अप्रैल फूल भाग -2


जब किसी झूठ से पर्दा उठता है तो अक्सर ऐसी खमोशी देखने को मिलती है जैसी अभी वैदिक और रिमझिम के बीच है वैदिक जो कहना चाहता था उसने कह दिया और रिमझिम उसने सब कुछ चुपचाप सुन लिया कुछ भी नही बोली वैसे ही जैसे उस शाम कुछ नही कहा था उसने , जब वैदिक ने पूछा था उससे मेरी दोस्त बनोगी तब रिमझिम ने कुछ नही कहा था। दिनभर की तपती धूप के बाद एक ठंडी शाम थी, वो शाम जिसमे रिमझिम के लिए कुछ सुकून के पल होते है दिनभर के काम और थकान के बाद रिमझिम कुछ पल खुदको रिलैक्स करने के लिए रोज़ शाम को छत पर टहलने जरूर जाती है और कुछ देर वही बैठी रहती है अच्छा लगता है उसे बादलों में शाम के रंग को चढ़ते देखना पक्षियों के झुंड को वापस अपने घर लौटते देखना और जब शाम गहरी होकर रात में बदलने लगे तब आसमान में धीरे- धीरे चमकते हुए निकलते तारों को देखना। रिमझिम तारों को बड़े ही गौर से देखती है वो ये मानती है कि इन सब के बीच एक तारा वो भी है जो सबके साथ चमक रही है। क्योंकि वैदिक आया हुआ है इसलिए रिमझिम ने अपने शाम को छत पर जाने का समय जरा लेट कर दिया रिमझिम नही चाहती कि उसके सुकून के पलों में उसके अलावा कोई और भी हो। हर रोज की तरह रिमझिम अपने तय समय पर अभी छत पर आई हुई थी कुछ ही देर हुई होगी की वैदिक भी आ गया शायद उसने रिमझिम को देखा नही था, लगता है मेरी इस बार की छुट्टियाँ ऐसे ही जाने वाली है अपने दोस्त के बिना, मैं कितना बोर हो रहा हूँ बिल्कुल अच्छा नही लग रहा मुझे, सच मे किसी दोस्त का होना कितना जरूरी होता है कहते हुए वैदिक छत से नीचे रास्ते पर साइकिल चलाते हुए बच्चों को देख रहा था। और जब पीछे मुड़ा तो उसे रिमझिम नज़र आई अरे रिमझिम तुम यहीं थी मुझे पता ही नही चला। हाँ वो मैं शाम को थोड़ा टहलने के लिए आ जाया करती हूँ। आना भी चाहिए वैसे भी शाम के वक्त खुले आसमान के नीचे कितना सुकून मिलता है , है ना वैदिक ने कहा। हाँ , अच्छा लगता है रिमझिम बोली। वैदिक कुछ उदास सा चेहरा बनाकर बैठ गया, क्या? हुआ तुम अपने दोस्त को बहुत मिस कर रहे हो क्या, हाँ वो होता तो मैं इस तरह अकेले बैठा नही होता। तुम बोर नही होती हो क्या ऐसे अकेले - अकेले रहकर वैदिक ने पूछा। नही मुझे बुरा नही लगता रिमझिम ने कहा तो वैदिक हँसते हुए बोला हाँ तुम तो हो ही अलग इसके बाद रिमझिम कुछ देर ही रुकी और फिर जाने लगी तब वैदिक  ने उसे रोकते हुए कहा रिमझिम रुको कुछ पूछना है तुमसे , मेरी दोस्त बनोगी कुछ दिनों के लिये ही सही।  रिमझिम ना कुछ बोली और ना ही ऐसे भाव उसके चेहरे पर दिखे जिससे ये अंदाजा लगाया जाए की शायद रिमझिम हाँ कह दे। अगली सुबह वैदिक दरवाजे की और ध्यान लगाए बैठा था रिमझिम स्कूल जाने से पहले चाबी हमेशा देकर जाती है तो जैसे ही रिमझिम सीढ़ियों से उतरती दिखाई दी वैदिक झट से दरवाजे के पास पहुँच गया चाबी लेते हुए बोला तो फिर क्या सोचा तुमने रिमझिम ने छोटी सी मुस्कान के साथ सिर हिला दिया और वैदिक खुश हो गया। शाम को वैदिक