आसमा के नीचे



हर पल ये सोचते हुए की अब वक्त बदलेगा , वक्त ही गुजर गया पर कुछ नही बदला जो जैसा था वो वैसा ही रहा ,हालात भी वैसे ही है कुछ भी तो नही हुआ, शायद ये सोचना ही गलत था मेरा, की वक्त बदलेगा वक्त नही बदला पर वक्त ने मुझे बदल दिया। मुड़ ऑफ था किसी काम मे मन भी नही लग रहा था तो टेरिस पर चला आया। सच मे ऊँचाई पर आकर जब नीचे की ओर देखते है ना ,तो सब कुछ बहुत छोटा नज़र आता है इतना छोटा की कभी - कभी तो नज़र ही नही आता। पर इसका मतलब ये नही की वो है नही, वो होता है पर जो ऊँचाई पर है उसे वो दिखाई नही देता या ये कहे कि वो देखना नही चाहता क्योंकि उसकी नज़र में वो खुद सबसे बड़ा बन जाता है। 

एक साल पहले जब कॉल आया -  हेलो, येस आई एम अपूर्व जोशी येस ओह! ओके थैंक्यू  कुछ इस तरह बात हुई थी मेरी और फाइनल इंटरव्यू हुआ और मैं सिलेक्ट हो गया। बड़ी कोशिशों के बाद जब कुछ मन चाहा मिल जाये तो पाँव जमीं पर कहाँ पड़ते है वो तो हवाओं से बात करने लगते है मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही था। लंबे इंतजार के बाद मैंने एक बड़ी कम्पनी में वो पोस्ट हासिल की थी जो मैं चाहता था। अब हर दिन मेरा बिजी था मैं मन लगाकर अपना काम कर रहा था जो भी प्रोजेक्ट, टास्क मुझे दिये जा रहे थे मैं उन्हें वक्त से पहले कम्प्लीट कर रहा था काफी कम वक्त में मैं बहुत तेज़ी से सिख रहा था। मेरी इस ग्रोथ से सब सरप्राइसड़ थे इतनी जल्दी बहुत कुछ सिख लिया है तुमने मेरे सीनियर ने मुझसे कहा, अपनी तारीफ सुनकर मैं मुस्कुरा दिया। जब मैं कॉलेज में था तब अपने पड़ोस में रहने वाले विक्की भईया से बड़ा इम्प्रेस था उनकी पर्सनालिटी ड्रेसअप क्या? एटीट्यूट था उनका। कभी - कभी बाल्कनी में बैठे लैपटॉप चलाते दिखाई देते थे कभी - कभार छत पर टहलते हुए दिख जाते थे तो थोड़ी बहुत बात हो जाती थी उनसे, एक बार उन्होंने कहा था एक बार एक अच्छी कम्पनी में जॉब लग जाती है तो बस तरक्की ही तरक्की। 

जब मेरी जॉब लगी तब मुझे विक्की भईया की बात याद आई थी और मुझे पूरा यकीन था कि यहाँ रहकर मेरी प्रोग्रेस जरूर  होगी। आखिर इतनी बड़ी कंपनी और एक्सपिरियंसड लोग जो है मेरे आस - पास। जब हम स्मार्ट पर्सन्स के बीच काम करते है तो हमारा नॉलेज बढ़ता है और मैं जानता था कि मैं ऐसे ही लोगो के बीच हूँ वैसे मैं भी कम टेलेंटेड नही था मेरी स्किल्स भी अच्छी थी और मैंने हर वक्त कोशिश की अपना बेस्ट देने की और कुछ वक्त तक सब कुछ अच्छा रहा। 

