मेहक के जाने के बाद निशु उसकी बनाई ड्रॉइंग में कुछ सुधार करने लगी , मेहक ने अपनी ड्रॉइंग में छत के पास वाला आम का पेड़ बनाया था और वो चिड़िया जिसे वो रोज़ देखती है पेड़ की टहनी पर बैठे हुए। मेहक का बनाया हुआ पेड़ कुछ - कुछ आम के पेड़ के जैसा था पर उस पर बैठी चिड़िया आम के पेड़ वाली चिड़िया से मेल नही खा रही थी जिसमें निशु ने सुधार कर उसे सुंदर चिड़िया में बदल दिया। निशु रोज़ यही करती है मेहक जो भी बनाती है वो पहले उसकी तारीफ करती है और फिर बातों ही बातों में उसकी ड्रॉइंग को ठीक भी करती है। जब से निशा आई है तब से निशु दीदी , निशु दीदी करते हुए मेहक निशा के आस- पास ही रहती है। मेहक अनिता की बेटी है जिसे निशा की माँ वैजंती ने घर की रेख- देख के लिए नौकरी पर रखा है अब इस उम्र में अकेले पूरे घर को सम्हालना निशा की माँ के लिए थोड़ा मुश्किल हो रहा था तब निशा ने ही कहा था माँ आप अपनी मदद के लिए किसी को नौकरी पर रख लो ना तब निशा की बात मानकर वैजंती जी ने अपने आस- पड़ोस और जान- पहचान के लोगो से बात की और तब अनिता घर आई। अनिता के आने से वैजंती जी को बड़ा सहारा मिला और घर में रौनक भी बढ़ गई क्योंकि अनिता रोज़ अपनी बेटी को भी अपने साथ लाती है जिसके आने से वैजंती जी और उनके पति दोनों का ही मन लगा रहता है और अब तो निशा भी आ गई है भले ही कुछ दिनों के लिए आई है पर अपनी बेटी के आने से निशा के मम्मी - पापा दोनों ही बहुत खुश है और मेहक भी क्योंकि निशु दीदी के आने से मेहक को कितने सारे ड्रॉइंग कलर्स जो मिले है। घर आने के बाद जब निशा अपने कमरे में बैग से सामान निकाल रही थी तब दरवाजे के पास खड़े होकर मेहक निशा को बड़े ही ध्यान से टुकुर- टुकुर देखे जा रही थी और जब निशा के पास मेहक ने कलर्स देखे तो खुशी से आँखें बड़ी करती हुई बोली कलर, मेहक के बोलने पर निशा ने मेहक की ओर देखा तो मेहक किसी मासूम बच्चे की तरह बिल्कुल चुपचाप खड़ी हो गई, निशा ने मेहक को अपने पास बुलाया इधर आओ मेहक तुम्हें कलर्स पसन्द है मेहक ने तुरंत अपना सिर हिला दिया तुम्हें ड्रॉइंग करना आता है हाँ मैं बहुत अच्छा चित्र बनाती हूँ निशा के पूछने पर मेहक बोली, अच्छा तो मुझे बनाकर दिखाना फिर मैं तुम्हें कलर्स दूँगी ठीक है। बस तब से मेहक रोज ही निशु दीदी को अपनी चित्रकारी दिखाती रहती है और निशा उसकी खूब तारीफ़ करती है। अपने प्रॉमिस को पूरा करते हुए निशा ने मेहक को कलर्स और साथ मे ड्रॉइंग बुक भी दी है जिसे लेकर मेहक बहुत खुश है , तब से निशु दीदी उसे और भी अच्छी लगने लगी है अरे भई कलर जो दिए है दीदी ने। बच्चों का मन कितना भोला होता है ना, ज़रा से अपनेपन छोटी सी खुशी से भी कितना खुश हो जाता है। निशा मेहक से बातें करती है उसके साथ खेलती है उसे ड्रॉइंग करना सिखाती है, इससे मेहक को कितनी खुशी मिलती है उसका खिलखिलाता हुआ चेहरा मीठी सी मुस्कान ये साफ कह रही है कि छोटी सी मेहक निशु दीदी के आने से और भी ज्यादा