पहला क्रश



ऑफिस से छुट्टी लेकर अगर शहर से बाहर कहीं घूमने निकल जाओ तो छुट्टी लेने की खुशी दुगुनी हो जाती है जैसे कि मै।बस एक घन्टे में मैं विन्नी के घर पहुंच जाऊंगी। लेकिन उससे पहले ही टैक्सी में बैठे- बैठे रास्ते को देखते हुए विन्नी को लेकर मेरे मन मैं कितने ख्याल आया रहे है अब तक हल्दी तो लग गई होगी विन्नी को ,चेहरा तो खूब दमक रहा होगा और आंखे तारो से भी तेज़ चमक रही होंगी। फोन पर कितना नाराज़ हो रही थी अब फुर्सत मिली मुझसे बात करने की मेरी शादी है और तुम्हे अपनी दोस्त की फिक्र ही नही। विन्नी जी आ रही हूं मैं कल शाम तक पहुँच जाऊंगी मैंने विन्नी से कहा तो वो खुश हो गई। ये मेरी बहुत प्यारी और जल्दी रुठ जाने वाली दोस्त है पर मनाने पर मान भी जल्दी जाती है कितने वक्त से मैं खुद भी भोपाल आने का सोच रही थी किसी न किसी वजह से मेरा आना टल जाता लेकिन विन्नी की वजह से ये पॉसिबल हो ही गया। गाड़ी का ब्रेक लगते ही मेरे दिमाग मे चल रही बातों पर भी ब्रेक लग गया मैं गाड़ी से बाहर आई अपना सामान लिया और विन्नी विन्नी करती घर के अंदर आ गई हाथो में मेहंदी लगाये विन्नी हॉल में आई और खुश होकर मेरे गले लग गई मेरा सारा सामान विन्नी ने अपने रूम में ही रखवाया ताकि मैं उसके साथ रह सकूँ। क्योंकि शादी वाला घर है तो काफी देर तक सब जागते रहे नाचना- गाना , मौज- मस्ती लेकिन मैं तो सफर से थकी हुई थी और आंखों में नींद भी भर आईं इसलिए रूम में चली आई नींद लगने वाली थी कि धीरे से विन्नी कानो में फुसफुसाई बानी सो गई क्या। मैं जानती थी कि विन्नी को मुझसे ढेर सारी बातें करनी है इसलिए अपनी नींद को बाय कहते हुए मैं उठकर बैठ गई फिर विन्नी ने खूब बातें की
अपने होने वाले हसबैंड की , वो कौनसा लहंगा पहनेगी, रिश्तेदारों की , इसकी - उसकी न जाने कितनी बातें रात के 2 बज गए पर बातें है कि खत्म ही नही हो रही थी और बात आई आर्ट्स क्लासेस की जहाँ विन्नी और मैं पैंटिंग सीखा करते थे। विन्नी ने बताया कि आर्ट्स क्लासेस के सभी फ्रेंड्स को इन्विटेशन दिया है साथ ही शरारती अंदाज में बोली साहिल को भी। मैं समझ गई की ये मुझे छेड़ रही है इसे पता है कि वो मेरा पहला क्रश था। इसके बाद बातें करते हुए विन्नी तो सो गई पर मैं जागी रह गई। साहिल के नाम से फिर मन मे गुदगुदी सी हो गई ठीक वैसे ही जैसे तब उसे देखकर होती थी। साहिल के सामने आते ही न जाने क्या हो जाता था कि मेरे हाथों का पेंटिग ब्रश कुछ इस तरह कैनवास पर चलता की कुछ अलग ही आकृति उकेर देता रंगों को कुछ ऐसे आपस मे मिला देती की खुद मैं ही नही समझ पाती की कौन सा रंग किस रंग में मिला है और ये क्या नया रंग बना है  जबकि बनाने में कुछ और जाती थी और बन न जाने क्या जाता था मैं अपनी ही पैंटिंग को देख मुस्कुराने लगती और चुपके से एक नजर साहिल को देख लेती क्या उसने मेरी पैंटिंग देखी हँस रहा होगा न देखकर भले ही जनाब ने तिरछी नजर भी न देखा हो पर मैं खुद से ही सब मान लेती।