हर चमकती चीज़ सोना नही होती दूर से जो नजर आता है वही पास जाकर भी दिखाई दे ऐसा जरूरी नही। ये मान लेना कि सब कुछ बहुत अच्छा है ये हमारी ग़लतफ़हमी भी हो सकती है। आजकल मुझे ऑफिस में कुछ अजीब लगने लगा था या शायद मैंने अब इस बात को नोटिस करना शुरू किया था वैसे मेरे कुछ कलीग्स अच्छे थे सबसे अच्छी दोस्ती हो गई थी मेरी, पर सीनियर पोस्ट पर जो थे उनका बिहेवियर ज़रा अलग था। जाने क्यों वो थोड़े उखड़े- उखड़े से रहते थे और कुछ तो ऐसे पेशाते थे जैसे वही बॉस हो। ये मेरी पहली जॉब थी इसलिए ऑफिस के माहौल के बारे मुझे ज्यादा नॉलेज नही थी। मेरे कलीग्स को देखा था मैंने , सीनियर्स के इर्दगिर्द होते हुए उनकी तारीफ करते हुए और कुछ को बुराइयाँ करते हुए। शुरू में तो मुझे ये सब कुछ समझ ही नही आया पर धीरे- धीरे समझ आने लगा था कि चाहे आप जहां हो पर जिनका ओहदा आपसे ज्यादा हो उन्हें आपको खुश रखकर चलना होगा। काम ही नही मीठी बातें भी आनी चाहिये। पर ना मुझे झूठी तारीफे करना आता था और ना ही मक्खन लगी बातें मुझे सिर्फ मेरा काम करना आता था जिसके लिए मुझे अपॉइंट किया गया था। मुझे लगता था मेरे अपने फील्ड में बेहतर होने से , इंटेलिजेंट होने से सब मुझे लाइक करेंगे पर ऐसा हुआ नही बल्कि मेरे अपने कुछ कलीग्स मुझसे चिढ़ा करते थे और सबसे ज्यादा तो मेरे टीम लीड ही मुझसे चिढ़े रहते थे जोकि मुझसे उम्र में काफी सीनियर थे। ना जाने क्यों पर हर वक्त वो कुछ उखड़े नजर आते थे। जब कभी प्रोजेक्ट में कहीं कन्फ्यूजन होने पर मैं कोई सवाल कर लेता तो वो ऐसे मुझे घूरते जैसे मैंने कोई गुनाह कर दिया हो। अब जो ऑफिस में देख रहा था वो मेरी कल्पना से बिल्कुल अलग था विक्की भईया को देखकर में जितना खुश होता था अब खुदको उस जगह पाकर भी मुझे कोई खुशी नही हो रही थी। अब समझ आया कि कभी- कभी जब विक्की भईया ऑफिस से लौटते थे तो अपसेट क्यों नज़र आते थे शायद उनके साथ भी ऐसा ही कुछ होता होगा जहाँ कुछ लोग बेवजह ही उनसे चिढ़ते होंगे , उन्हें देखकर तानाकशी करते होंगे , कोशिश करते होंगे उनके कॉन्फिडेंस को कम करने की।

"तुम आगे बढ़ना चाहोगे पर लोग तुम्हे पीछे खिंचने की कोशिश करेंगे और ये एक बार नही बार- बार होगा" ये विक्की भईया ने कहा था उस दिन वो उदास थे हाथ मे फर्स्ट ईयर की बुक लिए जब मैं टेरिस पर पहुँचा तो वो खामोश अकेले किसी फिक्र में बैठे हुए थे हेलो भईया कहते हुए मैं उनके पास जाकर बैठ गया, वो हल्का सा मुस्कुरा दिए फिर हमने कुछ देर तक बात की और - और बातों ही बातों में उन्होंने कहा था जितनी मेहनत तुम आगे बढ़ने के लिए करोगे उतनी ही कोशिशें लोग तुम्हें पीछे धकेलने के लिए करेंगे, बड़ी कंपनीज़ में जॉब पाना ही मुश्किल नही रहता वहाँ टिके रहना भी मुश्किल होता है। उस वक्त विक्की भईया की बातें मुझे इतनी ज्यादा समझ नही आई थी। आज जब खुद उस जगह पर हूँ तो सब कुछ समझ पा रहा हूँ कि ऑफिस लाइफ़ सोचने में तो बड़ी अच्छी लगती है पर जीने में उतनी आसान नही होती। एक साल आज पूरा हो गया मुझे इस कम्पनी को जॉइन किये इस एक साल में मैंने बहुत कुछ देखा और सीखा, प्रोफेशनल लाइफ में कोई दोस्त या साथी नही होता हर एक आपका कॉम्पेटिटर होता है। मेरे इस एक साल के एक्सपीरियंस ने मुझे कुछ हद तक बदल दिया है मैं पहले जितना फ्रेंक नही हूँ और ना ही उतना सिंपल। "जो कमियाँ देखना चाहते हो वहाँ कितनी भी कोशिश कर लो उन्हें खूबियाँ  नज़र आएँगी ही नही"। मैंने सालभर बहुत मेहनत की , कोशिश की अपनी बेस्ट परफॉमेंस देने की और मैने दी भी, जो भी प्रोजेक्ट मुझे दिए गए मैंने उन्हें वक्त से पहले पूरा किया, अपने आपको भी बदला अपना स्टाइल अपना लुक बिल्कुल प्रोफेशनल , जैसा वो चाहते थे वैसा बना पर फिर भी कुछ नही हुआ इतनी मेहनत और कोशिशों के बाद भी मुझे टर्मिनेशन लेटर दे दिया गया। मैंने अपने बॉस से बात भी की पर कुछ नही हुआ वो कुछ नही समझे , समझते भी कैसे जो खुद ऊँचाई पर खड़े होते है उन्हें जमीन पर चलने वाले नजर कहाँ आते है।

