नाराज़गी तेरी


लगातार हो रही बारिश से सारा हाल बेहाल सा नज़र आ रहा था रास्ते भीगे हुए थे और कहीं - कहीं सड़को पर पानी भी भर गया था कार ड्राइव करने में थोड़ी दिक्कत तो हो रही थी लेकिन फिर भी ये सफर मुझे अच्छा लग रहा था वैसे बारिश बहुत तेज़ नही हो रही थी लेकिन रुक भी नही रही थी कभी पानी धीमे- धीमे गिरता तो कभी अचानक थोड़ा तेज़ बरसने लगता और फिर वापस बारिश धीमी हो जाती, लग रहा था मानो जैसे बारिश का अपना ही एक अलग मूड बन रहा हो जोकि बार - बार बदले जा रहा था। वैसे मूड तो मेरा भी कुछ - कुछ बदल रहा था ड्राइव करते हुए मैं रास्तों को बड़े गौर से देख रहा था ये भीगी हुई सी सड़के ये भीगे रास्ते ना जाने क्यों मुझे अच्छे लग रहे थे बारिश में भीगे ये पेड़ रात में ठीक से नज़र तो नही आ रहे थे पर फिर भी मुझे लगा जैसे ये होले से मुस्कुराएं हो, अब मैं धीरे- धीरे गुनगुनाने लगा। गुनगुनाते हुए चोरी- चोरी मेरी नजरें आयुषी को भी देख रहीं थी आयुषी मेरे बगल वाली सीट पर ही थी कोशिश बहुत की आयुषी ने की उसकी नींद ना लगे पर थकान और रात का लम्बा सफर है तो नींद तो आनी ही थी। वैसे भले ही अभी वो नींद में है पर लग रहा है जैसे अभी मुझे गुस्से में घूरने ने लगेगी पूरे टाइम नाराज़ - नाराज़ सी ही तो रहती है। वैसे अच्छा है की आयुषी अभी सोइ हुई है कुछ पल ही सही मैं उसे मन भर कर देख पा रहा हूँ नही तो मेरी ज़रा गलती से भी नज़र इसकी ओर हो जाये तो कितना चिढ़ जाती , पर सोते हुए कितनी शांत लग रही है कोई गुस्सा या नाराज़गी चेहरे पर नही दिखाई दे रही लेकिन उसकी ज़ुल्फ़ें जरूर उसके चहरे पर आ रही है एक बार मन किया कि उसकी ज़ुल्फों को अपने हाथों से उसके कान के पीछे कर दूँ पर आँखों ने मना कर दिया इसे ऐसे ही रहने दो गालों को छूती इन ज़ुल्फों से आयुषी कितनी खूबसूरत लग रही है उतनी ही प्यारी जितनी तब लगी थी जब पहली बार देखा था सादगी से भरी होले से अपनी पलकों को उठाती - गिराती धीरे से मुस्कुराती हुई उस वक्त कितनी सौम्यता थी आयुषी की आँखों मे और आज सिर्फ गुस्सा और नाराज़गी दिखाई देती है। ओह! क्या हुआ? सॉरी वो सड़क पर गढ्ढ़ा था मैंने देखा नही तुम सो जाओ मैंने कहा तो आयुषी बोली नही मैं सो नही रही थी बस ऐसे ही आँखें बंद की हुई थी कहकर आयुषी खिड़की के बाहर देखने लगी। मैं भी ना रास्ते पर ध्यान नही दिया जाग गई वो अब फिर किसी पुरानी फ़िल्म की भूतनी की तरह मुझे तिरछी निगाहों से देखेगी।