ठंडी हवा ज़रा भी हाथों से टकराती तो सारे बदन में कपकपी सी दौड़ जाती लग रहा था जैसे बस स्टेशन पर नही किसी बर्फीले पहाड़ पर बैठा हूँ जहाँ हर तरफ ठंडी ठंडी और बहुत ठंडी हवाएँ चल रही है और मैं ठंड से काँपे जा रहा हूँ हाँ मेरा हाल सचमुच कुछ ऐसा ही तो हो रहा था। बस स्टेशन पर बैठे हुए मुझे बहुत ठंड लग रही थी वैसे मेरे आस- पास जो लोग थे वो भी मेरी तरह ठंड से काँप रहे थे पर फिर भी मुझे लग रहा था जैसे ये ठंडी हवाएँ मुझे ही परेशान कर रही हों, मैंने अपने पैरों को सिकोड़ लिया और अपने हाथों को जैकेट की पॉकेट में डालकर बैठ गया ऐसा मेरे साथ ही क्यों होता है जब भी मुझे कहीं जाना होता है ये मौसम खराब हो जाता है पिछली बार बारिश की वजह से ट्रेन लेट आयी और अब कोहरे ने बस का टाइम बदल दिया। लगभग 20 मिनिट गुज़र चुके थे देखते- देखते सूर्यदेव आँखों से औझल हो गए और शाम ने बादलों पर अपना रंग चढ़ाना शुरू कर दिया हवा अब और भी ठंडी हो गई थी। मैं और बाकी सारे यात्री खामोश से बैठे नजरों को ईथर- उधर दौड़ाते हुए वक्त काटने की कोशिश कर रहे थे तुम आजकल के नौजवान तो जाने कैसे हो छोटी सी बात पर भी ऐसे मुँह लटकाकर बैठ जाते हो जैसे कोई बहुत ही बड़ी बात हो गई हो मेरे पास ही बगल में बैठे अंकल जी ने कहा तो मैं ज़रा सा मुस्कुरा दिया बिल्कुल ऐसे जैसे मुझे जबरन मुस्कुराने को कहा गया हो। देख रही हैं आशा जी आज की युवा पीढ़ी को, कितनी कमज़ोर है मन से भी और तन से भी अंकल जी ने अपने हाथ मे पकड़े हुए पर्स में देखते हुए कहा तो मैंने थोड़ा चिढ़ते हुए पूछ लिया अच्छा कैसे?। तब अंकल जी बोले, बस देर से आएगी ये जानकर तुम ऐसे उदास होकर बैठ गए हो जैसे बस नही मानो तुम्हारी प्रेमिका हो जिसने वादा तो 4 बजे आने का किया था पर आ 5 बजे रही है और देखो ज़रा खुदको ठंड से कैसे काँप रहे हो जैसे साठ साल की उम्र मेरी नही तुम्हारी हो गई हो। अंकल जी की बात सुन मुझे हँसी आ गई जाने क्यों मुझे अपनापन लगा और मैं थोड़ा सा मुहँ बनाते हुए बोला बस के लिए अभी 1 घन्टे हमे इंतज़ार करना है वो भी ऐसी ठंड में ये जानकर कौन खुश होगा भला और आप कह रहे है कि हम आजकल के नौजवान बड़े कमज़ोर है तो अंकल जी आप बताइये जब आप हमारी उम्र में थे तो कैसे? थे अपनी भौंहों को ऊपर उचकाते हुए मैंने पूछा। हम , हम तो बहुत स्ट्रॉग थे बल्कि अभी भी है ही। तुम जैसे ठंड से काँप रहे हो ना, अरे ऐसी ठंड में हम तो स्वेटर ही नही पहना करते थे और ठंड हमारा कुछ भी नही बिगाड़ पाती थी और उदास होना क्या होता है जैसे हमे पता ही नही था। अंकल ने कहा तो उनकी बातों पर मैं डाउट करते हुए बोला अच्छा सच में तब अंकल बोले हाँ , हाँ सच मे। अच्छा और कैसे थे आप मतलब क्या - क्या खूबियाँ रही है आप मे। अब खुद के मुहँ से खुदकी क्या तारीफ़ करें पर जो सच है वो सच है। मैं बचपन से ही बड़ा निडर