विजया



एक बार चलना शुरू कर दो तो वो रास्ते भी नज़र आने लगते है जो कुछ देर पहले दिख भी नही रहे थे। किसी एक जगह खड़े रहकर ये कहना कि आगे रास्ता है ही नही ये खुद को चलने से रोकने का एक अच्छा बहाना है जो मुझे किसी रास्ते या किसी मंजिल तक कभी नही ले जाएगा,  मैं अभी जहाँ हूँ ये मुझे वहीं खड़े रखेगा और मैं ये नही चाहती थी इसलिए रास्ते पर चल पड़ी थी इस वक्त मेरे मन मे मंजिल तक ना पहुँच पाने का कोई डर नही था क्योंकि मेरा लक्ष्य मंजिल को पाना नही था मेरा लक्ष्य तो चलते जाने का था, नये रास्ते बनाने का था वो रास्ते जो किसी को उसकी मंजिल तक पहुँचा सके। बिल्कुल मुश्किल नही था सब आसान रहा मैं अपने रास्ते पर चलती गई और सब हासिल होता गया ये कहना भले ही आसान हो पर इसे मान लेना आसान नही है। सच यही है आसान कुछ भी नही होता है हमे उसे आसान बनाना पड़ता है। जैसे कोई कच्ची सड़क, ऊँची- नीची कहीं- कहीं पर गढ्ढ़े कहीं सकरी ऐसे रास्ते पर चलना ज़रा कठिन होता है लेकिन जब उसे पक्की सड़क में बदल दिया जाता है तो उस पर चलना आसान हो जाता है। हमारे जीवन की सड़क भी ऐसी ही है कच्ची , जिस पर होसलों की गिट्टी और विश्वास की रेत को डालकर उसे पक्का और मजबूत बनाना है ताकि हमारा उस पर चलना आसान हो सके। 
सिर्फ रास्ते ढूंढने में ही दिमाग़ मत लगाओ रास्ते बनाने की भी कोशिश करो। कौन तुम्हारे साथ है ये तलाशना बंद कर दो तुम खुद , कितने साथ हो खुदके ये देखना शुरू कर दो क्योंकि खुद से बेहतर साथी तुम्हारा कोई और हो ही नही सकता। इसलिए ज्यादा सोचो नही बस खुद का हाथ थामकर खड़े हो जाओ और चल पड़ो उस राह पर जो तुम्हारी है उस रास्ते पर जो तुमने बनाया है उस मंजिल की ओर जो सिर्फ तुम्हारी है विजया की इन बातों ने रात के अंधेरे में पस्त होकर सोए हौसलों को जैसे सुबह के उजाले मे तेज़ आवाज़ लगाकर फिर जगा दिया हो।हॉल में बैठा हर एक शक़्स अपनी आँखें विजया पर टिकाये खोमशी के साथ उसकी बातों को सुनता जा रहा था।अपनी बात खत्म कर जैसे ही विजया ने अपने हाथ का माइक टेबल पर रखा तालियाँ गूँज उठी और दस मिनट तक ये गूँज हॉल में बनी रही। सब विजया से बहुत प्रभावित हुए उसकी बातों में वो असर या कहे जादू है जो उस शख्स को भी दौड़ की रेस में खड़ा कर सकता है जिसके चलने की उम्मीद भी न के बराबर हो। कितने साहस और विश्वास से भरी है विजया शर्मा हर एक शक़्स विजया को देख यही सोच रहा था। कॉलेज इवेंट से जाते वक्त फूल एनर्जी के साथ विजया ने सबको शुभकामनाएं दी उनकी भविष्य की जीत के लिए और बड़ी सी मुस्कुराहट के साथ बाय जल्द ही मिलेंगे कहकर विजया चली गई पर सबके मन की आवाज़ में वो कहीं न कहीं खुदको थोड़ा छोड़ गयी। 
