ख़ैरियत


सुबह का सूरज अपने साथ सिर्फ एक नये दिन को ही नही लाता है वो कुछ नये रास्ते भी लाता है, वो रास्ते जिनसे मन पूरी तरह अनजान होता है उस पर कैसे चलना है ये उसे मालूम नही होता। अपने घर की छत पर खड़े हुए मैं सूरज को निकलते हुए देख रही थी रोज़ सुबह सूरज के निकलने से पहले ही मैं छत पर आकर आसमान की ओर देखने लगती हूँ और इंतज़ार करती हूँ सूरज के निकलने का। अच्छा लगता है मुझे सुबह के सूरज को देखना और उसे देखते रहना तपस की तरह। जब हमारी किसी से मुलाक़ात होती है तो कुछ देर हम उससे बात करते है साथ मे थोड़ा वक्त बिताते है और अपने - अपने रास्ते लौट जाते है ये सोचकर कि मुलाक़ात खत्म हो गई पर क्या वाकई ऐसा होता या फिर कुछ रह जाता है। सुबह का उजाला चारो ओर फैल गया था और मेरे अलावा अब घर के बाकी लोग भी जाग गए थे। वनिका नीचे आ जाओ बेटा। पता था मुझे की अब माँ आवाज़ लगाने वाली होंगी इसलिए मैं पहले ही सीढ़ीयाँ उतरने लगी और माँ के पास जा पहुँची पैकिंग हो गई चाय का कप देते हुए माँ ने पूछा हाँ माँ सब हो गया फिर भी एक बार और दोबारा सब देखलो ओके माँ कहते हुए मैंने माँ का हाथ थाम लिया आप फिक्र मत करो माँ मैं अपना ख्याल रखूँगी और सुरभि भी तो है ना वहाँ। माँ ने प्यार से मुझे देखते हुए पलके झपका दी। शाम के 7 बज रहे थे मैं ट्रेन में बैठे हुए माँ और पापा को देख रही थी जो मुस्कुराते हुए मुझे बाय तो कर रहे थे पर उनके माथे पर फिक्र की लकीरें मुझे साफ नज़र आ रही थी हर माता-पिता को अपने बच्चों की फिक्र होती है और मैं तो उनसे दूर जा रही थी तो फिक्र और भी ज़्यादा थी। ट्रेन चल पड़ी थी और मैं नये रास्ते की ओर बढ़ गई थी। सफर थोड़ा लम्बा था इसलिए वक्त काटने के लिए मैं अपना लैपटॉप ऑन करके बैठ गई और फोटोज़ देखने लगी। घर की,  फ़ैमिली की , फ्रेंड्स ,कॉलेज , पिकनिक,  सुरभि की मैरिज की और भी ढेर सारी कई फोटोज़ थी मेरे पास जिन्हें मैं बस एक झलक देखते जा रही थी लेकिन एक फोटो ऐसी भी थी जिस पर मेरी नज़र जरा ठहर गई। इस फोटो में वॉटर फॉल के पास मैं सुरभि ,अनुभव , और तपस एक साथ खड़े है और ये फोटो मयूरी ने ली थी। बहुत ज़िद करके सुरभि मुझे अपने साथ पचमढ़ी ले गई थी मैं तो तेरे कॉलेज फ्रेंड्स को जानती भी नही हूँ मैं अलग थलग महसूस करूँगी मैंने कहा तो सुरभि ने विश्वास दिलाते हुए कहा ऐसा कुछ भी नही होगा तुझे चलना ही पड़ेगा। फाइनली हम 6 लोग ट्रिप के लिए निकल ही गये पंचमढ़ी पहुँचते हुए रास्ता बड़ा ही खूबसूरत लगा ऊँचे - ऊँचे पहाड़ ख़ामोश घने जंगल जो कि हवा के कम ज्यादा होने पर थोड़ा लह-लहाते और फिर खामोश खड़े हो जाते जंगलो को देखते हुए शाम तक हम पचमढ़ी पहुँच गये और एक रिजॉर्ट में जाकर ठहरे। अपने ट्रिप के पहले दिन हम जटाशंकर , बडेमहादेव और भी कई धार्मिक स्थलों पर गए सुरभि पूरे दिन मेरे साथ- साथ ही रही वैसे सुरभि के फ्रेंड्स अच्छे है लेकिन फिर भी मेरे अंदर थोड़ी झिझक सी रही। अगले दिन हम प्रियदर्शनी पॉइन्ट पर थे सुरभि के फ्रेंड्स हमसे थोड़ा दूर खड़े फ़ोटो क्लिक कर रहे थे मैं सुरभि और अनुभव के साथ थी लेकिन मैं फिर उनसे थोड़ा दूर जाकर खड़ी हो गई कुछ दिनों में दोनों की शादी होने वाली है ये पल इन दोनों के लिए खास है और मैं नही चाहती कि मेरी वजह से वो इन पलों को खो दे। मैं हरे - भरे पहाड़ों को देख रही थी अच्छा नज़ारा है कहते हुए  तपस मुझसे कुछ दूर आकर खड़े हो गया और अपने मोबाइल में फ़ोटो क्लिक करने लगा साथ ही वो मुझसे बातें भी करता जा रहा था और मैं हाँ हूँ में जवाब देती जा रही थी। काफी जगह घूमने के बाद लास्ट में हम धूपगढ़ पहुँचे सनसेट देखने आसपास केसरी बादलो के बीच मे पीला तेज चमकता हुआ सूरज जिससे आसमान दमक उठा था और उसकी रोशनी सुनहरी होकर हम पर पड़ रही थी वाकई ये बहुत खूबसूरत था। सभी खामोशी से अस्त होते सूरज को देख रहे थे।