जब कभी रीता दी अपने क्लासमेट विनीत के बारे मैं मुझे बताती थी तो मैं यही सोचा करती की ये क्रश व्रश जैसा भी कुछ होता है क्या। लेकिन जब साहिल को पहली बार आर्ट्स क्लास में देखा तो जैसे कुछ हुआ रीता दी के जैसे मेरी आँखें भी जरा तेज चमक उठी और अब ये चमक रोज ही मेरी आँखों मे रहती। उस 5 फुट 6 इंच वाले गोरे लड़के में जाने क्या था कि वो मेरा ही नही क्लास की ओर लड़कियों का भी क्रश बन गया था साहिल की आंखे काली नही थी हल्की भूरी थी जोकि मुझे अच्छी लगती थी या अब लगने लगी थी। मेरे इस पहले पहले क्रश का असर बहुत ज्यादा हुआ था मुझ पर।
साहिल के क्लास में आने का इंतजार करना,  चोरी- चोरी उसे तकना ,बेवजह मुस्कुराना , उसके ख्यालों में खो जाना , धीरे- धीरे गुनगुनाना पहला नशा पहला खुमार। सब कुछ पहली बार ही तो था एक अलग एहसास जिसमे खुशी की नयी महक थी।
अच्छा लग रहा था मुझे इन पलो में जीना। मैं जब भी कोई पैंटिंग बनाती और ब्रश में अलग - अलग रंगों को लेकर कैनवास पर चलाती तो ऐसा लगता जैसे हर रंग मुझमे ही घुल रहा हो और क्लास में जब कभी साहिल मेरे करीब से गुजर जाता तो मानो जैसे ठंडी हवा का कोई झोंका मुझे छूकर निकल गया हो जिसकी ठंडक ने मेरे मन को भी शीतल कर दिया हो । साहिल के चक्कर में मैं तो बावरी ही हो गई थी। उम्र भी तो कम थी सिर्फ 21 की ही तो थी तब समझ तो ज्यादा होती नही है पर तमन्नाएं जरूर होने लगती है। कुछ अंजानी सी ख्वाइशें जो दिल मे जगह बनाने लगती है। उस वक्त साहिल को देखकर मुझे जितनी खुशी होती थी उतनी तो अपना बर्थडे सेलिब्रेट करने पर भी नही होती थी। और जब कभी साहिल मेरी ओर देख लेता तो वो दिन मेरे लिए लक्की डे बन जाता।
वैसे साहिल थोड़ा अकड़ू सा था किसी से बात नही करता था
पर पैंटिंग जरूर वो अच्छी करता था और पेंटिंग करते वक्त उसके चेहरे के एक्सप्रेशन इतने बदलते कि कोशिश करते हुए भी मैं कभी समझ ही नही पाई की उसके माइंड में क्या चल रहा है कभी तीन - चार रंगों को मिलाकर कैनवास पर तेज़- तेज ब्रश चलाने लगता तो कभी अपने हाथों को रोक लेता फिर कुछ सोचने लगता तो कभी अपनी नज़रों को घुमाकर आसपास  देखने लागत मेरा आधा समय तो उसे देखने मे ही निकल जाता। खटपट की आवाज आई तो मैं अपने बीते कल से बाहर आ गई घड़ी में 5 बज रहे थे मैं आंख बंदकर सो गई। अगले दिन दिनभर सभी लोग किसी न किसी काम मे व्यस्त रहे लेकिन विन्नी वो तो फिर शुरू हो गई बानी तुझे क्या लगता है साहिल अभी भी वैसा ही लगता होगा और क्या पहले जैसा अकड़ू होगा या बदल गया होगा मैंने कुछ नही कहा बस चुप रही।