वैसे जिसे नही जागना चाहिए था उसकी नींद खुल गई और जिन्हें जागना चाहिए था उन्हें बड़ी ज़ोरों की नींद आ रही है। कुशल और देविका दोनों की ऐसी नींद लगी हुई है जैसे ये अपने घर मे ही हो कुशल , कुशल, उठना कुशल क्या हुआ? घबरा कर आँख खोलते हुए कुशल बोला , तूने कहा था ना आधे रास्ते तू कार ड्राइव करेगा हाँ कहा तो था हाँ तो चल अब आ। गाड़ी रोककर मैंने और कुशल ने अपनी सीट बदल ली कुशल ड्राइविंग सीट पर बैठ गया और मैं पीछे की सीट पर जा बैठा क्योंकि अब कुशल गाड़ी ड्राइव कर रहा था तो देविका भी उसके पास जा बैठी और आयुषी को पीछे बैठना पड़ा। मैं और आयुषी पीछे साथ बैठे जरूर थे पर दूर - दूर ,गाड़ी की एक खिड़की की ओर मैं बैठ गया और दूसरी तरफ आयुषी। आयुषी की निगाहें गाड़ी से बाहर रास्ते की ओर थी शायद अब उसे नींद नही आ रही थी मैंने अपने हाथ मे पहनी घड़ी में देखा तो तीन बजे रहे थे अभी पुणे पहुँचने में हमे और कुछ घन्टे बाकी थे। वैसे अब बारिश पूरी तरह थम गई थी अचानक से सब कुछ खामोश सा लगने लगा था और आयुषी वो तो पहले से ही चुपचाप थी। लगता है बारिश थम गई है मैंने आयुषी की ओर देखते हुए कहा हाँ पता है मुझे आयुषी बोली उसके ये कहने में भी कितनी बेरुखी थी। मैं अच्छी तरह जानता हूँ अगर ऑफिस रिलेटेड वर्क नही होता और उसका मीटिंग अटेंड करना जरूरी नही होता तो ना तो आयुषी हमारे साथ जाती और ना ही अभी मेरे साथ इस गाड़ी में बैठी होती। लेकिन उसे प्रोफेशनल और पर्सनल लाइफ को अलग रखना आता है तभी तो वो मेरे ही ऑफिस में है,असिस्टेंट मैनेजर बनकर। उस दिन इंटरव्यू में उसे अपने सामने देख मैं चौक गया था मैं इन्टरव्यूवर के साथ था सबके साथ मैंने भी आयुषी से दो- तीन सवाल पूछे और आयुषी ने सभी सवालों के जवाब पूरे कॉन्फिडेंस से दिये मुझे अपने सामने देख ज़रा भी हिचकिचाई नही बस एक पल के लिए खामोश जरूर हो गई थी। बाद में मैं सोचता रहा अगर आयुषी सिलेक्ट हुई तो क्या वो जॉइन करेगी या मना कर देगी एक सप्ताह बाद अपने केबिन में उसे देख मुझे अपने सवाल का जवाब मिल गया। मिस आयुषी आप , येस सर दिवेश सर ने कहा है मुझे आपके गाइडडेन्स में वर्क करना है ओके आयुषी की बात सुनने के बाद मैंने कहा उसके बाद आयुषी और मेरे बीच ऑफिस वर्क रिलेटिड डिस्कशन शुरू हो गया। 6 महीने हो गये है आयुषी और मुझे साथ काम करते हुए पर इन 6 महीनों में किसी भी दिन कुछ पल के लिए भी ऐसा नही हुआ की कभी आयु और तन्मय के बीच बात हुई हो हर वक्त बस एक एच आर मैनेजर और असिस्टेंड मैनेजर के बीच ही बात हुई है। मैं कभी - कभार आयुषी का नाम पहले की तरह पुकार लेता तो उसकी आँखें मुझे ऐसे देखती जैसे कह रही हों कि कैसे,  तुम कैसे मुझे इस तरह पुकार सकते हो और तब मैं अपनी पलकें झुका लेता। सफर अगर रात का हो तो रात लम्बी लगने लगती है ऐसा लग रहा है जैसे रास्ते पर बस आगे चलें जा रहे हो और मंजिल आ ही