हेलो आई एम विजया शर्मा आँखों मे चमक और चेहरे पर तेज़, कॉन्फिडेंट से भरी ये आवाज़ जब लोगो के कानों में पड़ती है तो जोश की एक तरंग दिल और दिमाग से होती हुई पूरे शरीर मे दौड़ पड़ती है और एक नया जज़्बा जगा देती है। कितने लोगो की जिन्दगी बदली है विजया की वजह से ,हजारों लोग है जो विजया को सुनना चाहते है सुनते है उसे पसन्द करते है उसकी बातें इतनी पावरफुल होती है कि सुनने वाले का नज़रिया बदल देती है। कहाँ से आया विजया में इतना आत्मविश्वास शायद बचपन से ही विजया ऐसी ही होगी निडर।
कॉलेज इवेंट से घर आने के बाद विजया धृति के रूम में गई पर धृति सो गई थी और आई धृति के पास बैठी हुई थी तुम आ गई आई ने कहा हाँ बस अभी आई हूँ आई विजया ने आई से कहा। 
अच्छा आप कॉफी पियोगी विजया ने आई से पूछा विजया बेटा मैं बना देती हूँ ना रोज़ तो तुहि बनाकर पीती है थक गई होगी तू, नही आई आज भी मैं ही बनाऊँगी। विजया ने दोनों के लिए कॉफी बनाई और कॉफी का मग आई के हाथ मे देते हुए बोली आई आप आराम करलो मैं हूँ यहाँ धृति के पास ,ठीक है कहकर आई अपने रूम में चली गई। हाथ मे कॉफी का मग लिए विजया खिड़की के पास जा बैठी और सोती हुई धृति को देखने लगी कितने सुकून और बेफ़िक्री के साथ सो रही है धृति, अभी जागी हुई होती तो सबको दौड़ा रही होती अपने पीछे- पीछे पर सोते हुए कितनी शांत लग रही है बिल्कुल मासूस जबकि एक नम्बर की शैतान है। मेरी प्यारी बच्ची कहते हुए विजया ने धृति का सिर चुम लिया। इसके बाद विजया कुछ देर आई के पास बैठी आज का दिन कैसा रहा क्या हुआ सब कुछ बताया जितने चाँव से विजया सारी बातें बताती है उतने ही मन लगाकर आई उसकी सारी बातों को सुनती है आई को भी विजया की बातें सुनना अच्छा लगता है। आसमान में अकेला चाँद होता तो आसमान कितना खाली- खाली लगता चाँद के साथ तारों का होना भी जरूरी है , चाँद के साथ टिमटिमाते तारों से आसमान किसी खूबसूरत चादर की तरह लगता है। भले ही तारे चाँद से छोटे नज़र आते है पर चमकते वो भी है वजूद उनका भी है। 
खिड़की के पास खड़ी आसमान की ओर देख रही विजया यही सोच रही थी तभी मोबाइल स्क्रीन पर लाइट चमकती दिखाई दी आज जिस कॉलेज इवेंट में विजया गई थी वहाँ की प्रिंसिपल का कॉल था हेलो विजया जी आज आपके आने से स्टूडेंट्स बहुत मोटिवेट हुए ऐसे ही सभी को प्रेरित करती रहे, आप एक आत्मविश्वासी और साहसी महिला है अपने कार्य मे इसी तरह आगे बढ़ती रहे हमारी शुभकामना आपके साथ है जी शुक्रिया प्रिंसिपल की बात सुनने के बाद जवाब देते हुए विजया ने कहा। जब कोई तारीफ़ करता है तो हमारा चेहरा खुशी से खिल उठता है पर विजया वो तो किसी गहरी सोच में पड़ गई उसे कॉलेज का वो एग्जाम हॉल नज़र आ रहा है जहाँ स्टूडेंट अपना एग्जाम दे रहे है दो टीचर्स भी है जो स्टूडेंट्स पर नजर रखे हुए है