मेहक रही है। अब तो निशा को भी मेहक से बहुत लगाव हो गया है उसकी भोली- भोली सी बातें और छोटी- छोटी ख्वाइशें सुन निशा को हँसी आ जाती है और कभी आँख भी भर आती है क्योंकि मेहक को देखकर निशा को अक्सर अपना बचपन याद आ जाता है बचपन मे उसकी भी कुछ नन्ही सी आशायें थी जो पूरी ना हो सकी क्योंकि उस वक्त हालात बहुत अलग थे जब हालात सही नही होते तो ख्वाइशें छोटी हो या बड़ी सब सिमट जाया करतीं है जैसे उनकी पूरी हो पाने की कोई उम्मीद ही ना हो।
कल जब निशा कैनवास पर पेंटिंग कर रही थी तो, तब मेहक खामोशी के साथ ध्यान लगाकर निशा को देख रही थी निशु दीदी कैसे ब्रश को कैनवास पर चला रही है कैसे कलर कर रही है, बीच - बीच में मेहक कुछ - कुछ पूछ भी रही थी और निशा उसको समझाती जा रही थी दीदी ये दोनों कलर को क्यों? मिलाया, ऐसे कलर मिलाकर भी रंग भरते है क्या ? हाँ ऐसे भी रंग भरते है दो अलग- अलग कलर्स को मिलाने से एक नया कलर बन जाता है और पेंटिंग में जहाँ उसकी जरूरत होती है हम उसे वहाँ भर देते है मेहक को समझाते हुए निशा बोली। इसके बाद निशा ने मेहक से कुछ देर तक कोई बात नही की क्योंकि उसका सारा ध्यान अब पेंटिंग बनाने में था निशा जब भी पेंटिंग करती है तो उसमें इस तरह खो जाती है की उसके आस- पास की किसी भी चीज़ पर उसका कोई ध्यान नही होता। बचपन से ही निशा को पेंटिंग का बड़ा शौक रहा है उस वक्त निशा के पास ना अच्छे कलर्स हुआ करते थे और ना ही पेंटिंग ब्रश। निशा के पास थोड़े खराब हो चुके पुराने पेंटिंग ब्रशेस थे जोकि उसे उसकी किसी सहेली ने दिये थे निशा उन्हें अच्छे से सम्हाल कर रखती और बड़े चाव से मन लगाकर उन्ही पेंटिंग ब्रशेस से पेंटिंग किया करती जबकि निशा उस वक्त ये भी नही जानती थी कि ब्रश से पेंटिंग करते समय उसे किस तरह पकड़ना होता है और अलग - अलग तरह के ब्रश आखिर होते क्यों है कैसे उनसे पेंटिंग की जाती है वो कुछ भी नही जानती थी पर फिर भी किसी भी सादे कागज़ पर ,तो कभी कॉपी के पीछे के पन्नो पर या घर की दीवार पर वो कुछ भी बनाती और उसमें रंग भरने लगती तब कोई नही जानता था कि निशा का ये शौक उसे एक दिन आर्टिस्ट बना देगा। पेन्टिंग पूरी होने के बाद निशा थोड़ा दूर खड़े होकर अपनी बनाई पेंटिंग को देखने लगी तभी मेहक बोल पड़ी निशु दीदी ये बना लिए आपने , ये पूरा बन गया ना, हाँ पेंटिंग पूरी हो गई देखो कैसी बनी है , मेहक कैनवास पर नजरें टिकाकर गौर से देखने लगी अरे ! इसमें तो एक लड़की बनी है ये तो मेरे जैसे दीवार पर कुछ बना रही है इसकी फ्रॉक भी मेरी फ्रॉक जैसी है , हाँ ये पूरी तुम्हारे जैसी ही है मेहक निशा ने मेहक के गालों को छूते हुए कहा। अच्छा ये पूरी मेरे जैसी है मैं मम्मी को भी बता कर आऊँ मेहक ने कहा छोटी सी स्माइल देते हुए निशा बोली ठीक है जाओ बता दो। अगले दिन निशा छत पर पौधों में पानी डाल रही थी और साथ ही मेहक के आने का इंतज़ार कर रही थी मेहक अभी तक ऊपर क्यों नही आई नीचे हॉल में खेलने