था किसी से भी नही डरता था पिताजी से भी नही, जबकि पिताजी सख्त स्वभाव के थे उन्होंने जो कह दिया तो बस वही होना है लेकिन मैं भी ज़िद्दी स्वभाव का था इसलिए अपने भाई - बहनों में सबसे ज्यादा पनिशमेंट मुझे ही मिला करती थी। लेकिन स्कूल में मैं मास्टरजी का बड़ा ही चहेता था होनहार स्टूडेंट जो था मुझे मेरा गाँव, गाँव का घर , स्कूल , मेरे दोस्त सब बहुत अच्छे लगते थे पर मेरे बारहवीं पास करते ही पिताजी हम सबको लेकर शहर में आ गये। कुछ दिनों तक गाँव की याद आई पर धीरे- धीरे शहर की आदत हो गई और फिर कॉलेज में एडमिशन हो गया था तो पढ़ाई में भी बिज़ी हो गये। ओह! तो क्या आपने सिर्फ़ पढ़ाई और पढ़ाई की है, कॉलेज लाइफ इंजॉय नही की क्या? अच्छा ये तो बताइए आप कॉलेज कैसे जाया करते थे स्मार्ट कूल बॉय की तरह या फिर सिंसियर स्टूडेंट की तरह। नही नही हम तो हमेशा अच्छे स्टूडेंट की तरह ही कॉलेज जाते थे और एक दम साधारण रहते थे पर फिर भी जब हम क्लास में इंटर हुआ करते थे तो कितनी ही नजरें अपने - आप हमारी ओर मुड़ जाया करतीं थी पर मजाल है जो हमारी नज़र किसी की ओर हो जाये। क्यों? आपको किसी से दोस्ती करना पसंद नही था क्या या फिर आप अकड़ू थे मैंने पूछा। अरे! नही ऐसी कोई बात नही थी दरसल पिताजी ने पहले ही सख्ती से साफ कह दिया था कि शहर आये है इसका मतलब ये नही की यहाँ के रंग- ठंग में ढल कर बिगड़ जायें और अपने संस्कार ही भूल जाये कॉलेज पढ़ाई करने जाना है दोस्ती यारी करने नही। ओह तो आपका कोई फ्रेंड नही था और जब कोई फ्रेंड ही नही था तो गर्लफ्रैंड क्या होगी मैंने थोड़ा धीमे शब्दों में कहा। तब अंकल जी ने मेरी ओर देखा और कहने लगे न , ना उदास मत हो कहानी तो अभी बाकी है। मैं झट से खुश होते हुए बोला हाँ तो फिर सुनाइये ना। हाँ तो सुनो, जब हम अपनी क्लास में होते थे तो बिल्कुल एक सभ्य स्टुडेंट की तरह पढ़ाई किया करते थे और जैसे ही क्लास से निकलकर केंटीन की और बढ़ते तो घनश्याम से बस श्याम रह जाते, बचपन मे मैंने कब पिताजी की सारी बातें मानी थी जो अब मानता। वो जो कहते थे वो मैं करता था पर जो मेरा मन कहता था मैं वो भी किया करता था। एक या दो नही हमारे बहुत सारे दोस्त थे और सबके -सब शैतान शरीफ़ कोई भी नही था सिवाये हमारे, तभी तो जिम्मेदारी भरा काम हमे ही सौंपा जाता था। जिम्मेदारी भरा काम, ये कौन सा काम था मैंने अंकल जी से पूछा तब अंकल जी मुस्कुराते हुए बोले अब लग रहा है कि तुमने अपनी कॉलेज लाइफ में कोई जिम्मेदारी वाला काम नही किया। मैंने पूछा क्यों , तभी तो सवाल कर रहे हो ना अंकल जी बोले। अरे भई अपने दोस्तों के प्रेम पत्रों का आदान- प्रदान करना बड़ी ही जिम्मेदारी का काम होता है जोकि हर किसी को नही सौंपा जाता जिस पर भरोसा होता है उसे ही ये काम दिया जाता है, अपने दोस्तों में मैं ही सबसे ज्यादा भरोसेमन्द था , मेरे दोस्तों को इस बात का पूरा यकीन था कि मैं उनके लेटर्स कभी खोलकर नही पढूँगा। सच मे आपने कभी कोई लेटर खोलकर नही देखा था मैंने ज़रा शक्की निगाहों से देखते हुए पूछा तब अंकल जी बोले नही , नही हम अपने दोस्तों का यकीन कैसे तोड़ सकते थे भला। मतलब आप तो वाकई में एक बहुत ही ईमानदार दोस्त रहे है वैसे आपने भी कभी खुदके हाथों से किसी के लिए स्नेह भरा पत्र लिखा था कि नही। साफ - साफ पुछलो ना कि हमारी कोई प्रेमिका थी कि नही, नही थी। पर कोई तो होगी ना जो आपको अच्छी लगी होगी जिसे देखते ही आपके मन की कलियाँ खिल उठती होंगी, हाँ आपके चेहरे के एक्सप्रेशन्स देखकर लग रहा है कि कोई तो थी देखिए कैसी धीमी- धीमी मुस्कान आ रही है होंठो पर अब बता भी दीजिए। तब अंकल जी हल्के से इतराने वाले एक्सप्रेशन देते हुए बोले अगर ये अभी भी वही कॉलेज वाला वक्त होता तो हम बताते नही क्योंकि हमने तो तब भी किसी को अपने मन की खबर होने नही दी थी पर चलो आज तुम्हें बताते है तो सुनो- उसका नाम लता था भूरी- भूरी आँखें भूरे- भूरे बाल और पतली सी उसकी आवाज़, क्लास की टॉपर थी वो, पर क्लास में किसी से ज्यादा बात नही करती थी बस उसकी दो- तीन सहेलियाँ थी जो साये की तरह हर पल उसके साथ ही रहती थी और उन्ही के साथ वो ग्रूप स्टडी किया करती थी। इसलिए उससे बात हो पाना जैसे ना के बराबर ही रहता था।वो तो जब हमारे सीनियर्स की फेरवल पार्टी थी तब लता और मैंने ही एंकरिंग की थी उसी दौरान थोड़ी बहुत बात - चीत हुई थी हमारी। उस दिन लता ने जो हरे रंग की साड़ी पहनी थी उसमे वो बहुत सुंदर लग रही थी मन कर था कि उसकी तारीफ कर दूँ पर फिर मैं हिचकिचा गया। आपने लता जी को अपने मन की बात कब? बताई। हमारे सीनियर के फेयरवेल से खुद हमारा फेयरवेल आ गया पर अपने मन की बात कहने की हिम्मत मैं जुटा ही नही पाया लता क्या कहेगी इस बात की फिक्र से ज्यादा डर इस बात का था कि पिताजी को पता चल गया तो क्या होगा। फिर। फिर क्या ग्रैजुएशन पूरा हो गया और सब अपने - अपने रास्ते चले गये। ओह! मैंने निराशा के भाव से कहा। अभी 15 मिनट और थे बस आने में मैं उठा और हम दोनों के लिए चाय ले आया। आपके पर्स में जो तस्वीर लगी हुई है जिन्हें आप आशा जी कह रहे है वो आपकी वाइफ की है , है ना। हाँ कहते हुए अंकल जी ने अपना पर्स निकाला और मुझे तस्वीर दिखाते हुए बोले ये हमारी पत्नी की फ़ोटो है। हमारी अरेंज मैरिज हुई थी आशा जी से शादी के बाद ही हमने ये जाना कि लता सिर्फ पसन्द थी हमारी, जो आँखों को भा गई थी कुछ और ज़्यादा था ही नही और आशा जी वो तो जब से जीवन मे आई तो ऐसा लगा ही नही की हम दो अजनबी है जो अभी - अभी एक रिश्ते में बंधे हो लगा जैसे हम हमेशा से साथ ही तो थे। मतलब आपको आपकी रियल ड्रीम गर्ल मिल गई थी। हाँ मिल गई थी और उनके आने से हमारी दुनिया पूरी तरह बदल गई थी जो भी हमे