दुख इस बात का नही है कि जॉब चली गई , दुख इस बात का है कि इतनी मेहनत करने और काबिल होने के बावजूद हमे वो नही मिलता जो हम डिज़र्व करते है। विक्की भईया के साथ भी ऐसा ही हुआ था जो आज मेरे साथ हुआ और सिर्फ मैं ही नही मुझ जैसे और भी होंगे जिन्हें ऐसे एक्सपीरियंस मिले होंगे। खैर ये मेरी पहली जॉब थी जिसमे मुझे वो एक्सपीरियंस हुए जो शायद फ्यूचर में मुझे काफी काम आएंगे। मैंने इस एक साल में कुछ खोया नही बल्कि पाया है लोगो को करीब से जाना है समझा है ऑफिस लाइफ को जिया है और एक बात मुझे अच्छी तरह समझ आ गई कि कुछ भी आसान नही होता और हमारे सपनो जैसा कुछ भी नही होता, वो अलग होता है बिल्कुल अलग। 

रात होती है तो सवेरा भी होता है, अंधेरे के बाद उजाला भी होता है और हर दिन के बाद एक नया दिन शुरू जरूर होता है इस आसमा के नीचे जी रहे लोगों की ज़िंदगी में हर पल बहुत कुछ होता है। 

 वैसे मैंने दूसरी कम्पनीज़ में जॉब के लिए अप्लाय कर दिया था और दो दिन बाद मैं जॉइन भी कर लूँगा। जहाँ फिर एक नई कम्पनी नया ऑफिस नये कलीग्स होंगे , कुछ नई प्रॉबलम्स होंगी और मिलेंगे नये एक्सपीरियंस इसी आसमा के नीचे।

 

 

ओस की बूंदे



गुलाबी ठंड की दस्तक से मौसम जरा बदल गया है सुबह - शाम की ये हल्की - हल्की ठंड का एहसास ऐसा लगता है जैसे कोई होले- होले से गुदगुदी कर रहा हो, गार्डन की घास पर जमी ओस की बूंदें तो ऐसी लग रहीं थी जैसे मोतियों की कोई चादर हो जिस पर भूवी होले - होले बड़े प्यार से अपना एक - एक कदम रख रही थी ओस से भीगी हुई घास जब भूवी के पैरों के तलवों को लगती तो ये ठंडा कोमल स्पर्श भूवी को बड़ा अच्छा लगता ,तभी तो भूवी धीरे- धीरे कदमों को आगे बढ़ाते हुए गार्डन में टहल रही है। वैसे आजकल उसे ओस में भीगी घास पर चलना पसन्द आने लगा है तभी भूवी सुबह - सुबह गार्डन में कभी टहलती नज़र आती है तो कभी पौधों की पत्तियों पर ठहरी ओस की बूंदों से खेलती दिखाई देती है। ये भूवी कुछ बदली सी नज़र आने लगी है क्या ? हो गया है इसे, अपनी भौहों को ज़रा सिकोड़ते हुए दरवाज़े के पास खड़ी भूवी की माँ भूवी को देखकर यही सोच रही थी। भूवी बेटा कॉलेज नही जाना हे क्या? आज ,माँ ने आवाज़ लगाते हुए कहा , हाँ माँ जाना हे ना आ रही हूँ भूवी जवाब देते हुए बोली। 