और रिमझिम छत पर एक साथ थे रिमझिम ने वैदिक को पहले ही कुछ रूल्स बता दिए जो उसे दोस्त बनकर फॉलो करने थे हम सिर्फ दोस्त है पर बहुत पक्के वाले दोस्त नही , बात करते वक्त अपनी भाषा का ध्यान रखना है , और हाँ हम सिर्फ कुछ दिनों के लिए फ्रेंड्स बने है, और मुझे मज़ाक ज्यादा पसंद नही ठीक है, वैदिक ने सारी बात सुनने के बाद कहा बिल्कुल सारी बातों का ध्यान रखा जाएगा तो फ्रेंड्स कहते हुए वैदिक ने अपना हाथ आगे बढ़ाया रिमझिम ने बहुत सोचते हुए अपना हाथ बढ़ाया और हैंडशेक करते हुए बोली ओके फ्रेंड्स। फिर दोनों बैठकर बातें करने लगे रिमझिम तुम स्कूल में कैसी थी शरारती थी या अभी की तरह शांत सीधी रिमझिम बोली मैं और बच्चों जैसी ही थी सिंपल सी। पर मैं तो बड़ा ही शरारती था बहुत मस्ती करता था और किसी से भी डरता नही था। अच्छा पर एक बार आँटी ने मुझे बताया था जब तुम स्कूल में थे तो एक बड़ी क्लास के बच्चे ने तुमसे तुम्हारा लंचबॉक्स छुड़ा लिया था बड़ा ही बदमाश था वो , उसके डर से अगले दिन तुम स्कूल ही नही जा रहे थे रिमझिम हँसते हुए बोली,ऐसा कुछ नही हुआ था वो तो माँ को गलतफ़हमी हो गई थी छोड़ो इस बात को अपनी  कॉलेज लाइफ के बारे में बताओ कुछ अच्छा पहले मैं ही बताता हूँ कहते हुए वैदिक ने खुद पहले बोलना शुरू कर दिया और साथ ही खुद की तारीफ करना भी, वैदिक बोलता जा रहा था और रिमझिम उसकी बातों पर धीरे- धीरे अपना सिर हिलाए जा रही थी मैं बहुत ही अच्छा स्टूडेंट था मेरा सारा फोकस हमेशा मेरी पढ़ाई पर रहा टॉप 10 स्टूडेंट्स की लिस्ट में मेरा नाम भी था। जैसा मैं कॉलेज में था वैसा ही मैं अपने ऑफ़िस में हूँ मेरा सारा फोकस सिर्फ और सिर्फ अपने काम पर रहता है मैं हमेशा बेस्ट परफॉर्मेंस देना चाहता हूँ , गुड़ रिमझिम ने कहा। तुम भी तो कुछ बताओ तब रिमझिम बोली मैं , मैं बहुत होशियार स्टूडेंड नही थी बस ठीक थी और जॉब तो तुम्हें पता ही है तुम्हारी जॉब से मेरी जॉब बिल्कुल अलग है। हाँ और बोरिंग भी वैदिक मुस्कुराते हुए धीरे से बोला। हर रोज़ की तरह आज की शाम भी आगे बढ़ चली थी और रात हो गई थी वैदिक हॉल में बैठे हुए टीवी देख रहा था पर उसके दिमाग मे शायद कुछ और ही चल रहा था रिमझिम भी अपने स्टडी टेबल के पास हाथों में बुक लिए कुछ पढ़ रही थी पर बार - बार उसे वैदिक की बातें याद कर हँसी आ रही थी कैसे खुद की तारीफ करें जा रहा था वो सच भी बोल रहा था कि सब झूठ था खैर मुझे क्या करना सोचते हुए रिमझिम ने वापस अपना ध्यान किताब में लगा लिया। जब नई - नई दोस्ती होती है तो बातें भी ढेर सारी होती है वैदिक और रिमझिम रोज शाम को मिलते और खूब बातें भी किया करते वैसे ज्यादा बातें वैदिक ही करता पर रिमझिम भी अब थोड़ा- थोड़ा फ्रैंक होने लगी थी, जब हम किसी से ज्यादा मिलने लगते है उसके साथ वक्त बिताने लगते है उससे बातें करने लगते है तो हमारे मन मे उसके लिए झिझक अपने आप ही धीरे- धीरे कम होने लगती है रिमझिम के साथ भी ऐसा ही हो रहा था सम्हल- सम्हल कर ही सही