एक स्टूडेंट अपने काँपते हुए हाथों से जल्दी- जल्दी अंसर शीट में कुछ लिखने की कोशिश कर रही है हॉल में लगी घड़ी का काँटा जैसे- जैसे आगे बढ़ रहा था उसके मन की बेचैनी और घबराहट भी उसके साथ बढ़ती जा रही थी तभी पैन हाथ से छूटकर नीचे गिर गया विजया ऐनी प्रॉब्लम, मैम वो पैन विजया धीमी आवाज में बोली ठीक है उठा लो टीचर ने कहा। तब पैन उठाकर मैंने फिर लिखना शुरू कर दिया कुछ देर बाद बैल बज गई एग्जाम का समय खत्म हो गया मैं तेज़ी से हॉल से बाहर आ गई और जल्दी- जल्दी कॉलेज से बाहर निकल टैक्सी में जा बैठी मैंने क्या लिखा कुछ याद नही जो भी सब पढ़ा वो एक साथ दिमाग़ में ऐसे घूमने लगा कि कुुुछ समझ ही नही आ रहा था किस सवाल के लिए मुझे क्या लिखना था मैं भूल गई बहुत कन्फ्यूज हो गई थी। घर पहुँचते ही मैं सीधा माँ के पास गई कहा कुछ नही बस जाकर उनके पास बैठ गई माँ की तबियत ठीक नही हुई थी वो अभी भी बीमार थी। मैं बचपन से ही डरपोक रही हूँ मैं डरती रही और माँ मुझे हिम्मत देती रही। जब भी माँ- पापा के बीच झगड़ा होता तो मैं डर जाती पापा मुझ पर चिल्ला पड़ते तो मैं सहम जाती। स्कूल में मैं ना किसी के साथ खेलती थी और न ही झगड़ती थी ,डरती थी खेलते हुए अगर किसी ने धक्का दे दिया तो में गिर जाऊँगी अगर किसी बच्चे से झगड़ा हुआ तो पनिशमेंट मिलेगी। जब भी मैडम बुक पढ़ने के लिए मुझे क्लास में खड़ा करती तो में ये सोचकर डर जाती की अगर कुछ गलत पढ़ दिया तो मैडम कितना डाँटेगी मुझे उस डर से मैं बुक पढ़ ही नही पाती। एग्जाम में फेल न हो जाऊँ इसलिये दिनरात खूब पढ़ाई करती पर एग्जाम पेपर देखते ही सब भूल जाती। मुझे लेकर माँ को फिक्र होती थी पर वो कभी मुझे पर नाराज़ नही हुई बस हमेशा मुझे समझाती रही। माँ मन से बहुत मजबूत थी पापा ने उन्हें डिवोर्स देकर दूसरी शादी कर ली पर माँ इस बात से टूटी नही, वो मुझे अच्छी परवरिश देने की कोशिश करती रहीं
वो न तो बीते कल को याद करके रोतीं और न ही हमारे आज की प्रोबल्स को देखकर दुखी होती। जब जीवन हमारा है तो चलना भी हमे ही होगा ना, दुखी होकर बैठने और डर कर घबराने से कुछ नही होगा तुम जहाँ हो वही रह जाओगे जबकि जीवन का मतलब चलते जाना है रुकना नही इसलिए घबराना डरना छोड़ दो हिम्मत करके आगे बढ़ना सीखो समझ गई ना बेटा माँ ने जब मुझसे कहा था तो मैंने हाँ में सिर हिला दिया था। पर समझ तब आया जब माँ मुझे छोड़कर चलीं गई अपने आख़री पल में माँ ने मुझसे कहा था जिनकी साँसे थम जातीं है सफर उनका खत्म होता है लेकिन अगर तुम्हारी साँसे चल रही है मतलब तुम्हारा सफ़र जारी है तुम्हे चलना होगा रास्ता न मिले तो घबराना नही खुद रास्ता बनाना पर चलना जरूर।