नही रही हो और ये रात , ये हमारे साथ सफर में आगे बढ़ती जा रही हो। धीरे- धीरे मेरी पलकें बंद होने लगी थी मेरी आँखों पर नींद का कब्ज़ा हो रहा था साथ ही खिड़की से आती ठंडी हवा मुझे कुछ हल्की सी ठंड का एहसास दिला रही थी। फिर ऐसा लगा जैसे रात ने अपनी शॉल मुझ पर डाल दी हो जो ठंड के एहसास को ज़रा कम रही थी, और फिर मुझे नींद आ गई। मोबाइल में लगे सुबह 6 बजे के अलार्म ने मुझे नींद से जगाया आँख खुलते ही जब नज़र आयुषी पर पड़ी तो मैंने झट से अलार्म बंद कर दिया आँखें बंद किये खिड़की से अपना सिर टिकाये आयुषी सो रही थी अच्छा हुआ कि अलार्म से उसकी नींद नही खुली। ये दुप्पटे जैसा क्या है? मैं देखने लगा तो कुशल बोला स्टॉल है आयुषी का, वो तुझे नींद में ठंड लग रही थी तो आयुषी ने अपना स्टोल तुझे ओडा दिया दरसल मैंने ही उससे कहा था दबी सी आवाज़ में कुशल बोला मैंने कुशल को ज़रा सा घूरा और फिर स्टोल आयुषी को ओढ़ा दिया। हम सब एक साथ एक ही कम्पनी ने में काम करते है पर कुशल मेरा दोस्त भी है और देविका उसकी वाईफ, तीन महीने पहले ही दोनों ने शादी की है। अच्छा सुन गाड़ी रोक अब मैं ड्राइव करता हूँ तू भी थक गया होगा वैसे अब एक - दो घन्टे ही बाकी है ना पहुँचने में मैंने कुशल से कहा, ठीक है मैं ऐसा करता हूँ किसी ढाबे या रेस्टुरेंट के पास गाड़ी रोक लेता हूँ कुशल बोला। इसके बाद कुशल ने पहले देविका को आवाज देकर जगाया और फिर एक ढाबे के पास गाड़ी रोक ली गाड़ी के रुकते ही आयुषी की नींद भी खुल गई आयुषी नींद हो गई पूरी चलो हम कुछ देर यहाँ रुकने वाले है देविका आयुषी से बोली आयुषी धीमी सी मुस्कान के साथ मुस्कुरा दी और फिर हम चारों ढाबे के अंदर जाकर बैठ गए। कुशल जल्दी कुछ ऑर्डर करो ना लेकिन पहले मुझे चाय भी पीनी है अरे हाँ बाबा मैं वही सोच रहा हूँ पर मेन्यू तो दिख ही नही रहा कुशल मुझे लगता है हमे वहां काउन्टर के पास जाकर पता करना चाहिए मैंने कहा। ठीक है तो चलो फिर चलो हम दोनों चलकर देखते है कुशल ने कहा। नही मैं भी चलूँगी तुम दोनों जाओगे तो पता नही क्या ऑर्डर करके आओगे देविका तुम आयुषी के पास ही बैठो मैं देख लूँगा मेन्यू में तुम्हारी पसन्द का कुछ , नही कुशल मुझे भी साथ चलना है। कुशल ऐसा करो तुम दोनों ही चले जाओ ठीक है अरे यार तन्मय ओके, चलो मैडम। कुशल और देविका मेन्यू देखने चले गये और अब मैं और आयुषी हम दोनों साथ बैठे हुए थे हमारे बगल वाली टेबल पर एक कपल भी बैठा हुआ था जो देखने में अनमैरिड लग रहा था लड़का हाथ में गुलाबों भरा बुके लिए लड़की से कुछ कह रहा था लड़की मुस्कुराते हुए उसकी बातों को सुन रही थी मैं और आयुषी उन दोनों को ही देख रहे थे