पर अब रिमझिम थोड़ी बहुत मन की बात वैदिक से करने लगी थी वो शायद इसलिए भी क्योंकि वैदिक की कुछ बातें ऐसी थी जो रिमझिम की सोच से काफी मिलती- जुलती थी। कल जब वैदिक रिमझिम को अपने दोस्त विवान और खुदके स्कूल टाइम के कुछ मज़ेदार किस्से बता रहा था तब कहते- कहते वो रुक गया उसकी नज़र आसमान की ओर थी देखो पंछी कैसे दिनभर की सैर के बाद अब अपने घर लौट रहे है आकाश में उड़ते ये  पंछी एक साथ कितने अच्छे लगते है ना और इनका तालमेल इतना अच्छा होता है कि इतने सारे होते हुए भी ये आपस में टकराते नही है एक ही गति से एक साथ बस उड़ते चले जाते है ,हाँ सही कह रहे हो रिमझिम बोली। 

आज की सुबह रिमझिम के लिए सरप्राइजिंग रही हुआ ये की जब रोज़ की तरह रिमझिम फूल तोड़ने छत पर आई तो उसे वैदिक दिखाई दिया वो भी फूल तोड़ते हुए। रिमझिम , देखो आज तुम्हारा काम मैंने कर लिया ,हाँ वो तो देख रहीं हूँ पर तुम यहाँ कैसे तुम्हें तो शायद देर से जागने की आदत है ना। नही तो मैं तो रोज़ जल्दी जागता हूँ बस आज नींद और ज्यादा जल्दी खुल गई वैसे भी हम सभी को सुबह जल्दी उठना चाहिए सूरज को निकलते हुए सवेरा होते हुए खुद अपनी आँखों से देखना चाहिए , क्यों रिमझिम ने पूछा। क्योंकि इससे मन को खुशी मिलती है और पॉज़िटिव एनर्जी फील होती है , और सवेरा तो नई शुरुआत को लाता है नई शुरुआत के लिए तो जल्दी जागना ही चाहिये, हाँ प्यारी सी स्माइल के साथ रिमझिम ने कहा। अच्छा इतने फूल काफी है या और तोड़ने है वैदिक ने रिमझिम से पूछा हाँ बस इतने बहुत रिमझिम बोली। अगर रोज़ सुबह इन खिले हुए खूबसूरत फूलों को देखें इनकी महकती खुशबू को महसूस करें तो दिन तो बहुत खुशनुमा बीतेगा, तभी तुम धूप में भी होंठो पर हल्की सी मुस्कान लिए इतने आराम से चलकर आती जैसे कि कोई प्रॉब्लम नही है तुम खुश हो, तो ये है राज़। क्या राज़ रिमझिम ने हैरान होते हुए पूछा तब वैदिक बोला तुम्हारी सुबह की शुरुआत इन सुंदर फुलों के साथ होती है मन अपने आप खुशी से भर जाता होगा और फिर सारा दिन अच्छा ही जाता होगा कोई प्रॉब्लम भी तुम्हे प्रॉब्लम की तरह नही लगती होगी सब इज़ी सा लगता होगा है ना वैदिक ने एक होशियार समझदार लड़के की तरह पूछा। जी आपका ये गणित बिल्कुल सही है कहकर रिमझिम जोर से हँसने लगी साथ मे वैदिक भी हँसने लगा अब फूल तो मैंने तोड़ लिए पर तुम्हारा आज का दिन भी हर दिन की तरह जाना चाहिये महकता हुआ कहते हुए वैदिक ने मोगरे के कुछ फूल रिमझिम के ऊपर पर फेंक दिये रिमझिम हँसते - हँसते रुक गई , सॉरी गलती से हो गया मुझसे वैदिक ने थोड़ा सीरियस होते हुए कहा रिमझिम ने भी कुछ फूल लिए और वैदिक पर उछाल दिए कहते हुए की तुम्हारा दिन भी क्यों बुरा जाए ईट्स ओके मैंने बुरा नही माना कहकर रिमझिम चली गई पर वैदिक वही खड़ा रहा रिमझिम को जाते हुए देखता रहा। शाम को रिमझिम छत पर अकेले ही टहल रही थी जाने क्यों वैदिक आज छत पर आया ही नही , ये पहली बार था जब रिमझिम को अकेले होने पर थोड़ा बुरा सा लग रहा था