शाम होते ही सब शादी वाले गेटअप में आ गए दुल्हन भी रेडी थी और मैं भी तैयार , पर मुझे बारात का नही साहिल का इंतज़ार था दूल्हा दुल्हन स्टेज पर थे मैं विन्नी के पास ही खड़ी थी जब मैंने उसे आते देखा तो धीरे से विन्नी से कहा देख साहिल आ गया। वो अभी भी वैसा ही लगता है पर उतना अकड़ू नही है थोड़ा बदल गया है। विन्नी ने अपनी भोहों को उचकाते हुए पूछा तुझे कैसे पता। मैं जोर से मुस्कुरा दी। एक साल पहले एक पेंटिंग एग्सीविशन के दौरान हमारी मुलाकात हो गई थी साहिल और मैंने साथ बैठकर बहुत देर तक बातें की और तभी बातों ही बातों में जब आर्ट्स क्लासेस की लड़कियों की बात निकली तो हँसते हुए मैंने कह दिया उन्ही को नही मुझे भी क्रश हो गया था बस तब से ही हमारी मुलाकातें होती रहती है। और सीक्रेट ये है कि मुझे फिर से उससे क्रश हो गया है। और शायद उसे भी।






अंग्रेजी




टेबल पर पड़े हुए इस लेटर पर बार- बार मेरी नजर जा रही है मन हाँ और ना दोनों में ही जवाब दे रहा है। दरसल ये लेटर मेरे कॉलेज से आया है कॉलेज में एक फंक्शन है जिसमे कुछ पुराने स्टूडेंट्स को भी बुलाया गया है मेरा बहुत ज्यादा मन तो नही है क्योंकि मैं नही जाना चाहता। फिर कुछ देर बाद जाने क्या दिमाग में आया कि मेरा मन अचानक ही मान गया।
सुबह सूटबूट डटाकर अपने आप को आईने में कई बार देख लेने और खुद से ये पूछ लेने के बाद कि लग रहा हूँ न स्टाइलिश बन्दा, मैं कॉलेज के लिए निकल गया न जाने कितनी पुरानी यादें ताजा हो जाएंगी कुछ मीठी और कुछ कड़वी यादें। कॉलेज में इंटर होते ही मैं पहले प्रिंसिपल से नही मिला क्योंकि मेरे कदम तो क्लासरूम की ओर मुड़ गए थे वही क्लासरूम जिसमे दौड़कर सबसे पहले मैं ही जाता था। 
अंदर पैर रखते ही लगा जैसे फिर से संजू ही क्लास में एंटर हो रहा हो अपने उसी अंदाज में बोलते हुए मैं आई कम इन मेम। 
मुझे आज भी वैसे ही लग रहा है जैसे कि मैं फिर से पहली बार आ रहा हूँ पर कुछ बदला सा नही लग रहा वही ढेर सारी लाइन से रखी बैंच- डेस्क आज भी पेन से इन पर कुछ लिखा हुआ है ब्लैकबोर्ड वो भी पहले जैसा ही है। और दीवारों पर स्टूडेंट्स के तैयार किये पोस्टर्स लगे हुए है। आगे बढ़ते हुए मैं लास्ट रो की उस पीछे वाली बैंच के पास आ खड़ा हुआ हूँ इस पर थोड़ी धूल दिख रही है लगता है कि शायद इस लास्ट बैंच पर अब कोई नही बैठता। मैंने अपनी उंगलियों को उस धूल पर चलाते हुए संजू लिख दिया। मैं इतने गौर से इस क्लासरूम को देख रहा था किेे मुझे चारों ओर बीते वक्त की तस्वीरें नजर आने लगी वो सारे मेरे क्लासमेट्स , मेरे दोस्त , मेरे टीचर्स सब कुछ।
बाहर से आता स्टुडेंट्स का शोर जैसे ही कानो में पड़ा तो याद आया की मुझे तो ओडिटोरिम की ओर जाना है मैं वहां पहुँचा  बिल्कुल एक प्रोफेशनल पर्सन की तरह प्रिंसिपल से मिला और गेस्ट सीट पर जा बैठा जहाँ पहले से मेरे कुछ पुराने परिचित बैठे हुए थे। सूरज , लतिका , आदेश , ऋषि ,रुपाली , जयस , सीमा। जयस और सीमा कॉमर्स वाले थे सूरज ,लतिका , और रुपाली ये मेरे क्लासमेट थे ऋषि और आदेश ये दोनों मेरे सीनियर। लतिका ने मुस्कुराकर मेरी ओर देखा तो मैंने भी उसकी मुस्कुराहट का जवाब अपनी स्माइल से दे दिया।