और अब तो कुशल और देविका भी आ गये थे उस लड़के ने बुके लड़की की ओर बढाया और कहा मैं हमेशा तुम्हें खुश रखूँगा आय प्रॉमिस लड़की ने बुके अपने हाथ में लिया और बोली मैं भी हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगी आय प्रॉमिस। कितना क्यूट कपल है खुश होते हुए देविका ने कहा, हाँ बिल्कुल हमारी तरह कुशल हँसते हुए बोला इस कपल को देख कुशल और देविका दोनों अपनी ही बातों में उलझ गए पर मैं और आयुषी हम दोनों कुछ नही कह रहे थे हम तो चुप से बैठे हुए एक - दूसरे को देख रहे थे सारे प्रॉमिसेस पूरे नही होते कुछ अधूरे भी रह जाते है मेरी तरह शायद आयुषी भी यही सोच रही होगी इस कपल की तरह मैं और आयुषी भी ऐसे ही साथ बैठे हुए थे हमारा रिश्ता तय होने के बाद ये हम पहली बार मिल रहे थे क्योंकि हमारी फैमली एक - दूसरे को पहले से ही जानती थी तो फ़ैमिली फंक्शन्स में हमारी मुलाकातें पहले भी हुई थी पर इस तरह नही, लग रहा था जैसे आज हम पहली बार मिल रहें हो क्योंकि इतने गौर से मैंने आयुषी को पहले देखा ही नही था। हम दोनों आमने- सामने बैठे हुए थे दोनों को ही समझ नही आ रहा था कि बात कैसे शुरू करें आयुषी होले से अपनी पलकों को झपकाती थोड़ा सा मुस्कुराती और फिर कुछ भी नही कहती उसे इतना हिचकिचाता देख मैं खुद भी कुछ नही कह पाता और कुछ देर बाद जैसे - तैसे ही सही हमारे बीच बात शुरू हुई आयुषी मुझे एक सिंपल सी लड़की लगी जो अपनी लाइफ और अपने से जुड़े रिश्तों को लेकर काफी संजीदा थी आयुषी की सीधी- साफ बातों ने और उसकी सादगी ने मेरे मन को छू लिया। तन्मय अरे कहाँ खो गये कुछ खा क्यों नही रहे हो कुशल ने कहा ,हाँ खा रहा हूँ ना मैंने कहा। इस वक्त हमारे सामने खाने की जो भी चीजें रखी हुई थी वो सब देविका की पसन्द की ही थी इसलिए तो इतना खुश होकर चटकारे लेते हुए खाये जा रही थी पर आयुषी की तो आँखे भर आयीं और चेहरा लाल पड़ गया क्योंकि चाट बहुत तीखी थी पानी तो पिया उसने पर फिर भी जुबान जल रही थी उसे ऐसे देख मैं धीरे से मुस्कुरा दिया तो उसकी आँखें गुस्से से बड़ी हो गई मैं उठकर चला गया और 2 मिनिट में ही वापस आ गया ये लो इसे खालो मैंने कहा नही जरूरत नही है अब ठीक हूँ मैं आयुषी बोली, अरे लेलो ना आयुषी देखो क्या हालत हो गई है वो भी मेरी वजह से मैंने ही कहा था तीखा बनाने के लिये प्लीज़ लेलो। देविका की बात मान कर आयुषी ने रसमलाई लेली। अब हम वापस अपनी गाड़ी में थे बस कुछ देर में घर पहुँचने वाले थे लो भई मेरा घर तो आ गया कुशल आ जाओ ड्राइविंग सीट पर अब तुम ड्राइव करना और आयुषी को ठीक से घर छोड़ देना ओके बाय, बाय देविका बाय आयुषी , बाय आयुषी धीरे से बोली। 

