अजनबी



आस- पास लोगों की भीड़ और शोर इस वक्त रुहीका
यही तो देख रही थी। 31st की रात सब जश्न मना रहे थे आँखो में कई उम्मीदे लिये लोग खुशी के साथ नये साल का स्वागत कर रहे थे हर एक के चेहरे पर मुस्कान थी लेकिन उदास चेहरा और निराश आँखे लिए रुहीका ही थी जो खामोश बैठी थी। नये साल को लेकर उसके चेहरे पर कोई उत्साह नजर नही आ रहा था। मानो जैसे उसे कोई खुशी ही ना हो।
शायद रुहीका को इस नये साल से कोई उम्मीद ही नही है की उसकी लाइफ में कुछ अच्छा होगा या ये कहे की उसकी सारी उम्मीदे खत्म हो चुकी है।
जहाँ सब नये साल के जश्न में डूबे हुए है वहीं रुहीका है की अपने आपको इस दुनिया का सबसे दुखी व्यक्ति मान शोक के समुद्र में गोते लगा रही है। न हँस रही है
न बोल रही है बस गम के अंधेरो में डोल रही है।
रुहीका के फ़्रेंड्स कितनी देर से ये कोशिश कर रहे है की रुहीका भी खुश होकर उनके साथ पार्टी इंजॉय करे। पर रुहीका है की उस पर कोई असर हो ही नही रहा। रात बढ़ रही थी और रात के साथ ही ठंड भी, हवा के ठंडे झोंके जिसका एहसास अच्छी तरह करा रहे थे। ये ठंडी हवा के झोंके रुहीका को भी छूते हुए गुजर रहे थे जिसका असर उस पर थोड़ा दिख भी रहा था अब उसका मन पार्टी से जाने को कर रहा था इसलिए नाचते गाते लोगों के बीच रुहीका अपनी दोस्त को ढूंढने लगती है वही दोस्त जिसके साथ वो इस पार्टी में आई थी और इसी बीच वो टकरा जाती है एक अजनबी से। रुहीका झट से उसे सॉरी कहकर अपनी दोस्त के पास पहुँच जाती है वो अपनी दोस्त से कुछ बात करती है और फिर वापस अपनी जगह पर आकर बैठ जाती है उदास सा चेहरा बनाये रुहीका सामने नाचते हुए लोगों की ओर देखने लगती है और तभी उसके सामने आ खड़ा होता है वही अजनबी जिससे रुहीका अभी टकराई थी। वो रुहीका के बगल में रखी खाली चेयर देख उससे पूछता है ,
क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ ? रुहीका के कुछ न कहने पर वो कहता है आपने हाँ नही कहा , तो न भी नही कहा इसलिए मैं यहाँ बैठ जाता हूँ और ऐसा कहते हुए वो बैठ जाता है। वो रुहीका को मुस्कुराते हुए हैप्पी न्यू ईयर कहता है पर रुहीका उसे बदले में कोई जवाब नही देती। खैर उस अजनबी को इस बात से कोई
फर्क नही पड़ता।
वो तो इस न्यू ईयर पार्टी को पूरे दिल से इंजॉय कर रहा था। वो कभी सबके साथ जाकर डांस कर रहा था तो कभी गले लग - लगकर सबको नये साल की
शुभकामनायें दे रहा था और जब वो रुहीका के पास बैठा हुआ था तब वो पार्टी में चल रहे गाने को गुनगुनाये जा रहा था। और रुहीका उसे देख कर मुँह बनाये जा रही थी। अजनबी समझ गया था के रुहीका को उसका गाना गुनगुनाना अच्छा नही लग रहा वो ये भी समझ गया था की इतने खुश माहौल में भी रुहीका खुश नही  है।
वो कुछ देर चुपचाप बैठ कुछ सोचता है और फिर अचानक से रुहीका से कहता है आप नये साल की
खुशी चुप रहकर मनाती है रुहीका उसकी तरफ देखती है और कुछ न कहते हुए नजरे फेर लेती है।
वो अजनबी फिर सवाल करता है आप उदास है या
फिर ये कोई नया तरीका है किसी बात की खुशी मनाने का। रुहीका अब गुस्से में उसे घूरने लगती है वो अजनबी फिर बोलता है लगता है आपको मेरी बाते अच्छी लग रही है वाकई मैं बाते इतनी अच्छि करता हूँ की सबको मेरी बाते बड़ी पसन्द आती है जैसे अभी आपको आ रही है। बिल्कुल वैसे ही।
न चाहते हुए भी रुहीका बोल पड़ती है वो कहती है पर मुझे आपकी बाते बिल्कुल अच्छि नही लग रही इसलिए प्लीज़ चुप रहिये।
वो अजनबी मुस्कुराता है और कहता है की चलिये ये तो पता चल गया के आप बोल सकती है वरना मुझे लगा था के आप बोल नही सकती।
रुहीका उसकी बात सुन और गुस्से में आ जाती है।
वो कुछ कहने वाली होती है के तभी वो अजनबी फिर
बोल पड़ता है
वो कहता है मैं आपसे अब कोई सवाल नही करूँगा बल्कि आपको कुछ बताना चाहूँगा। दो साल पहले
की बात है एक लड़का था जो की अपनी लाइफ में चल रही प्रॉब्लम्स को लेकर बड़ा उदास था वो ये मान बैठा
था की अब उसकी लाइफ में कुछ अच्छा हो ही नही सकता। एक बार वो किसी पार्टी में गया वहाँ जाकर भी उसका वही हाल था खुदको सबसे अलग कर वो
अकेले जा बैठा उदास सा बेचारा सा चेहरा बनाये
मानो जैसे सारी दुनिया के दुख बस उसी के हिस्से आये हो। तब उसके पास आकर कोई बैठता है और उससे
कहता है क्या आप अपने बीते कल को वापस ला सकते हो या आने वाले कल को आने से रोक सकते हो
नही न। इस पर हमारा कोई जोर नही है। पर अपने आज को हम अपने मर्जी से जी सकते है ये फैसला
हमे करना होता है की अपने आज को हम उदास होकर जीना चाहते है या मुस्कुराकर।
वैसे मुस्कुराकर जीने में कोई बुराई नही है। इसलिए
मुस्कुराकर जियो ।
                   