मुझे कॉलेज का वो पहला दिन याद आ रहा है जब मैं क्लासरुम के बाहर खड़ा अपने टीचर से पूछ रहा था मैं आई कम इन तब पता नही क्यों कुछ स्टुडेंट्स मुझ पर हँस पड़े।
पर मैं तो अपने कॉलेज के पहले दिन को लेकर इतना खुश था कि मैंने किसी बात पर कोई ध्यान नही दिया सीधा लास्ट वाली बैंच पर जा बैठा क्योंकि पूरी क्लास फुल थी और लास्ट सीट ही खाली थी। टीचर ने पढ़ाना शुरू किया वो हर टॉपिक को बारीकी से बता रही थी कभी बुक में दिखाकर कुछ समझाती तो कभी बोर्ड पर लिखकर या ड्रॉ करके हमे बतातीं सारे  स्टूडेंट्स अपने सिर को हिलाकर ये जता रहे थे कि वो सब समझ रहे है पर मुझे तो कुछ समझ नही आ रहा था लेकिन सबको देखकर मैं भी सिर हिलाने लगा। बड़ा ही भयंकर दिन था ये मेरे लिए हर बेल के बाद दूसरे टीचर आते पढ़ाते और चले जाते। वो क्या कहते मुझे कुछ समझ ही नही आता क्योंकि वो अंग्रेजी में कह रहे थे। मैं तो बचपन से ही अपने गाँव के हिंदी मीडियम स्कूल में पढ़ा हूँ मुझे टूटी- फूटी अंग्रेजी पढ़ना आती है पर समझ पाना मेरे बस के बाहर था। एक दिन पहले मैं जितना खुश था आज उतना ही परेशान क्योंकि सब कुछ अंग्रेजी में ही पढ़ना था और अंग्रेजी में ही लिखना था
मेरे लिए तो बड़ी चुनौती ही थी। अब मेरा हाल ये था कि मैं क्लास में सबसे पहले आता और सबसे पीछे जाकर बैठ जाता क्योंकि मुझे डर लगता था डर इस बात का के कहीं टीचर ने मुझे खड़ाकर कुछ पूछ लिया तो मैं क्या करूँगा। करीब एक सप्ताह बीत गया अब तो मेरा एक दोस्त भी बन गया मोहन जोकि मेरे ही जैसा था। लेकिन मैं कोशिश कर रहा था क्लास में कोई ऐसा दोस्त बनाने की जो मेरी अंग्रेजी में मदद भी कर सके पर मेरी भाषा मेरा पहनावा उनसे अलग था और इसलिए मैं उनके लिए एक फुलिश बॉय था कोई मुझसे बात करने में इंट्रेस्टेड नही था और अगर कभी कोई मुझसे बात करता तो भी सूरज और रुपाली जोकि क्लास के एक्स्ट्रा स्मार्ट स्टूडेंट्स थे ये उनको बड़ा ही खटकता इसलिए वो कभी मेरा मजाक उड़ाते तो कभी कुछ तंज सा कसकर चले जाते जिसकी वजह जो मेरे साथ होता वो भी मुझसे दूर हो जाता।
न तो मैं स्टाइलिश था और ना ही मैं अंग्रेजी में गिटपिट कर पाता था सूरज और रुपाली को लगता था कि उन जैसे स्मार्ट स्टूडेंट्स के बीच मैं कहाँ से आ गया और इसलिए वो मुझसे चिड़ते थे।
कॉलेज में एक इवेंट रखा गया था जिसमे अलग- अलग कॉम्पटीशन में स्टूडेंट्स ने पार्टिसिपेट किया मैं सरप्राईज़ तब हुआ जब नोटिस बोर्ड पर बाकी स्टूडेंट्स के साथ मैंने अपना नाम भी देखा।