देखता हमारी खूब तारीफ करता कि वाह! क्या जोड़ी है और हम खुशी से मुस्कुरा देते और ऐसे ही खुशी - खुशी कई साल हमने साथ बिता दिये। स्वीट स्टोरी मैंने स्माइल करते हुए कहा और फिर रास्ते की ओर देखने लगा। कुछ पल चुप बैठा रहा इसके बाद मैंने अंकल जी से पूछा अंकल आप घर देर से पहुँचेंगे तो क्या आँटी आप पर नाराज होंगी मेरे ऐसा पूछने पर वो बोले नही जब मैं घर पहुँचूँगा तो ना कोई नाराज़ होने वाला होगा और ना ही ये पूछने वाला की देर कैसे हो गई। क्यों ? मैंने पूछा। अंकल जी चेहरे के भाव अब अचानक बदले नज़र आये।उन्होंने कहा क्योंकि चार साल पहले ही आशा जी हम से दूर हो गयीं वो हमे छोड़कर चलीं गयी, पर लगता नही है कि वो हमारे पास नही है हमे तो हर पल साथ होने का एहसास होता है। अंकल की बात सुन मैं ज़रा दुखी हो गया बहुत बुरा लग रहा था मुझे उनके लिए, स्वीट स्टोरी का शायद ये सेड टर्न था। आपको आंटीजी की याद आती होगी ना, नही बिल्कुल नही याद तो तब आयेगी जब मैं उन्हें भूलूँगा और आशा जी, वो तो कभी हमें खुदको भुलाने नही देंगी गहरी साँस भरते हुए अंकल जी ने कहा। मैं फिर कुछ पल खामोश होकर बैठ गया पर अंकल कुछ गुनगुना रहे थे शायद आँटी को याद कर गुनगुनाने लगे। फिर कुछ देर बाद मुझसे बोले अरे! इतना दुखी सा चेहरा मत बनाओ देखो शाम कितनी सुहानी लग रही है और तुम्हारी बस भी आने ही वाली है तो अब खुश हो जाओ हँसते हुए अंकल ने कहा तो मैं उनकी ओर देखने लगा। ओह हो ऐसे क्यों देख रहे हो, तुम आजकल के बच्चे भी ना बड़ी जल्दी इमोशनल हो जाते हो चलो एक राज़ की बात बताता हूँ हमारे दोस्तों के जो प्रेमपत्र थे ना वो सब हमने चोरी से पढ़ लिये थे और एक बार हमने भी लता को प्रेम पत्र देने की कोशिश की थी पर वो गलती से उसकी सहेली आशा के पास पहुँच गया , फिर क्या हुआ । फिर , प्यार हुआ इकरार हुआ और आशा जी और हमारी शादी हो गई। अंकल की बात सुन मैं कुछ कन्फ्यूज़ सा हो गया वो ऐसे आराम से कह रहे थे जैसे उन्होंने कुछ अजीब कहा ही न हो , लो भई बस आ गई चलो अब। आज आशा जी बड़ा नाराज़ होंगी हम पर। क्या? मैंने चौंकते हुए कहा तब अंकल जी मुझे देखते हुए बोले बेटा ऐसी ठंड में बैठकर 1 घन्टे बस का इंतज़ार करना कोई आसान थोड़ी ना है इसलिए मैं तुम्हें कहानी सुनाने लगा, इससे हम दोनों का वक्त भी कट गया और ठंड का एहसास भी जरा कम रहा। अब कहानी में कही सारी बातें हमेशा सच्ची हो ऐसा जरूरी तो नही, सामने वाला हमारी कहानी मन लगा के सुने इसलिए बहुत कुछ खुद की तरफ से भी जोड़ना पड़ता है फिर चाहे वैसा हुआ हो या ना हुआ हो कहकर अंकल जी ज़ोर से मुस्कुरा दिये पहले तो उनकी बात सुन मैं सोच में पड़ गया और फिर सब समझ आते ही मैं भी धीरे से मुस्कुरा दिया। अंकल जी से मेरी ये मुलाकात बड़ी दिलचस्प रही और यादगार भी।
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