी के पैर छुकर आशीर्वाद लिया और कुछ समय उनके साथ व्यतीत किया व रात रुक्कर अगली सुबह शहर चले गये।पिताजी के जाते ही मीरू अभि, दादी से गांव में घुमाने लेजाने की जिद करने लगे दादी ने भी तुरंत हाँ कर दी । अब क्या था हर रोज मीरू ओर अभि का मौज-मस्ती में बितने लगा वे कभी गांव की सैर करते तो कभी हाट घूमने जाते । आज तो दोनो दादी के साथ खेत पर गये थे पहेली बार उन्होंने फसल कटते देखी महुए भी खाये वाह क्या मीठा स्वाद है यह कह दोनो मुस्कूरा दिये।अब तो मीरू और अभि के नये दोस्त भी बन गये थे जिनके साथ सितोलिया खेलना , बगीचों में जाकर आम तोड़ना ,नीम के पेड़ो पर झूला झूलना सबके साथ मेला देखने जाना ,कटपुतली का नाच देख खुश होनो ,रंग बिरंगे गोले खाना इस तरह से दोनो के दिन गुजर रहे थे गाँव की शांत सुबह देखना कोयल की मधुर आवाज सुनना शीतल मंद हवा  का साथ  सबका आँगन में इकट्ठा होकर बैठना बतियाना ,दादी के हाथ का बना शीरा मजे से खाना। दादी से  रोज नई कहानियां सुनना । इस तरह दिन बितते रहे ओर छुट्टियां कब खत्म हो गई पता ही नही चला ओर वापस शहर जाने का समय गया। मीरू और अभि दोनो खुश थे की उनकी ये छुट्टिया आन्नद बारी रही। जो भी समय यहा बिताया उसमे बहुत कुछ देखा और  जाना । दादी के प्यार को मन में बसाये बिताये पलो की सारी यादो को लिए हस्ते मुस्कुराते मीरू और अभि वापस शहर चले गये!☺️😊

एक चुटकी प्रेम

मार्च बित गया था ठंड के नख़रे अब कम हो गए थे कम क्या यूँ कहें कि अब खत्म ही हो गये थे सूरज के तीखे तेवर जो शुरू हो गये थे। अब गर्मागर्म पकोड़े...

Sonal bhatt MULAKAT-KAHANIYO-SE STORY OF OUR LIFE