मिस्टर संजय सोनी प्लीज़ कम ऑन स्टेज पुकारा गया मैं एक गेस्ट के तौर पर आया हूँ तो मुझे कुछ शब्द तो कहने पड़ेंगे बस आज मैं फर्स्ट हूँ क्योंकि सभी गेस्ट में मुझे ही सबसे पहले बुलाया गया अपने बारे में कुछ कहने के लिए अपनी सक्सेस के बारे में बताने के लिए मैं 20 मिनिट तक लगातार बिना अटके बोलता रहा कुछ स्टूडेंट्स ने कुछ सवाल भी करें मैंने सरल शब्दों में उनका अंसर दिया और लास्ट में हिंदी मैं बस इतना कहा धन्यवाद। पूरा ऑडिटोरियम तालियों से गूंज उठा।
ये वही जगह है जहाँ कभी सब मुझ पर हँस रहे थे उस दिन इवेंट में मुझे अपने कॉलेज , अपनी स्टूडेंट लाइफ पर ही तो बोलना था वो भी सब इंग्लिश में। मेरा नाम कॉम्पिटिशन में सूरज ने लिखाया था मैं अपने टीचर के पास अपना नाम हटाने को कहने जा रहा था क्योंकि मैं अच्छी तरह जानता था कि अंग्रेजी में मेरा डब्बा गुल है तब आदेश और ऋषि जोकि मेरे सीनियर थे उन दोनों ने मुझे रोक लिया ये कहकर की वो मेरी हेल्प करेंगे।
और उन्होंने मेरी हेल्प की भी। चार दिनों तक उन दोनों ने मेरी प्रैक्टिस कराई और कंटेंट भी उन्हीं ने तैयार किया। और जब मैं स्टेज पर आने से डर रहा था तब मेरा हौसला बढ़ाते हुए उन्होंने मुझे स्टेज पर पहुँचाया। और फिर मैंने अटक - अटक कर पढ़ना शुरू किया मैं घबराहट के साथ कभी अपनी साँसों को तेजी से खिंचता तो कभी एक साथ सांसो को छोड़ देता मानो अपने डर को बाहर निकाल रहा हूँ और जैसे ही पन्ने की लास्ट लाइन पढ़कर थैंक्यू कहा सब जोर- जोर से हँसने लगे मैं आँखे झुकाकर वहां से बाहर आ गया तब लतिका ने मुझे बताया कि सब सिर्फ मेरी अटकती इंग्लिश पर ही नही बल्कि जो मैंने पढ़ा उस पर भी हँस रहे थे क्योंकि उसमें शब्दो की हेरा- फेरी थी। बाद में पता चला कि आदेश और ऋषि सूरज के फ्रेंड है। अब कुछ और जानने की जरूरत थी ही नही। अगले दिन लायब्रेरी के बाहर ऋषि और आदेश जब मुझसे टकराये तो मेरे पास आकर बोले सॉरी यार हम तो बस छोटा सा मजाक कर रहे थे तुम्हे हर्ट करने का कोई इरादा नही था हमारा ,सॉरी। तब मैंने उनसे कुछ नही कहा , कहा तो बस खुदसे
कुछ गलत नही है मुझे अंग्रेजी नही आती बस इतना ही गलत है।
आज मेरी नजर झुकी हुई नही है और न ही कोई मेरी अंग्रेजी पर हँसने वाला है आय एम इंग्लिश ट्रेनर। कितने लोग आज मेरे इंस्टीट्यूशन में सिर्फ इंग्लिश सीखने आते है संजू से अंग्रजी सीखने।
अंग्रेजी मेरे जैसे कई लोगो के लिए एक समस्या है जो कि मुश्किलें खड़ी करती है सिर्फ भाषा के न आने से हम लोगो के लिए अलग हो जाते है जो अंग्रेजी बोलता है वो इंटेलिजेंट है और इससे उसे सम्मान मिलता है ये कुछ बहुत समझदार लोगो का नज़रिया है और 'शायद संजय को भी यही लगता है पर संजू को नही'।





एक चुटकी प्रेम

मार्च बित गया था ठंड के नख़रे अब कम हो गए थे कम क्या यूँ कहें कि अब खत्म ही हो गये थे सूरज के तीखे तेवर जो शुरू हो गये थे। अब गर्मागर्म पकोड़े...

Sonal bhatt MULAKAT-KAHANIYO-SE STORY OF OUR LIFE