कुछ देर बाद भूवी तैयार होकर आईने के सामने खड़ी थी कभी अपने बालों को ठीक करती तो कभी अपने चेहरे को निहारती ये सोचकर कि मैं अच्छी तो लग रही हूँ ना। होता है होता है जब नया - नया कॉलेज जॉइन किया हो तब ऐसा ही होता है अभी दो महीने ही तो हुए है भूवी को कॉलेज जाना शुरू किए हुए। ये नई- नई कॉलेज लाइफ भूवी के मन को बड़ी भा रही है और भाये भी क्यों ना अब स्कूल जैसा थोड़ी ना है जो ड्रेसकोड में जाना है अब तो भूवी रोज़ अलग- अलग अपने पसन्द की ड्रेस  पहनकर जाती है और हल्का - फुल्का मेकअप भी कर लिया करती है , कॉलेज में आ गए है स्कूल में नही है अब, अरे बड़े हो गए है हम इतना तो चलता है जब से भूवी की दोस्त ने भूवी से कहा है बस उसके बाद से ही भूवी का ये हल्का - फुल्का मेकअप शुरू हो गया है। भूवी , भूवी बेटा माँ ने आवाज़ लगाई तो भूवी तुरन्त कमरे से बाहर आ गई , कितना टाइम लगता है तुझे तैयार होने में चल अब जल्दी से नाश्ता करले वरना तेरे पापा को देर हो जाएगी, भूवी ने जल्दी- जल्दी नाश्ता किया बाय मम्मा कहा और पापा के साथ चली गई। हर रोज़ भूवी को उसके पापा ही कॉलेज छोड़ने जाते है क्योंकि भूवी का कॉलेज उनके ऑफ़िस के रास्ते मे ही पड़ता है। 

हाय श्रेया हाय निधि , हाय भूवी आ गई मैडम हम तेरा ही वेट कर रहे थे चल क्लास में चलते है पर अभी तो पूरे दस मिनिट बाकी है क्लास शुरू होने में भूवी ने इतराते हुए कहा , मैडम हमे लास्ट वाली बैंच पर बैठने का कोई शौक नही है ओके तो चलो अब बोलते हुए निधि श्रेया और भूवी को क्लास में ले आई और कुछ देर बाद क्लास शुरू हो गई। एक के बाद एक लैक्चर चलते रहे और इतना सारा पढ़ने के बाद भूवी का चेहरा जो कॉलेज आते वक्त फूल की तरह खिला हुआ था वो अब पढ़ाई रूपी धूप से थोड़ा सा मुरझा गया था पर ज्यादा देर तक नही। फोर्थ पीरियड पूरा होने पर जब बेल बजी तो भूवी के चेहरे पर  हल्की- हल्की ताज़गी आ गई कैमिस्ट्री का पीरियड जो शुरू हो गया था। कैमिस्ट्री भूवी का फेवरेट सब्जेक्ट है जो कि शुरू से तो नही था बस अभी - अभी कुछ दिनों से फेवरेट बना है वरना पहले तो कैमिस्ट्री भूवी को बड़ा ही झंझट भरा लगता था पर अब इंट्रेस्टिंग लगने लगा है। सर आये और क्लास शुरू हुई सर जो भी बोर्ड पर समझाते या कहते भूवी बड़े ध्यान से उसे सुनती और समझती भूवी का क्लास में इतना मन लगता कि वो एक बार भी अपने फ्रेंड्स की ओर नज़र घूमाकर भी नही देखती और जब क्लास खत्म हो जाती तो चिढ़ते हुए भूवी कहती ये कैमेस्ट्री का पीरियड इतनी जल्दी खत्म क्यों हो जाता है भूवी कहती तो उसकी सहेलियाँ हँसने लगती हाँ , हाँ प्रिंसिपल से जाकर कहेंगे की कैमेस्ट्री की क्लास का टाइम बड़ा दिया जाए क्योंकि ऐसा भूवी मैडम चाहती है और तब भूवी मुस्कुरा देती। 