तो नही लग गई कुछ देर इंतजार करने के बाद निशा मेहक को देखने हॉल में चली आई यहाँ निशा के मम्मी- पापा और पड़ोस वाली आंटी साथ बैठ कर कुछ बात कर रहे थे पर निशा को मेहक उनके आसपास हॉल में कहीं नजर नही आई निशा ने किचन में अनिता के पास भी देखा पर मेहक वहाँ भी नही थी निशा जब अपने कमरे में गई तो मेहक उसे वहाँ मिली वो निशा के पेंटिंग के सामान को देख रही थी पेंटिंग ब्रश को कैनवास पर चलाते हुए झूठ- मुठ की पेंटिंग कर रही थी मेहक तुम यहाँ हो निशा ने कहा तो मेहक निशा को देखकर चौंक गई और जल्दी से ब्रश को स्टूल पर रख दिया। निशा मेहक के पास गई और बोली तुम्हें ब्रश से पेंटिंग करनी है चलो मैं सिखाती हूँ। आज निशा और मेहक दोनों ने साथ मिलकर पेंटिंग की जिसमे मेहक को बड़ा मज़ा आया वो बहुत खुश हुई और उसे खुश होता देख निशा के मन को सुकून सा मिल रहा था मेहक और निशा का कोई रिश्ता नही है ना मेहक निशा की रिश्तेदार लगती है ना ही बहन और ना ही दोस्त लेकिन फिर भी मेहक को खुश करके निशा को खुशी मिलती है हमारा बिता कल जब हमें किसी के आज में नज़र आता है तो ना होते हुए भी उससे हमारा नाता सा जुड़ जाता है वो हमें अपना सा लगने लगता है। मेहक को खुशी देकर उसकी छोटी सी ख्वाइश पूरी कर निशा को ऐसा लगता गया जैसे उसने खुदको कोई खुशी दी हो उसने मेहक की नही बल्कि खुदकी किसी ख्वाइश को पूरा किया हो।
जब बचपन मे छोटे से मन की कोई छोटी सी आशा पूरी होती है तो उसकी खुशी के आगे सारी दुनिया की दौलत भी बड़ी फीकी सी नज़र आती है। निशा इस बात को अच्छी तरह समझती है इसलिए मेहक को वो खुशी देने की कोशिश करती है जो उसका मन चाहता है क्योंकि सभी की आशायें पूरी नही होती, होते है कुछ लोग जिनकी छोटी - छोटी आशायें भी अधूरी रह जाती है।निशा की तरह।
वक्त बहुत तेज़ी से गुज़रता है ये 15 दिन कैसे बीत गए पता ही नही चला अपने लौटने की तैयारी करती हुई निशा मन ही मन यही सोच रही है बैग में सामान रखते हुए निशा का मन भारी सा हो रहा था जब कई दिनों बाद हम घर लौटते है तो मन कितना खुश होता है और वही मन घर से जाते वक्त कितना उदास हो जाता है वैसे उदास तो निशा के घर वालों का भी मन भी हो रहा है पर वो फिर भी मुस्कुरा रहे है ताकि निशा दुखी ना हो। निशा जो भी पेंटिंग का सामान अपने साथ लाई थी वो सब आज उसने मेहक को दे दिया ये लो मेहक ये सब तुम रखलो ये मेरी तरफ़ से गिफ्ट है तुम्हारे लिये, ये सब रख लूँ मेहक खुश होते हुए बोली, हाँ मुस्कुराते हुए निशा ने कहा।मेरे पास भी गिफ्ट है कहते हुए मेहक ने एक कागज़ निशा को दिया जिसमे मेहक ने ड्रॉइंग की थी निशा ने खुश होते हुए अपना गिफ्ट अपने पास सम्हाल कर रख लिया। निशा जब गाड़ी में बैठी तो मेहक ज़ोर- ज़ोर से चिल्लाकर कह रह थी बाय निशु दीदी , बाय निशु दीदी जल्दी आना निशा की गाड़ी जब तक दिखती रही मेहक उछल- उछल कर कहती रही बाय निशु दीदी बाय और निशा चली गई मेहक को कुछ पलों की छोटी- छोटी खुशियाँ देकर।