माँ जाते- जाते मुझे आत्मविश्वास से जीना सीखा गई। मैं अपने कॉलेज एग्जाम में फेल हो गई थी पर दुखी होकर बैठी नही मैंने फिर से तैयारी की फिर एग्जाम दिया इस बार मे पास हो गई कुछ दिन बाद मैं रजनी ताई जोकि माँ की सहेली थी।माँ जहाँ  नौकरी करती थी ताई भी वहीं नौकरी करती थी माँ के बीमार होने पर बहुत साथ दिया था उन्होंने हमारा , वो अकेली थी कोई नही था उनका अपना इसलिए मैं उन्हें घर ले आई। इसके बाद मैंने पार्ट टाइम जॉब जॉइन करली और साथ ही आगे की पढ़ाई करती रही।पर मैं कुछ अलग करना चाहती थी मैंने अलग- अलग तरह के लोगो से मिलना शुरू किया उनकी लाइफ की प्रोबल्स को समझने की कोशिश की , जब उनके जीवन मे कोई दिक्कत या परेशानी होती है तो वो क्या सोचते है उसे लेकर। मैंने सबसे मुलाकातें की शिक्षित अशिक्षति ,स्टूडेंट्स ऑफ़िस वर्कर ,हाउस वाइफ, बिज़नेसमेन ,चिल्ड्रन्स सबको समझने की कोशिश की। ये सब आसान नही था क्योंकि कोई बात करने को तैयार होता और कोई नही भी होता पर मैं हार नही मानती थी मैंने आप के जीवन के सात साल इसी में लगा दिए और इसी बीच मुझे धृति भी मिली मैंने उसे अडॉप्ट कर लिया। मैं अपनी बनाई राह पर चलती गई और कब लोगो के लिए प्रेरक बन गई मुझे पता ही नही चला आज मेरी पहचान एक मोटिवेटर की है। मैं किसी का हाथ पकड़कर उसे चलाना नही चाहती थी मैं बस इतना चाहती थी लोग अपने हौसलों से चलना सीखे। रात आज छोटी हो गई या मैं ही कुछ ज्यादा सोचने बैठ गई 1 बज गये मुझे पता ही नही चला आई को पता चलेगा तो डाँट लगाएँगी मैं और धृति रजनी ताई को आई कहकर बुलाते है आई ही तो है वो हमारे लिए। 
आज फिर एक सैमिनार ,हैलो आई एम विजया शर्मा कोई तुम्हे तराशेगा तुम तभी चमकोगे ये सोचकर मत बैठो तुम खुद , खुदको तराशना शुरू कर दो तुमसे अच्छा तुम्हे कोई और नही निखार सकता। मुश्किलें देखकर तुम कल भले ही लड़खड़ा गए हो पर आज तुम चलना सिख गए हो,  मतलब कल चाहे जैसा भी रहा है जिसका भी रहा हो पर आज तुम्हारा है सिर्फ तुम्हारा।

चंदर मामा





इधर- उधर से लगते धक्के और सड़क के गढ्ढों में बस के गोताखाकर निकल जाने से चंदर के बदन का जो हाल हो रहा था वो बड़ा ही दुख दाई था शरीर का एक - एक पुर्जा जैसे हिल गया हो अगर अब और धक्का लगा तो पक्के में मैं तो यही धराशाई ही हो जाऊँगा खुद पर दया करता हुआ चंदर मन ही मन कह रहा था अपनी अम्मा के लिए तो जैसे - तैसे बस में सीट मिल गई पर बेचारा खुद एक घन्टे से बस में खड़े- खड़े ही यात्रा कर रहा है क्या करे ,  यहाँ के गाँव मे बसें ज़रा कम चलती है और यात्री ज्यादा होते है इसलिए एक ही बस में ढेर सारे यात्री एक साथ सफर करते है। लो फिर से बस रुक गई अरे अब तो पैर रखने की भी जगह नही बची,  इन लोगों को कहाँ बैठाएंगे लग रहा है कि दमघोंट कर दम लेगे ये कन्डेक्टर साहब बुदबुदाते हुए चंदर ने कहा कुछ देर में बस चल पड़ी भीड़ बढ़ने से धक्का- मुक्की बढ़ जानी चाहिये थी पर अभी तक ऐसा हुआ नही क्यों?  