जिंदगी में जब कुछ नई चीज़ो की दस्तक होती है जिनसे हम पहले कभी रूबरू न हुए हो तो मन कुछ उलझा- उलझा सा  लगने लगता है जैसे भूवी जो करीब एक घन्टे से अपने नये स्मार्ट फ़ोन में उलझी हुई है एक घन्टे की मेहनत के बाद भूवी ने अपने नए फ़ोन के सारे फीचर्स को अच्छी तरह समझ लिया पर उसके मन का क्या ? मन तो अभी भी उलझा - उलझा सा है। जिन नये एहसासों ने भूवी के मन को घेरे रखा है उनको भूवी कैसे समझेगी और सुलझाएगी। आज कॉलेज के कॉमन रूम में बैठी ये तीनों सहेलियाँ असाइंमेंट तैयार करने में लगी है , भूवी ने तो क्लासेस भी अटेंट नही की उसे केमिस्ट्री का ये असाइंमेंट सबसे अच्छा जो बनाना है दो दिनों से भूवी पूरी मेहनत से बस इस असाइंमेंट को बनाने में ही लगी हुई है केमिस्ट्री की पीरियड की बेल बजते ही भूवी खुश होते हुए क्लास में चली गई उसे पूरा यकीन है कि सर को उसका असाइंमेंट ही सबसे अच्छा लगेगा पर ऐसा हुआ नही रुद्र सर ने जब सबके असाइंमेंट देखे और कहा- सबने मेहनत अच्छी की है सबके असाइंमेंट बढ़िया है पर सबसे अच्छा जिसका असाइंमेंट है , सर ने इतना कहा कि भूवी खुश हो गई लेकिन जैसे ही सर ने नाम लिया नेहा भूवी का मन दुखी हो गया। शाम तक भूवी उदास रही सिर्फ इस बात के लिए की सर उसके असाइंमेंट से ज्यादा खुश नही हुए। रात को अपने बेड पर लेटे हुए भूवी सोचती रही कि वो ऐसा क्या करें कि रुद्र सर उससे खुश हो जाये और इतने सारे स्टूडेंट्स के बीच वो उसे याद रख पाए सोचते - सोचते भूवी की आँख लग गई। 

तीन दिन बाद - आज टीचर्स डे है सब अपने - अपने फेवरेट टीचर्स के लिए कुछ न कुछ जरूर लेकर आएंगे मैं क्या लूँ आईने के सामने बैठी खुदको देखते हुए भूवी बोली। एक घन्टे बाद भूवी कॉलेज में थी हर एक स्टूडेंट्स के हाथ मे कुछ न कुछ नज़र आ रहा था किसी के हाथ मे फूल था तो किसी के हाथ मे ग्रीटिंग कार्ड भूवी के पास भी कुछ था जो वो अपने सबसे खास टीचर के लिए लाई थी पूरे कॉलेज में भूवी की आँखें यहाँ से वहाँ अपने टीचर को ही तलाश रही थी कि तभी स्टाफ रूम के बाहर उसकी तलाश पूरी हो गई और झट से दौड़ती हुई सर के पास पहुँची और तेज़ आवाज़ में मुस्कुराकर बोली हैप्पी टीचर्स डे सर और फूलों से भरा बुके सर के हाथ मे दे दिया। थैंक्यू भूवी इतना सुंदर बुके, ये मेरे फेवरेट फ्लॉवर है रुद्र सर ने कहा। सच में मुझे तो पता ही नही था ये फूल मुझे भी बहुत पसंद है कहते हुए भूवी का चेहरा भी फूलों की तरह खिल उठा इसके बाद भूवी ने बुके तो सर को दे दिया पर उन फूलों की महक भूवी के मन मे रह गई। 