सफ़र में जाते वक्त हम जितने तरो- ताज़ा होते है लौटते वक्त उतने ही थके हुए भी रहते है मेरा पूरा शरीर थकान से भर गया था मन बस कुछ देर आराम करने को कह रहा था इसलिए नहाने के बाद मैं सीधा अपने बेड पर जाकर लेट गया आँख ज़रा लगी ही थी कि अचानक आयुषी का ख्याल आ गया और आँख खुल गई सुबह जब आयुषी ने बाय कहा था तब, तब उसकी आवाज में बेरुखी ज़रा कम थी ये रसमलाई का असर था क्या? सोचते हुए मेरे होंठों पर छोटी सी स्माइल आ गई फिर अगले ही पल सोचने लगा कि कितनी अजीब बात है कभी आयुषी मुस्कुराते हुए मुझसे ढेरों बातें किया करती थी और मैं उसकी बातों को सुनकर खुश हुआ करता था और आज , आज मैं इस बात से खुश हो रहा हूँ कि उसकी आवाज में आज मेरे लिए बेरुखी कम थी वक्त किस तरह बदल जाता है। 4 साल पहले सब कुछ कितना अलग था कैसे मैं और आयुषी छिप- छिपकर बातें किया करते थे चोरी- चोरी मिला करते थे जबकि कुछ दिनों बाद हमारी शादी होने वाली थी पर शादी के पहले छुप- छुपके मिलने का मज़ा ही कुछ और होता है उन कुछ दिनों के साथ में मैं आयुषी के मन को पढ़ना सिख गया था उसका तेज़ - तेज़ पलकें झपकाकर किसी बात को बेधड़क कह जाना और फिर कहते हुए एक दम से चुप रह जाना ज़ुबान के साथ- साथ उसकी पलकें भी ठहर जाती थी और फिर धीरे से अपनी नज़र मेरी ओर करते हुए कहती अब तुम भी तो कुछ बोलो फिर मैं कहता हाँ आयु मैं बोल तो रहा हूँ बस तुमने सुना ही नही। हाँ मैं आयुषी के मन के इतने पास आ गया था कि मुझे उसे आयुषी से आयु कहना का हक मिल गया था जो सिर्फ उसके अपनो का था अब मैं भी उसके अपनो में शामिल हो गया था। ये चाहत का एहसास बड़ा प्यारा होता है ऐसा लगता है जैसे हर तरफ बहार आ गई हो हर चीज बड़ी प्यारी और खूबसूरत दिखाई देने लगती है मन खुशी के पंख लगाकर मन मानी उड़ान भरने लगता है बिना ये सोचे कि वो किस दिशा में आगे बढ़ रहा है क्योंकि उसे तो अभी, हर एक दिशा एक जैसी ही नज़र आ रही होती है ,आसमान में चमकते तारे भी ऐसे लगते है जैसे अभी - अभी इनकी चमक पहले से और बढ़ गई हो,सब कुछ बहुत अलग सा लगने लगता है आयुषी और मुझे तो अब दिन भी कुछ बदले हुए से लगने लगे थे नई धूप नई छाँव एक नई डगर जिस पर हाथ थामे हम साथ चलने वाले थे। पर आने वाले कल के बारे में क्या कोई बता सकता है कि कल क्या? होगा या कल कैसा? होगा, नही ना। अब शादी को बस कुछ दिन रह गये थे हम दोनों के घरों में तैयारियाँ शुरू हो गई थी लेकिन दादाजी और आयुषी के मौसाजी के बीच मज़ाक में शुरू हुई एक छोटी सी बहस से सब कुछ बदल गया बड़ो के गुस्से और अहम के आगे एक रिश्ता जुड़ने से पहले ही टूट गया, खुशी से खिलते हुए चेहरों पर खामोशी ने अपनी जगह बना ली थी। तब सिर्फ रिश्ता ही नही टूटा था किसी का विश्वास और दिल भी टूट गया था टूटे हुए दिल की तखलिफ़ सही जा सकती है पर टूट हुए विश्वास का दर्द बहुत गहरा होता है आयुषी की आँखों मे दिखता है वो दर्द मुझे, बुरा लगता है उसे ऐसे देखकर पर कहूँ भी तो क्या।    