सोचते हुए लोगों के बीच फसा हुआ सा खड़ा चंदर अपनी गर्दन को ज़रा बाहर निकालते हुए बस के दरवाज़े की ओर देखने लगा, जो लोग अभी बस में चढ़े है दिख तो नही रहे, छत पर बैठे है कन्डेक्टर ने चंदर की ओर देखते हुए कहा शायद वो समझ गया होगा कि इस तरह परेशान होकर चंदर किन्हें देखने की कोशिश कर रहा है। चंदर ने अपनी गर्दन सीधी कर ली और मन ही मन हँसने लगा। ढाई घंटे के सफर के बाद बस मंजिल तक पहुँच गई। शोभा दीदी के घर आना बड़ी ही हिम्मत का काम है आह! मेरा बदन पूरा अकड़ गया बस से उतरते हुए थोड़ी दर्द भरी आवाज़ में चंदर बोला। वैसे दर्द तन का हो या मन का अपनो को देखकर अक्सर कम हो जाता है अपनी बहन शोभा दीदी और भांजी मिश्री को देखकर चंदर का दर्द भी जैसे  छू हो गया चंदर और अम्मा दोनों बाहर आँगन में ही बैठ गए शोभा दीदी उनसे सफर का हाल पूछने लगी कोई दिक्कत तो नही हुई बस से आने में दीदी ने पूछा चंदर को बस के धक्के याद आ गए नही , नही दीदी कोई दिक्कत नही हुई बड़े आराम से आये है मुस्कुराकर चंदर बोला अब इतने लोगों के सामने क्या कहे कि कितने धक्के खाकर आये है चंदर मन ही मन खुद से बोला। तब तक मिश्री अपने मामा और नानी के लिए शरबत ले आई अरे मिश्री दो दिन बाद तुम्हारी शादी है बिटिया लाओ ये ट्रे हमको दो तुम्हे कुछ करने की जरूरत नही कहते हुए चंदर ने ट्रे खुद के हाथ मे ले ली। हाँ मिश्री अब तुम्हारे मामा आ गए है ना ये सब सम्हाल लेंगे मेहमानों के बीच बैठी शोभा दीदी की बुआ सास ने हँसते हुए कहा उनकी इस हँसी में कहीं न कही तंज भी था तो बस चंदर से कहाँ बर्दाश होता आ गए गुस्से में और पूरे जोश के साथ बोला हाँ, हाँ हम सब सम्हाल  लेंगे आखिर हमारी भांजी की शादी है। 
दो दिन बीत गये और वो दिन आ ही गया जिस दिन मिश्री बिटिया बिदा होकर अपने घर चली जायेगी शादी वाले घर मे अंदर- बाहर आँगन में ,भंडार घर से , मेहमानों के बीच बस एक ही नाम गूँज रहा था चंदर ,अरे बेटा चंदर , चंदर भईया , चंदर मामा कहाँ है इधर आइये जब से चंदर मामा आये है सबके सब चंदर को कोई न कोई काम दिए जा रहे थे साँस लेने की भी फुर्सत नही मिल रही थी बेचारे को। चंदर टेंट वालो को बता दिया कहाँ लगाना है टेंट जीजाजी बोले हाँ जीजाजी बता दिया, अरे चंदर वो भंडार घर से सामान उठवाकर रसोईघर मे पहुँचवाया के नही दीदी ने कहा हाँ दीदी रखवा दिया है सब , चंदर बेटा वो मेहमानों के लिए सामने वाले घर मे व्यवस्था कराई के नही मीठे शब्दो मे बुआजी ने पूछा चंदर ने थोड़े अकडिले अंदाज कहा जी करा दी है कुछ कमी- वमी रह गई हो तो ढूंढ ले क्या बुआजी ने आँखे बड़ी करते हुए कहा मेरा मतलब है