मैंने कोशिश की पर फिर भी में लेट हो ही गई। रोज कोई न कोई काम ऐसा आ ही जाता है जिसकी वजह से मुझे ऑफिस से निकलने में देरी हो ही जाती है।
और शाम के वक्त ट्राफिक भी कोई कम नही रहता इसलिए फिर घर पहुँचने में समय ज्यादा लग जाता है और फिर घर पहुँच कर मुझे अरनव के बिन पूछे सवालो का उत्तर देना होता है।
अभी भी यही होगा वो सोफे पर अपनी गोद में लेपटॉप लिए बैठे होंगे और बार- बार घड़ी की सुई की ओर देखे जा रहे होंगे। घर पहुँचकर मैंने दरवाजा खोला
अरनव अपना लेपटॉप लिए ही बैठे थे शायद कोई बहुत जरूरी काम कर रहे है इसलिए तो उन्हें पता ही नही चला के मैं आ गई। मैं धीमे पैर से अपने कमरे की ओर जाने लगी तभी अरनव ने कहा तुम्हारे तेज कदमो की आवाज से मेरे काम में कोई खलल नही पड़ेगा इसलिए इतने धीमे चलकर जाने की जरूरत नही है निष्ठा। मैंने मुड़कर अरनव की ओर देखा और धीरे से मुस्करा दी। अरनव ने झूठी नाराज़गी दिखाते हुए मेरी तरफ देखा और फिर नजरे , अपने लेपटॉप की ओर कर ली। डिनर के वक्त आज भी अरनव ने मुझसे लेट हो जाने की वजह नही पूछी पर मैं फिर भी बताने लगी। ये काम आ गया था फिर वो काम आ गया था ट्रेफिक इतना ज्यादा था की मैं क्या बताऊ
फिर भोला सा चहरा कर मैंने कहा ऐसे तो फिर देरी हो ही जाती है न घर आने में।
जी मैडम आप सही कह रही है अरनव ने हँसते हुए कहा। अरनव कभी भी नाराज नही होते है हाँ बस कभी कभार थोड़ा गुस्सा हो जाते है मेरे देर से आने पर वो भी कुछ देर के लिए।
अरनव को ऑफिस बहुत कम ही जाना पड़ता है वो घर ही लैपटॉप पर अपना सारा काम कर लेते है।
लेकिन मेरा काम ऐसा नही है मुझे तो रोज़ ऑफिस जाना ही रहता है अरनव को मेरे जॉब करने से कोई प्रॉब्लम नही है बस जब कभी मैं ज्यादा लेट हो जाती हूँ तो वो थोड़ा गुस्सा हो जाते है उन्हें मेरी फिक्र कुछ ज्यादा ही रहती है। इसलिए अगर थोड़ी देर हो जाये आने में तो पहले तो उन्हें मेरी फिक्र होने लगती है और बाद में थोड़ा सा गुस्सा भी आने लगता है जोकि ज्यादातर सबके साथ होता ही है।
पर एक बार मुझे गुस्सा आ गया था हुआ ये था की ऑफिस से तो में जल्दी निकल गई थी पर रास्ते में मुझे मेरी फ़्रेंड मिल गई और जब दो दोस्त मिलते है तो बातें तो बहुत सारी होती ही है बस मैं अरनव को बताना भूल गई के मुझे आने में जरा देर हो जायेगी और मेरे मोबाइल की बैटरी भी लो हो गई थी इसलिए जब अरनव ने मुझे कॉल किया तो वो लगा ही नही।
मेरे घर पहुँचने पर अरनव मुझ पर थोड़े नाराज हुए तो मुझे भी गुस्सा आ गया और गुस्से में मैंने भी एक दो बातें कह दी।
अभी घर में बिल्कुल वैसी ही शांति थी जैसी किसी युद्ध के बाद होती है डिनर टेबल पर भी खामोशी छाई हुई थी न अरनव कुछ बोल रहे थे और न ही मैं।
मुझे मन ही मन बुरा लग रहा था खाना खाने का मन भी नही कर रहा था मैंने अरनव की तरफ देखा और अपनी इस लड़ाई को खत्म करते हुए मैंने उन्हें सॉरी कह दिया इट्स ओके कहते हुए अरनव ने मेरी प्लेट की ओर इशारा करते हुए मुझे खाना खाने के लिए कहा। वो नाराज भले ही है पर उन्हें अभी भी मेरी फिक्र है। अरनव बहुत ही अच्छे हसबैंड है।
इस सन्डे अरनव को अपने ऑफिस के ही काम से शहर से बाहर जाना पड़ा खैर अरनव शाम तक वापस आ जायेंगे पर मुझे ये एक दिन इतना बड़ा लग रहा है जैसे ये एक दिन चार दिन के बराबर हो गया हो। घर पर अकेले रहना कितना मुश्किल होता है। आज मुझे पता चल रहा है की अरनव को भी कितना अकेलापन महसूस होता होगा। आज अरनव की नही बल्कि मेरी नजरे घड़ी की सुई पर है की कब शाम के 6-7 बजे और अरनव घर आयें। मैंने तो डिनर की तैयारी भी अभी से कर ली। आज सब कुछ मैंने अरनव की पसंद का ही बनाया है शाम हो ही गई है बस अरनव का इंतजार कर रही हूँ। उनका इंतजार करते
मेरी नजरे कभी घड़ी की ओर जा रही थी तो कभी दरवाजे की ओर ऐसा करते मुझे 7 से 9 बज गये पर अरनव अभी तक नही आये। मैंने अरनव को एक दो बार कॉल भी किया पर नेटवर्क प्रॉब्लम की वजह से उन्हें कॉल नही लग पाया।
घड़ी में 11.30 बज रहे थे मुझे अब थोड़ी बेचैनी भी हो रही थी और साथ में फिक्र भी। कुछ पता नही है की इस वक्त वो कहाँ होंगे मेरे दिमाग में न जाने कितने ख्याल आने लगे अब तो मुझे गुस्सा भी आ रहा था वो गुस्सा जिसमे किसी के लिए फिक्र होती है। पर इंतजार करने के अलावा मेरे पास कोई ऑप्शन नही है। करीब दस मिनिट बाद डोरबेल बजी अरनव घर आ गये और काफी खुश नजर आ रहे थे पर मैं गुस्से में थी क्या हुआ तुम ठीक हो अरनव के इतना कहते ही मैंने उनपर गुस्सा करना शुरू कर दिया मैं कब से तुम्हारा इंतजार कर रही हूँ कितनी फिक्र हो रही थी मुझे। इसके बाद मैंने बहुत कुछ कहा अरनव सब सुनते रहे और बाद में हँसने लगे मुझे निकलने में देर हो गयी थी और फिर ट्रेफिक ऐसे में तो लेट हो ही जाते है ना निष्ठु।अरनव की बात सुनकर मुझे हँसी आ गई क्योंकि ऐसे तो मैं अरनव से कहती हूँ आज वो मुझे कह रहे है।फिर अरनव ने बहुत प्यार से मुझसे कहा जब हमारा अपना कोई समय पर घर नही आता तो हमे चिंता होने ही लगती है तुम्हे मेरी वैसे ही फिक्र हो रही थी जैसे मुझे तुम्हारी होती है। और पता है ये फिक्र क्यों होती है क्योंकि हम एक दूसरे से बहुत प्यार करते है हम जिससे जितना ज्यादा प्यार करते है हमे उसकी परवाह भी उतनी ज्यादा होती है।
अरनव को मेरी फिक्र रहती है ये तो मुझे पता था पर फिक्र का असल एहसास मुझे आज हुआ।