अगले दिन मैं रेडी होकर ऑफिस के लिए निकल रहा था जब अपना वॉलेट निकालने के लिए ड्रॉअर खिंचा तो मेरा वॉलेट नही था उसमें , घर मे सब जगह देख लिया पर कहीं नही मिला मैं ऑफ़िस चला गया। अपने केबिन में बैठे हुए मैं याद करने की कोशिश कर रहा था कि लास्ट टाइम मैंने अपना वॉलेट कहाँ रखा था हाँ कल जब मैं कार ड्राइव कर रहा था तब मैंने वॉलेट निकालकर वहीं सामने रख दिया था ओह! नो कहीं कुशल की गाड़ी में तो मेरा वॉलेट नही रह गया वो तो आज आने भी नही वाला उसे कॉल करता हूँ मैंने अपना फोन उठाया कि तभी आयुषी आ गई। सर, आयुषी कहो, सर कुशल सर ने कल ये आपका वॉलेट मुझे दिया था आपको देने के लिए। अच्छा थैंक्यू मैंने कहा। आयुषी को देख लग रहा था जैसे वो कुछ कहना चाहती है, क्या? हुआ आयुषी कुछ कहना है तुम्हें आयुषी ने अपना सिर हिला दिया, बोलो ना। मुझे बस इतना कहना है की जिससे आपका कोई रिश्ता ही नही है उसकी तस्वीर आपको अपने पास नही रखनी चाहिए क्योंकि आपको कोई हक नही है कहकर आयुषी जाने लगी तो मैंने उसे रोक लिया आयुषी रुको प्लीज़ एक बार मेरी बात सुन लो। क्या किसी को अपना मानने के लिए किसी रिश्ते या किसी तरह के हक का होना जरूरी है कहते हुए मैं उसके सामने जा खड़ा हुआ सॉरी, सॉरी जो कुछ भी हुआ उस सब के लिए तुम्हारा विश्वास टूटा उसके लिए मैंने अपना प्रॉमिस तोड़ा उसके लिए। उस दिन जब तुमने मिलने के लिये कहा तब आने वाला था मैं, पर नही आ सका क्योंकि मैं मजबूर था सॉरी आयुषी मैं चाहकर भी कुछ नही कर सका। जो हुआ उसे हम बदल नही सकते पर उस वक्त की कड़वाहट को हर पल साथ लेकर चल भी तो नही सकते क्योंकि इससे हमें ही तखलिफ़ होगी,आयु अपने मन मे भरे गुस्से और नाराजगी से खुद को और दुख मत पहुँचाओ चाहो तो मुझे पर अपना सारा गुस्सा निकाल लो। इस वक्त आयुषी की आँखों से सिर्फ आँसू नही बह रहे थे ये उसके मन का वो दर्द भी था जिसे आयुषी कब से मन ही मन महसूस कर रही थी। मैं नही कह रहा कि मुझसे नाराज़ मत रहो बस इस नाराज़गी से खुद को आज़ाद कर दो। तब सिर्फ तुम्हें ही दुख नही पहुँचा था आयु, दिल तो मेरा भी टूटा था आयुषी की आँखों में देखते हुए मैंने कहा। जब किसी से अपने मन की बात कह देते है तो मन कितना हल्का सा महसूस करने लगता है जैसे दिल पर कोई बोझ था जो उतर गया हो आयुषी से बात करने के बाद मुझे ऐसा ही लग रहा था।