कि कुछ और रह गया हो तो बता दें वो भी कर दे देंगे चंदर बोला। इतने में मिश्री ने आवाज़ लगा दी मामा, बस चंदर दौड़ पड़ा। यहाँ से वहाँ , वहाँ से यहाँ किसी रेस के घोड़े की तरह दो दिनों से चंदर दौड़े ही तो जा रहा है जिसे कहीं रुकना नही है बस दौड़ते जाना है जब तक कि मिश्री की शादी ना हो जाये। हाँफता हुआ चंदर मिश्री के पास जा पहुँचा हाँ मिश्री मामा गजरा ले आये मिश्री ने पूछा यहाँ- वहाँ दौड़- दौड़कर चंदर का गला सुख गया था इसलिए कुछ बोल नही पा रहा था तभी पानी का गिलास लिए एक हाथ चंदर की ओर बढ़ा चंदर ने झट से गिलास लेकर एक साँस में सारा पानी गटक लिया धन्यवाद चंदर ने झुमकी से कहा अरे धन्यवाद क्यों कह रहे है आप इतना काम कर रहे हो तो क्या मैं इतना भी नही कर सकती अपने चेहरे को  मटकाते हुए झुमकी बोली। झुमकी मिश्री की बुआ की देवरानी की बहन है उनके साथ ही शादी में आई है। चंदर कुछ बोला नही पर झुमकी की बात सुन काम करके मुरझाई सी उसकी शक्ल किसी सूरजमुखी के फुल की तरह खिल उठी मामा अब तो बता दो गजरा लाये की नही मिश्री बोली , हाँ लाया हूँ ना यही तो ला रहा था पर बुआजी ने रोक लिया कहते हुए चंदर ने गजरे मिश्री के हाथ मे दे दिये। पर ये तो ज्यादा है मैंने तो दो ही मंगाये थे मिश्री मामा को देखते हुए बोली, अच्छा चंदर ने अनजान बनते हुए कहा शायद ध्यान नही रहा होगा कितने लाने थे ऐसा करो तुम्हें जितने चाहिए रखलो बाकी दे दो किसी को कहते हुए चंदर मामा की नजरें तब झुमकी की ओर ही थी इसके बाद चंदर वापस से शादी के काम में पूरे जोश के साथ लग गया ये तो होना ही था अब इतनी अच्छी प्यारी भोली भाली झुमकी जी ने पानी जो पिलाया है तो चंदर पर असर तो होना ही था गिलास में पानी तो सादा ही था पर चंदर केे लिये वो किसी गुुुलाब के शरबत से कम नही था वैसे चंदर जो दो दिनों से दौड़- दौड़कर इतने अच्छे से शादी का काम सम्हाल रहा है उसका आधा श्रेय झुमकी को भी जाता है क्योंकि जब भी शादी के कामों के बीच चंदर ज़रा भी अलसा जाता या बेमन से कोई काम कर रहा होता और उस बीच झुमकी कहीं आस-पास दिखाई दे जाती तो चंदर के अलसाये से मन में अचानक ही बिजली दौड़ जाती जैसे किसी ऊर्जा का संचार हो गया हो। और चंदर किसी फिरकनी की तरह घूम - घूमकर काम करने लगता।कल शाम तो चंदर थककर चूर ही हो गया था एक तो पहले जीवन भाईसाहब जोकि चंदर के जीजाजी के छोटे भाई है उनके साथ बाजार जाना पड़ा वो बाजार में दुकानदार से  सामान तो कम ले रहे थे पर बहस ज्यादा कर रहे थे और सारे  बाजार में इतना घुमाया इतना घुमाया की चंदर का तो सिर ही घूम गया। मुझे लगता है भाईसाहब अब हमें घर चलना चाहिए क्योंकि अब हम और चलें ना तो यही चक्कर खाकर गिर जाएंगे चंदर ने कहा। बाज़ार से आकर चंदर ने घर