रिमझिम कभी आसमान की ओर देखती तो कभी उसकी नज़र सीढ़ियों पर जा ठहरती, कुछ देर टहलने के बाद रिमझिम वहीं छत के एक कोने में जा बैठी और फिर अपनी डायरी उठाकर कुछ लिखने लगी हाँ आज रिमझिम डायरी भी साथ लेकर आई थी  ये डायरी ही तो है जो रिमझिम की सबसे अच्छी दोस्त है अपने दिल की बड़ी से लेकर हर छोटी से छोटी बात रिमझिम इसी से तो कहती है। अगले दिन वैदिक किसी सुपरफास्ट ट्रेन की तरह सारे घर में यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ दौड़े जा रहा था अपनी माँ के जन्मदिम को स्पेशल बनाने के लिए वैदिक और उसका दोस्त विवान जोकि अपने ट्रिप से अब लौट आया था दोनों मिलकर घर को सजाने में लगे हुए थे रिमझिम ने भी स्कूल से आने के बाद वैदिक के काम मे उसका हाथ बटाया शाम तक सब रेडी हो गया। एक घन्टे बाद सब हॉल में इकट्ठा थे वैदिक ने पार्टी में बस कुछ खास लोगो को ही इनवाइट किया था और बाकी सब घर के ही लोग थे विवान और रिमझिम भी घर के लोगों में ही तो आते है। केक कट होने वाला था पर रिमझिम अभी तक नीचे आई नही थी वैदिक ने दरवाजे के पास आकर ऊपर देखते हुए आवाज़ लगाई रिमझिम जल्दी आओ केक कट होने वाला है हाँ , हाँ आ रही हूँ कहते हुए रिमझिम सीढ़ियों के पास आई और सीढियाँ उतरने लगी वैदिक ने जब उसे देखा तो देखता ही रह गया पहली बार रिमझिम को इस तरह तैयार हुए साड़ी पहने जो देखा था। क्या हुआ रिमझिम ने वैदिक के पास आकर पूछा ,  कुछ नही वैदिक ने कहा। जैसा वैदिक ने सोचा था पार्टी वैसी ही रही तुलसी जी खुश भी थी और थोड़ी शर्मा भी रही थी मेरी नही तेरी उम्र है बेटा बर्थडे पार्टी करने की सुबह से वो वैदिक से यही कहे जा रहीं थी पर वैदिक ने तो ठान लिया था कि इस बार माँ के जन्मदिम को खास बनाना है। 

अगर हम समय को रोकना चाहें तो क्या रुकेगा बिल्कुल नही उसका काम तो चलने का है और वो चलता जाएगा तीन दिन बित गए थे इन तीन दिनों में वैदिक कुछ बदला हुआ सा लगा रिमझिम से जब भी बातें करता तो कुछ अलग ही लगता जैसे उसके मन में कुछ चल रहा हो। पहले तो उसकी बातों में कुछ- कुछ झूठ भी घुला हुआ सा नज़र आता था पर अब तो हर एक शब्द सच्चा सा लग रहा था कल रात की बात है वैदिक को घर मे अच्छा नही लग रहा था तो छत पर चला आया रिमझिम ने उसे जाते देख लिया था तो वो भी पीछे - पीछे चली आई क्या? हुआ वैदिक तुम ठीक तो हो कुछ परेशान हो क्या ? तुम्हें यहाँ आते हुए देखा तो पूछने चली आई , हाँ ठीक हूँ सब ठीक है बस घर के अंदर अच्छा नही लग रहा था इन तारों के बीच खुली हवा में साँस लेना चाहता था तो आ गया। मैं बचपन मे बहुत शरारती था बहुत मस्ती किया करता था मुझे ना दूसरे को बेवकूफ बनाने में बड़ा मज़ा आता था क्योंकि मेरे लिए वो खेल था तब मैं ये नही समझ पाता था कि खेल तो वो मेरे लिए है सामने वाले के लिए तो वो सच ही है ना। तो तुम बचपन की शरारत को याद करके दुखी हो रहे हो बचपन मे तो सभी शैतानी करते है छोड़ों मत सोचों बीती बातों को, देखो तारों को कितनी तेज़ चमक रहे