आज सुबह ऑफिस में जब आयुषी और मेरा सामना हुआ तो आयुषी कुछ बदली सी लगी हमेशा उसके चेहरे पर दिखने वाला वो गुस्सा आँखों मे नाराज़गी आज थी नही या फिर दिखी नही मुझे। आयुषी जब फाइल लेकर केबिन में आई तब भी वो उखड़ी सी नज़र नहीआई, उसे ऐसे देख मन को सुकून मिल रहा था वरना उसकी आँखों की वो नाराज़गी कितनी चुभती थी मुझे। अब बस एक ही विश है, फ्लॉवर पॉट में रखे इन फूलों की तरह आयु भी ऐसे ही महकती रहे और कभी ना मुरझाये।

मेरे दोस्त



मेरे दोस्त,

मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ ,  तुम्हारी ज़िदंगी के हर पल में नही पर कुछ पल में ही सही मैं तुम्हारे साथ रहना चाहता हूँ। एक बार फिर से उन बीते लम्हों को तुम्हारे साथ जीना चाहता हूँ फिरसे हाथों में एक- दूसरे का हाथ लिये मस्तमौला चाल में तुम्हारे साथ चलना चाहता हूँ चाहे मेरे गले मे बंधी टाई तिरछी जा रही हो या फिर तुम्हारी शर्ट कमर में बेल्ट होते हुए भी थोड़ी बाहर आ रही हो पर तब भी मुस्कुराते हुए हम यूँ चल रहे हो जैसे हमारा ये मतवाला अंदाज देख सब हमसे जल रहे हो। 

हम फिर से मस्ती में एक - दूसरे के बाल बिगाड़ें और फिर अपने हाथों की उँगलियों से होले - होले उन्हें सुधारें , मेरी पेंसिल गुम हो जाने पर तुम अपनी पेंसिल मुझको दे देना , हो गई मुझसे गुम ये अपने घर पर कह देना। मैं फिरसे दो लड्डू चुपके से अपने बस्ते में छिपाकर तुम्हारे लिए ले आऊँगा तुम खाते हुए कहना हम्म अच्छा लगा मैं कल भी खाऊँगा। जब मैं होमवर्क करके ना लाऊँ तो तुम भी अपनी कॉपी छिपा लेना मेरे साथ - साथ तुम भी डाँट खा लेना। 

थोड़े बड़े होने पर जब हमारी क्लासें अलग हो जाएंगी तुम साइंस पढ़ रहे होंगे और मेरे बस्ते में कॉमर्स की किताबें आ जाएंगी। अब हम साथ नही बैठ पाएंगे पर फिर भी लंच में हम टिफ़िन एक - दुसरे का ही खाएंगे। कुछ तुम अपनी क्लास की बातें मुझसे कहना कुछ मैं तुम को सुनाऊँगा। भले ही दोस्त कुछ नये बन जाये पर छुट्टी के बाद तुम्हारे पीछे साइकिल पर बैठकर मैं ही साथ जाऊँगा। रास्तेभर हम बातें करतें जाएंगे जो कुछ नई - नई बातें अभी हमने सीखी है हम एक - दूसरे को समझाते जाएंगे।

धीरे- धीरे दिन आगे बढ़ेंगे और थोड़ा- थोड़ा वक्त बदल जायेगा। हमे एक - दूसरे का साथ पहले जैसा नही मिल पायेगा। हम कॉलेज में आ जायेंगे हमें मुस्कुराते खूबसूरत नए चहरे मिल जायेंगे अब हम दोनों की दुनिया बदलने लगेगी दोस्तों के साथ मौज - मस्ती , कभी पढ़ाई , करियर जिंदगी कुछ ऐसे चलने लगेगी। अब हम कभी - कभार ही मिल पायेंगे लेकिन फिर भी एक दिन में ही बीते दिनों की सारी कथा सुना देंगे जो कुछ भी होगा मन मे सब बता देंगे। इतने दिनों बाद हुई इस मुलाकत में बातें बहुत होंगी कुछ- कुछ कहकर हम खूब मुस्कुरायेंगे और फिर बाद में गले लगकर बाय फिर मिलेंगे यार, कहकर हम अपने - अपने रास्ते चले जायेंगे।