मुझे भी तुसे यही कहना है रुहीका।
और बस इतना कहने के बाद वो अजनबी उठकर चला जाता है।






कोशिश





कई देर से हाथ में किताब पकड़े मैं उसे पढ़ने की एक नाकाम कोशिश किये जा रहा हूँ मैं अभी तक ये पहला पन्ना भी पूरा न पढ़ सका। कितना मन लगाने की कोशिश
कर रहा हूँ पर फिर भी पढ़ने में मेरा मन ही नही लग रहा। अपनी इस कोशिश में नाकाम हो आखिरकार मैंने किताब को बंद कर रख ही दिया।
वैसे जिंदगी भी किताब के जैसी ही तो है जिस तरह किताब के पन्ने होते है वैसे ही जिंदगी के भी कुछ पन्ने होते है फर्क बस इतना है की किताब के पन्नो को हम अपनी मर्जी से उलट- पलट कर पढ़ सकते है पर जिंदगी के पन्नो पर हमारा कोई जोर नही ये पन्ने खुद ही पलटते है और हर एक पन्ने पर होती है ज़िन्दगी से जुड़ी एक कहानी।
मैं आज गेस्ट के तौर पर अपने ही कॉलेज आया हूँ।
ग्रेजवेशन मैंने यही से किया था। हॉल में आते ही मेरा तालियों के साथ स्वागत किया गया। फूलो का एक गुलदस्ता मेरे हाथ में देकर मेरा सम्मान किया गया और फिर जहाँ पहले से दो और गेस्ट बैठे हुए थे उनके पास मुझे भी बैठा दिया गया। प्रिंसिपल सर आये हुए सभी गेस्ट के बारे में अपने स्टूडेंट्स को बता रहे थे की उन्होंने अपनी लाइफ में कैसे मेहनत से बहुत कुछ हासिल किया। वो मेरी भी तारीफ पे तारीफ किये जा रहे थे। वो स्टूडेंट्स को कह रहे थे की उन्हें मुझसे बहुत कुछ सीखना चाहिए।
सर ने बातो ही बातो में ये भी कहा की मेरे पेरेंट्स कितने खुश होंगे मुझे इस मुकाम पर देखकर। इसके बाद सर ने और भी कई बाते की जोकि मैंने नही सुनी क्योंकि मेरा ध्यान उस वक्त कहीं और था , मुझे माँ पापा की याद आ गयी थी। मैं बार - बार उन्ही के बारे मैं सोच रहा था।
मैं बचपन से ही थोड़ा जिद्दी था। एक ही बेटा था इसलिए प्यार भी बहुत मिला और मेरी हर जिद पूरी भी हुई। सपने तो मैं बचपन से ही देखता था पर मेरे सपनो को पंख तब लगे जब मेरा ग्रेजवेशन कम्प्लीट
होने वाला था। मैं हमेशा से एक सफल बिज़नेस मेन
बनना चाहता था। जोकि मैं आज हूँ।
मैंने बहुत मेहनत की और हर वो कोशिश की जिससे मैं सक्सेस हासिल कर सकूँ। कई मुश्किले मेरे सामने आई पर मैं डगमगाया नही कोशिश करता रहा और चलता रहा। कई दिनों की मेहनत के बाद मेरी कोशिश रंग लाई और मैने अपनी खुद की एक कम्पनि खड़ी की। और वो हासिल किया जो मैं चाहता था।
लेकिन कुछ ऐसा भी है जो छूट गया।
मेरे अपने। ग्रेजवेशन पूरा करने के बाद ही मैं अपना बिज़नेज स्टार्ट करना चाहता था वो भी अलग शहर में जाकर। मेरे इस फैसले से पापा सहमत नही थे। वो नही चाहते थे की मैं उन्हें और माँ को छोड़कर किसी अलग शहर में रहने जाऊँ।