में पैर ही रखा था कि शोभा दीदी ने कपड़े लेने दर्जी के पास पहुँचा दिया जैसे - तैसे चंदर दर्जी से कपड़े तो ले आया पर उसके पैरों ने जैसे हड़ताल कर दी कि अब तो बिल्कुल भी नही हिलेंगे। इसलिये चंदर थककर आँगन में ही बैठ गया अभी वो बिल्कुल भी नही चाहता था की कोई उसे किसी तरह का भी काम बताये। लेकिन बेचारा काम के बोझ का मारा सबके होते हुए भला कैसे चैन से बैठ सकता है। मामा, मिश्री ने कहा चंदर ने देखा तो मिश्री झुमकी के साथ खड़ी थी बड़े ही प्यार से मिश्री अपने शब्दो मे भी मिश्री घोलते हुए बोली मेहंदी खत्म हो गई है बाकी सबने तो लगा ली पर झुमकी दीदी के लिए नही बची, मामा मेहंदी लादो ना मिश्री ने थोड़ा सा ज़िद करते हुए कहा।अब किसी और कि बात होती तो इतनी थकान के बाद चंदर ना भी कह देता पर झुमकी के लिए न कह पाना ये तो चंदर के बस में था ही नही। सबके हाथों में मेहंदी होगी और झुमकी के हाथ बिना मेहंदी के रह जाएंगे कितना बुरा लगेगा न उसे सोचते हुए चंदर तुरन्त उठा और मेहंदी ले आया।इसलिए तो अभी चंदर जब मिश्री को गजरा दे रहा था तब  चुपके से झुमकी के हाथों की तरफ भी एक बार देख लिया था आख़िर उसने मेहंदी जो लाकर दी थी तो उसे ये जानना जरूरी है की उसकी लाई हुई मेहंदी हाथों पर लगाई गई भी या नही। चंदर के बेचैन मन को गर्मी में खाये हुए बर्फ के गोले जैसी ठंडक तब महसूस हो गई जब उसने झुमकी के हाथों में लगी मेहंदी देख ली लड़के का मन खुश हो गया थके होने के बावजूद बाजार जाकर मेहंदी लाने में जो मेहनत हुई वो सफल हो गई। शादी वाले घर मे यूँ तो पूरे वक्त ही अफरा- तफरी रहती है लेकिन जिस दिन बारात दरवाज़े पर आने वाली हो उस दिन तो जैसे सबकी जान गले मे अटकी सी रहती है। चंदर ने शाम तक सारी व्यवस्था बढ़िया तरह से ली थी आँगन में मंडप भी लग गया था वरमाला का स्टेज भी तैयार था मेहमानो के लिए कुर्सी भी लगवा दी गई थी और बारातियों के स्वागत के लिए भी सारा इंतज़ाम हो गया था सब चंदर को देख उसकी तारीफ कर रहे थे अपनी भांजी की शादी में कितना खुश होकर और मन लगाकर काम रहा है चंदर। खुशी तो चंदर के चेहरे पर बहुत दिख रही थी पर कौन जाने ये मिश्री की शादी की ज्यादा है या झुमकी के हाथों में लगी मेहंदी की जिसका रंग उसके हाथ पर आया हो या ना हो पर चंदर के मन पर काफी अच्छे से चढ़ गया। शादी हँसी- खुशी से सम्पन्न हो गई और समय विदाई का हो आया सभी की आँखों मे आँसू भर गये शोभा जीजी, बुआजी अम्मा, मिश्री सबने जोर- ज़ोर से रोना शुरू कर दिया। चंदर का मन भी सबको देख भावुक हो गया पर झुमकी को रोते देख मन जैसे दुखी हो गया कितनी कोमल है झुमकी ज़रा सा रोने पर नाक कैसे टमाटर की तरह लाल हो गई है आँखों का काजल भी आँसू के साथ बेह गया और उसे पता भी नही