दिन अब तेज़ी से गुजरेंगे और वक्त पूरा बदल जायेगा हमारा साथ अब पूरी तरह छूट जाएगा। हम दोनों अपने - अपने सपनो अपनी- अपनी मंजिल की ओर दौड़ जायेंगे हम दूर और दूर होते जायेंगे। अपने साथ बिताए उन प्यारे लम्हों को हम अब कल के हाथों मे छोड़ जायेंगे। अभी एक शहर में रहते हुए भी हमे महीनों हो जाया करता था मिले हुए, अब तो सालों हो जायेंगे दो दोस्त मिल नही पायेंगे। अपनी मंजिल की ओर बढ़ते हुए हम बहुत आगे निकल जायेंगे हमारा अपना एक नया जहाँ बसायेंगे जिसमे हमारे अपने होंगे कई दोस्त होंगे जिनके साथ हम खुश होंगे और शायद तब तक हम एक- दूसरे को भूल भी चुके होंगे। 

मुझे नही पता कि मैं तुम्हे याद हूँ कि नही मेरे दोस्त पर, हाँ तुम मुझे याद हो। दोस्त तो मेरे कई है सब अच्छे है पर तुम , तुम हो जब सबके साथ होते हुए भी बोर मैं होने लगता हूँ या तन्हा सा महसूस करता हूँ तो बस झुकाकर अपनी पलके मन मे झाँक लिया करता हूँ और तब पहने स्कूल की यूनिफार्म सबके बीच खड़ा कोई मुझे देख मुस्कुराता है भोला सा चेहरा बिखरे से बाल शर्ट की तो उसके बड़े ही बुरे हाल, देखते ही उसे आँखें मेरी चमक उठती है और दिल मुस्कुराने लगता है यार मेरा मुझे नज़र आने लगता है।   

मैं नही कहता कि तुम हर पल मुझे याद रखो मैं तो इतना चाहता हूँ कि अपनी यादों में बस एक पल मुझे भी अपने साथ रखो। मैं नही कह रहा कि सिर्फ़ मैं ही तुम्हारा दोस्त हूँ बस इतना याद रखो की मैं भी तुम्हारा दोस्त हूँ। मैं नही कहता हर दम मेरा ख़्याल रखना बस इतना चाहता हूँ कि ख्यालों में अपने थोड़ी सी ही मगर जगह मेरे लिए भी रखना। मैं नही कह रहा की अपने नये दोस्तों के साथ वक्त मत बिताना मैं तो इतना चाहता हूँ  की कभी वक्त निकालकर आज नही कुछ सालों बाद ही सही पर मुझसे मिलने एक बार तो आना।  

मेरे दोस्त, मैं तुमसे कहना चाहता हूँ कि एक बार फिर से मैं तुम्हारे साथ बेपरवाह होकर जीना चाहता हूँ , अपने दिल की कुछ बातें कहना चाहता हूँ कुछ तुम्हारे मन का हाल मैं सुनना चाहता हूँ। फिर मनमौजी अंदाज में थामे तुम्हारा हाथ उसी रास्ते पर चलना चाहता हूँ जहाँ से हम कभी रोज़ गुजरा करते थे। मैं बेफ़िक्री के उस कल को आज के इस पल में लाना चाहता हूँ। माना कि अब वक्त पहले जैसा नही रहा और दोस्त हम पुराने है पर दोस्ती के तो आज भी ज़माने है। मेरे दोस्त मैं बस इतना कहना चाहता हूँ मैं दोस्त हूँ तुम्हारा और सदा रहना चाहता हूँ।


एक चुटकी प्रेम

मार्च बित गया था ठंड के नख़रे अब कम हो गए थे कम क्या यूँ कहें कि अब खत्म ही हो गये थे सूरज के तीखे तेवर जो शुरू हो गये थे। अब गर्मागर्म पकोड़े...

Sonal bhatt MULAKAT-KAHANIYO-SE STORY OF OUR LIFE