और साथ ही उन्हें ये भरोसा भी नही था की मैं इस नादानी भरी उम्र में ठीक से कुछ सम्हाल भी पाऊंगा के नही। इसलिए उनका फैसला था की मैं उनके पास ही रहकर अपना बिज़नेस स्टार्ट करूँ। पर ये मेरे लिए पॉसिबल नही था क्योंकि मेरा लक्ष्य बड़ा था जो यहाँ हमारे इस छोटे से शहर में रहकर पूरा कर पाना मुझे मुश्किल लग रहा था।
पापा और मेरी इस बात पर काफी बहस भी हुई।
उन्होंने मुझे पैसे देने से भी इंकार कर दिया था। और
हमारे बीच बहस इतनी बढ़ गई थी के मैंने गुस्से में आकर उसी दिन घर छोड़ दिया। बिना किसी की परवाह किये मैं निकल पड़ा अपना सपना पूरा करने।
      इतने दिनों में मैंने कभी भी उनसे बात करने की कोई कोशिश नही की। हाँ उनकी याद जरूर आई
पर कभी हिम्मत नही जुटा पाया। आज जब कॉलेज
में सर ने पेरेंट्स का जिक्र किया तब से ही मुझे घर की और माँ पापा की बहुत याद आ रही है। हॉटेल वापस आकर मैंने इस किताब में मन लगाने की भी कोशिश की पर मन नही लगा सका।
काफी देर तक बैठा हुआ मैं कुछ सोचता रहा अभी कुछ और भी बचा है जिसे पाने की कोशिश करनी है मुझे। मैं उठा हॉटेल से बाहर निकल टैक्सी पकड़ी।
और सीधे अपने घर पहुँचा। घर के बाहर पापा की वही पुरानी कार खड़ी थी जिसे लेकर पापा ऑफिस जाते थे पर अभी इस पर लगी धूल देख ऐसा लग रहा है जैसे कई दिनों से ये कार बस यहीं खड़ी हुई है। मैं बाहर का बड़ा वाला गेट खोलकर आगे बढ़ा घर के गार्डन के पौधे सूखे से नजर आ रहे थे सब सुनसान सा लग रहा
था अब मेरे मन में घबराहट सी होने लगी तरह-तरह के विचार मेरे दिमाग में चलने लगे घर का दरवाजा खुला हुआ था। मैं घर के अंदर गया अंदर कोई भी नही था मैं परेशान होने लगा कहीं ऐसा तो नही के वो
यहाँ से कहीं और चले गये, मुझे तो कुछ भी नही पता उनके बारे में। आज मैं खुद से सवाल कर रहा था
क्यों मैंने कोशिश नही की माँ पापा से मिलने की उनसे बात करने की, उन्हें मनाने की , काश मैंने कोशिश की होती। मैं मन ही मन ये सब कुछ सोचकर बहुत
दुखी हो रहा था लेकिन तभी मुझे सामने माँ और पापा नजर आये जोकि मुझे हैरान निगाहों से देख रहे थे पापा थोड़े बीमार भी लग रहे थे मैंने कुछ नही कहा ना कुछ पूछा बस जाकर उनसे लिपट गया और रोने लगा। मुझे लगा था की शायद वो मुझसे बहुत नाराज होंगे और हो सकता है की वो मुझसे बात भी न करे पर उन्होंने मुझे उतने ही प्यार से गले लगाया जितने प्यार से वो मुझे बचपन में गले लगाया करते थे।
अब बस मेरी कोशिश यही है कि मैं हमेशा अपनो के साथ रहूँ।




















एक चुटकी प्रेम

मार्च बित गया था ठंड के नख़रे अब कम हो गए थे कम क्या यूँ कहें कि अब खत्म ही हो गये थे सूरज के तीखे तेवर जो शुरू हो गये थे। अब गर्मागर्म पकोड़े...

Sonal bhatt MULAKAT-KAHANIYO-SE STORY OF OUR LIFE