आगे भी ऐसा ही चलता रहा भूवी केमिस्ट्री के सब्जेक्ट में मन लगाकर मेहनत करती ताकि उसके मार्क्स सबसे अच्छे आये और सर खुश हो जाये। क्लास में भूवी सर के ओर देखती रहती। सर जो - जो कहते उस हर एक बात को फॉलो करती। अब तो भूवी को घर पर होते हुए भी रुद्र सर का ख्याल रहता था। भूवी ने जो आजकल थोड़ा बन सवरकर कॉलेज जाना शुरू किया है वो सब भी रुद्र सर के लिये ही है। शाम के वक्त घर के गार्डन के झूले पर हाथ मे गुलाब का फूल लिए भूवी खुद से बातें कर रही थी रुद्र सर कितने अच्छे लगते है ना , कितने अच्छे से पढ़ाते है आई लाइक रुद्र सर , पर मैं उन्हें कैसे बताऊँ क्या? वो मुझे लाइक करते है। करते है नही करते है , करते है नही करते है कहते हुए भूवी फूल की एक - एक पंखुड़ी को तोड़े जा रही थी और तोड़ते - तोड़ते भूवी ने सारी पंखुड़ियाँ तोड़ दी और फिर उन पंखुड़ियों से खेलने लगी। इस नादानी भरी उम्र में भूवी कच्चे धागे में प्यार के मोती पुरो रही थी पर ये प्रेम की माला बनेगी भी या बनने से पहले ही टूट जाएगी।

अब भूवी का अपने मन की बात अपने मन मे रखना मुश्किल हो रहा था वो जल्द से जल्द रुद्र सर को सब कुछ कह देना चाहती थी पर दिल की बात कहना इतना आसान नही होता और भूवी के लिए तो ये और भी मुश्किल था वो हर बार कोशिश करती पर कहते - कहते रुक जाती है लेकिन आज  भूवी ने सोच लिया था कि कल अपने जन्मदिन पर वो सर से बात जरूर करेगी। आज भूवी बहुत खूबसूरत लग रही थी भूवी ने अपने पापा की गिफ्ट की हुई ड्रेस पहनी थी क्लास में सब ने भूवी को बर्थडे विशेस दी हैप्पी बर्थडे भूवी , मेनी हैप्पी रिटर्न्स ऑफ द डे भूवी,  हैप्पी बर्थडे माय स्वीट फ्रेंड , थैंक्यू थैंक्यू , थैंक्यू माय फ्रेंड्स मुस्कुराते हुए भूवी ने सबको थैंक्यू कहा और फिर क्लास शुरू हो गई लेकिन भूवी को तो रुद्र सर की क्लास का इंतजार था जोकि 2 घन्टे बाद खत्म हुआ क्लास शुरू हुई सर ने आते ही पढ़ाना शुरू कर दिया, कितनी देर हो गई सर ने एक बार भी मेरी तरफ देखा नही , अगर वो देखेंगे नही तो उन्हें कैसे पता चलेगा कि आज मेरा बर्थडे भूवी मन ही मन खुद से कह रही थी। पूरा पीरियड निकल गया पर रुद्र सर ने एक बार भी भूवी की ओर नही देखा इस बात का भूवी को बहुत बुरा लगा वो उदास हो गई अब मैं सर से कभी बात नही करूंगी उनकी तरफ़ देखूँगी भी नही भूवी मन ही मन गुस्सा कर रही थी पर ये गुस्सा जल्दी शांत भी हो गया क्योंकि भूवी सर से नाराज़ कैसे रह सकती है भला। आज भूवी सर से बात नही कर पाई लेकिन उसने ठान लिया है कि वो कल जरूर बात करेगी। अगले दिन वाइट् सूट और रेड दुपट्टे में भूवी बहुत प्यारी लग रहती थी कॉलेज के पार्किंग एरिया में बैठी भूवी बार- बार अपने हाथ मे पहनी घड़ी देख रही थी। 4 बज गये थे कुछ देर में रुद्र सर चलकर आये और अपनी कार का दरवाजा खोलने लगे तभी आवाज आई सर , सर ने मुड़कर देखा तो भूवी खड़ी थी। भूवी तुम , क्या?  हुआ कुछ पूछना था सर ने पूछा। नही कुछअ कुछ कहना था कहते हुए भूवी की जबान लड़खड़ा रही थी और हाथ काँप रहे थे। कुछ कहना है ,क्या? कहना है भूवी तुम ठीक हो ना देखो कुछ बताना चाहती हो तो बता सकती हो सर ने कहा तब भूवी ने अपने बैग से रेड रोज़ निकाला और सर की ओर हाथ बढ़ाकर बोली आय लाइक यु सर आप बहुत अच्छे लगते है मुझे, पता है केमिस्ट्री मुझे बिल्कुल अच्छा नही लगता था पर जब से आपने पढ़ाया तब केमिस्ट्री मुझे अच्छा लगने लगा है और पता है मुझे भी ओस की बूंदे अच्छी लगने लगी है आपने सही कहा था ओस की बूंदे मोतियों की तरह लगती है बिल्कुल मोती जैसी कहते हुए भूवी की आँखों से आँसू झलक गए। 