है तुम कौनसा वाला तारा हो वो जो धीमे - धीमे चमक रहा है या वो जो तेज चमक रहा है मैं तो वो वाला तारा हूँ जो चाँद के पास है कहकर रिमझिम हँसने लगी तो वैदिक ज़रा सा मुस्कुरा दिया। आज वैदिक को आये 13 दिन हो गए है शाम को छत पर वैदिक बड़ी ही बेसब्री से रिमझिम के आने का वेट कर रहा था कुछ देर बाद रिमझिम आ गई। कुछ कहना था तुमसे झिझकते हुए वैदिक बोला , हाँ कहो ना रिमझिम ने कहा। इसके बाद वैदिक ने रिमझिम को सब सच-  सच बता दिया कि ये दोस्ती और जो दोस्त बनकर इतनी सारी बातें उसने रिमझिम से की वो सब कुछ झूठ था ये तो बस एक मज़ाक था जोकि कुछ ज्यादा ही आगे बढ़ गया सॉरी मेरा इरादा तुम्हें हर्ट करने का नही था मुझसे गलती हो गई सॉरी। 1 अप्रैल वाले दिन जब उस बच्चे ने वैदिक को अप्रैल फूल बनाया था तभी वैदिक के दिमाग मे भी ये आइडिया आया था। कि क्यों ? ना इस बोरिंग रिमझिम को भी अप्रैल फूल बनाया जाए बड़ा मज़ा आएगा बस यही सोचकर वैदिक ने ये नाटक शुरू किया था जोकि आज खत्म हो गया। जब सब कुछ साफ- साफ हो जाता है तब भी एक शांति सी छा जाती है वैदिक कह कर चुप हो गया था मन ही मन उसे बहुत बुरा लग रहा था रिमझिम से आँखे मिलाने की भी हिम्मत नही हो रही थी उसकी और रिमझिम सब कुछ सुनकर खामोश खड़ी थी। 15 मिनट की खामोशी के बाद रिमझिम बोली वैदिक मेरे दोस्त बनोगे चाहो तो मेरी डायरी और पढ़ सकते हो कहते हुए रिमझिम मुस्कुरा दी। आँटी के कहने पर जब तुम मेरे रूम में फूल लेने गए थे तब तुमने मेरी डायरी भी देखी थी है ना और शायद उसे पढ़ा भी था इसीलिए तुम्हारी बातें कुछ- कुछ वैसी थी जैसा की डायरी में लिखा हुआ था मैं तो पहले ही समझ गई थी इतनी भी बुद्धू नही हूँ जितना कि समझते हो और हाँ मेरे लिए ये दोस्ती अभी भी है। इतना तो जान लिया है तुम्हें, कि तुम झूठे हो या सच्चे हो पर दोस्त तो तुम अच्छे हो। मुझे स्कूल भी जाना है बाय कहकर रिमझिम चली गई। इसके बाद के दो दिन वैदिक और रिमझिम ने अच्छे और सच्चे दोस्त की तरह बिताए और फिर फाइनली वो दिन आ गया जिस दिन वैदिक को वापस जाना था। रिमझिम कुछ कहना था तुमसे वैदिक बोला, फिर से अब क्या कहना है रिमझिम ने पूछा। कुछ सेकेंड सोचने के बाद वैदिक बोला कुछ नही जब नेक्स्ट टाइम आऊँगा तब कहूँगा , ठीक है अब जाओ स्टेशन नही तो तुम्हारी ट्रेन छूट जाएगी रिमझिम ने मुस्कुराते हुए कहा। जाते - जाते वैदिक ने दोबारा पलट कर माँ और रिमझिम को देखा और फिर चला गया। वैसे जाते वक्त वैदिक खुश नज़र नही आ रहा था थोड़ा उदास था वो , ये सोचकर कि रिमझिम को देखे बिना कहीं मन कैसे लगेगा अब इस सारे नाटक के चक्कर मे वैदिक रिमझिम को तो फ़ूल नही बना पाया पर खुद जरूर अपना मन हार गया अब रिमझिम अच्छी जो लगने लगी थी उसे। 


 

एक चुटकी प्रेम

मार्च बित गया था ठंड के नख़रे अब कम हो गए थे कम क्या यूँ कहें कि अब खत्म ही हो गये थे सूरज के तीखे तेवर जो शुरू हो गये थे। अब गर्मागर्म पकोड़े...

Sonal bhatt MULAKAT-KAHANIYO-SE STORY OF OUR LIFE