चला कैसे छोटे  बच्चे की तरह रो रही है बेचारी, जैसे मिश्री नही खुद झुमकी की अम्मा उसे छोड़कर कहीं जा रही हो। चंदर मन ही मन झुमकी को देखते हुए सोच रहा था बड़ी फिक्र हो रही थी उसे झुमकी की। बिदाई हो गई और मिश्री अपने ससुराल चली गई सब अपने - अपने काम मे लग गये और कुछ मेहमान जो दूर के थे वो अपने घर चले गए। और चंदर वो तो एक कोने में बड़ा उदास हुआ बैठा था अम्मा उसे समझाए जा रहीं थी तू इतना दुखी क्यों हो रहा है बेटा, सभी लड़कियों को एक दिन ससुराल जाना होता है तेरी दीदी भी तो आई थी न बिदा होकर।अब तू मिश्री को इतना भी याद मत कर नही तो मुझे भी फिर से रोना आ जायेगा अम्मा ने कहा तो चंदर डर गया कि कहीं सच मे अम्मा फिर से न रोने लग जाए क्योंकि उन्हें चुप करा पाना चंदर के लिए किसी चुनौती से कम नही होगा, नही अम्मा हम ठीक है चंदर घबराते हुए तुरन्त बोला। अब अम्मा को कौन समझाये की चंदर को मिश्री की नही बल्कि झुमकी की याद आ रही है मिश्री की बिदाई के बाद जो दूर के मेहमान चले गए उनके साथ वो भी तो चली गई ना।अगले दिन चंदर और अम्मा घर जाने के लिए अपना सामान लिए आँगन में खड़े थे बच्चे चंदर को देख आपस मे बात कर रहे थे मिश्री दीदी की शादी में कितने खुश लग रहे थे चंदर मामा और अब कितने उदास लग रहे है , हाँ उन्हें मिश्री दीदी की बहुत याद आ रही है। बच्चों की ये बातें चंदर को भी सुनाई पड़ रही थी बचपन मे जब चंदर कागज की नाँव बनाकर पानी मे चलाता था और वो डूब जाती थी तो उसके दोस्त उसे चिढ़ाते थे चंदर की नाँव डूब गई चंदर की नाँव डूब गई अभी इन बच्चों की बातें भी चंदर को कुछ वैसी ही सुनाई दे रही थी मानो ये भी उसे चिढ़ा रहे हों। अब चंदर और अम्मा बस में बैठ गए थे बस अभी भी भीड़भरी ही थी इसलिए चंदर को अभी भी आस- पास के लोगो के धक्के लग रहे थे पर अभी इन धक्कों का कोई असर चंदर पर नही हो रहा था, क्योंकि उसके मन को जो इतना बडा धक्का लग गया था दो दिन में सपनो का जो महल अभी आधा भी नही बना था वो उसके पहले ही टूट गया तो इन लगने वाले धक्कों का भला क्या असर होगा चंदर पर, चंदर दुखी मन से यही तो सोच रहा था कि भी तभी बस किसी गढ्ढ़े में जा कूदी अई कमर लचक गई किसी की आवाज़ आई, बस गढ्ढ़े से बाहर निकल थोड़ी आगे बढ़ी की तेज़ ब्रेक लग गया आह! अरे ड्राइवर भईया कैसे बस चला रहे हो हमे सुरक्षित गाँव पहुँचना है क्या कमर तोड़कर ही दम लोगो चंदर चिल्लाया, लगता है चंदर मामा को फिर से बस के धक्कों का असर होने लगा है।

 

एक चुटकी प्रेम

मार्च बित गया था ठंड के नख़रे अब कम हो गए थे कम क्या यूँ कहें कि अब खत्म ही हो गये थे सूरज के तीखे तेवर जो शुरू हो गये थे। अब गर्मागर्म पकोड़े...

Sonal bhatt MULAKAT-KAHANIYO-SE STORY OF OUR LIFE