भूवि की बात सुन रुद्र सर हैरान रह गए उन्हें समझ नही आ रहा था कि वो क्या कहे। भूवि हम बाद में बात करेंगे अभी तुम घर जाओ ठीक है। अगले दिन रुद्र सर एक दोस्त के साथ भूवी के घर पहुँचे ,घर के गार्डन मे लगे झूले पर भूवी और सर साथ मे बैठे हुए थे सर भूवी से कुछ कह रहे थे। जो अभी तुम्हारी उम्र है ये उम्र बहुत नादानीभरी होती है इस वक्त हमारी पसन्द - नापसन्द सब बदलने लगती है, कुछ बातें मन को लुभाने लगती है मन नई- नई ख्वाइशें करने लगता और ऐसा इस उम्र में सबके साथ होता। जब मैं कॉलेज में था तो तुम्हारे जैसा ही था नादानी से भरा। मुझे नन्दिनी मेम बहुत अच्छी लगती थी वो मेरी फेवरेट थी तब मेरी सोच तुम्हारे जैसी ही थी लेकिन कुछ साल बाद मुझे एहसास हुआ थी कि नन्दिनी मेम सिर्फ मुझे अच्छी लगती थी बाकी तो मैं ही कुछ और सोच बैठा था क्योंकि उस वक्त मेरी  समझ कम थी मुझे लगा था कि मैं नन्दिनी मेम को चाहने लगा हूँ जबकि ऐसा था ही नही ये तो मेरे नासमझ मन की ग़लतफ़हमी थी जिसे मैं सच मान बैठा था तुम्हारी तरह, रुद्र सर ने भूवी से कहा तो भूवी सर की ओर देखने लगी और उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। भूवि किसी का अच्छा लगने का मतलब उससे प्यार हो जाना नही होता जब तुम बड़ी हो जाओगी समझदार हो जाओगी तो समझ जाओगी मेरी तरह, रुद्र सर मुस्कुराते हुए बोले। सॉरी सर मुझसे गलती हो गई कहकर भूवी ज़ोर- ज़ोर से रोने लगी। अरे! भूवी देखो ऐसे मत   रोओ प्लीज़ चलो आँसू पोछो गुड़ गर्ल अब इनसे मिलो ये रिया है मेरी मंगेतर। हाय भूवी जो हुआ वो सब भूल जाओ और अपने करियर पर फोकस करो ओके हम दोनों तुम्हें इनवाइट करने आये है रिया ने कहा। भूवी शादी में आओगी ना सर ने पूछा , हाँ भूवी बोली। अहाँ ऐसे नही मुस्कुराकर बोलो रुद्र सर ने कहा, ओके सर भूवी मुस्कुराकर बोली।  

मासूम दिल जब कोई ख्वाइश कर बैठता है और वो ख्वाईश पूरी ना हो तो दिल तो दुखता ही है भूवी का दिल भी दुख रहा था अब ये ख्वाईश सही थी या गलत ये उसे नही पता बस भूवी इतना जानती है कि एक ख्वाईश थी जो पूरी न हो सकी। सुबह जल्दी उठकर भूवी गार्डन में पौधों के पास खड़ी थी फूलों पर पड़ी ओस को हाथों से छूकर देख रही थी कितनी सुन्दर लगती है ना ये ओस की बूंदे मोतियों के जैसी। 


एक चुटकी प्रेम

मार्च बित गया था ठंड के नख़रे अब कम हो गए थे कम क्या यूँ कहें कि अब खत्म ही हो गये थे सूरज के तीखे तेवर जो शुरू हो गये थे। अब गर्मागर्म पकोड़े...

Sonal bhatt MULAKAT-KAHANIYO-SE STORY OF OUR LIFE