आज का दिन थका देने वाला रहा रात को सुरभि और अनुभव गार्डन एरिया में साथ टहल रहे थे मयूरी जिगर तपस और मैं हम चारो साथ बैठे बातें कर रहे थे मैं सुबह यहाँ से जो वो पास में माउंटेन है वहाँ जाने वाला हूँ सनराइज़ देखने तुम सब चलोगे तपस ने पूछा मयूरी और जिगर ने पहले एक दूसरे की ओर देखा और बोले हम इतनी जल्दी सुबह नही उठ पाएंगे तपस की नज़रें अब मेरी तरफ थी वैसे मुझे खुद भी सुबह जल्दी जागने की आदत नही है पर फिर मैंने ओके कह दिया। सुबह तपस और मैं माउंटेन की ओर जा रहे थे मुझे तो लग रहा था जैसे मैं नींद में ही चल रही हूँ क्या जरूरत थी मुझे हाँ कहने की सुरभि भी नही आई साथ बस मुझे ही देखना था सनराइज़ सोचते हुए मैं तपस के पीछे- पीछे चल रही थी कुछ देर बाद तो मैं एक जगह रुक ही गई तपस ने मुझे मुड़कर देखा मेरे पास आया और मेरा हाथ पकड़ कर चलने लगा यहाँ एक लिफ्ट होनी चाहिए थी तपस बोला,  क्यों मैंने पूछा कुछ लोगो के लिए आसान हो जाता ना ऊपर तक पहुँचना बस इसलिए हँसते हुए तपस बोला। बातें करते हुए हम ऊपर आ पहुँचे लाल दिख रहे आसमान पर पीली रोशनी चमक रही थी जो धीरे- धीरे बढ़ती जा रही थी कुछ हल्का सा सूरज नज़र आ रहा था कुछ देर में बहुत तेज़ रोशनी के साथ चमकता हुआ सूरज बादलों से बाहर निकल आया ऐसा लगा जैसे उसने अपनी रोशनी की चादर फैला दी हो और सब कुछ रोशन हो गया हो, सूरज के रोशनी बिखरते ही पक्षियों की चहचाहट शुरू हो गई थी। मैं और तपस खामोश बैठे हुए इस खूबसूरत सुबह को देख रहे थे। ये मेरे लिए एक अलग एक्सपीरियंस है मैंने पहली बार सूरज को अपनी किरणें बिखेरते हुए देखा कहते हुए मेरी आँखों मे चमक सी आ गई, मैं रोज़ देखता हूँ तपस ने कहा। हम रिजॉर्ट वापस आ गये आज के दिन के प्लानिंग के मुताबिक जो जगह घूमने के लिए रह गई थी हम वहाँ घूमे और फिर अगले दिन घर वापसी के लिए निकल गये पचमढ़ी जाते वक्त जो मेरे लिए अजनबी थे वो घर लौटते वक्त मेरे दोस्त बन गए थे। 

 ट्रेन की आवाज़ से मेरा ध्यान जरा टूटा ट्रेन स्टेशन पर आकर रुकी हुई थी अभी कुछ घंटे और बाकी थे मेरे दिल्ली पहुँचने में।मैंने लेपटॉप बंद करके रख दिया और कुछ देर बाद मेरी आँख लग गई। सुबह मैं दिल्ली स्टेशन पर थी सुरभि मुझे लेने आने वाली थी पहले मैं सुरभि के साथ उसके घर गई उसकी फैमली से मिली और कुछ देर वहाँ रुकने के बाद फाइनली मैं अपने फ्लैट पर आ गई सुरभि के घर से कुछ दूर ही मेरा फ्लैट है मैंने ही सुरभि को कहा था कि वो आसपास ही मेरे लिए फ्लैट देखे।  नया शहर नई जगह और नई सुबह के साथ आज मेरे दिन की शुरुआत हुई नये ऑफ़िस में नये कलीग्स के साथ मुझे अच्छा लगा। लगा ही नही के आज यहाँ मेरा पहला दिन है। दिल्ली की रौनक मेरे शहर से अलग है सोचते हुुुए बाल्कनी में खड़ी हुुुई मैं पूरे शहर को देेेखने की कोशिश कर रही थी सुबह का सूरज दस्तक दे रहा था मैं इस सुबह को देख रही थी किसी की आवाज़ अभी- अभी मेरे कानों में पड़ी मैंने आसपास देखा बगल वाली बिल्डिंग में मेरे सामने वाली जो बाल्कनी दिख रही है शायद कोई है वहाँ ,सूरज की रोशनी जब उस शख्स पर पड़ी तो चेहरा साफ नज़र आया जोकि तपस का था। तपस को देख ऐसा लगा जैसे कुछ छूटा हुआ आज अचानक फिर मिल गया हो। उसने इशारे में मुुस्कुराते हुुुए हेलो कहा तो मैैंने भी बस उसे हाय कह दिया इतने वक्त बाद अचानक मुलाकात होनेे पर क्या कहूँ क्या बात करूं मुझे कुुुछ समझ नही आ रहा था बस मेरी नजर ठहर गई कुुुछ पल तपस पर। घड़ी की सुुुई के साथ दौड़ना आसान नही होता पर मैं दौड़ रही थी और ऑफिस के लिये तैयार हो रही थी लेकिन मेरे मन मे कुुुछ चल रहा था तपस वो यहां कैसे ? ऑफ़िस जाते वक्त भी ये सवाल मेरे अंदर चल रहा था मैं बिल्डिंग से बाहर आई तो तपस अपनी बाइक से टिककर खड़ा नज़र आया मुझे देखते ही मुस्कुराया मैं ड्रॉप कर दूँ तपस ने कहा,लेकिन मेरा ऑफिस तो मैंने कहा तो मेरी बात को बीच मे रोकते हुए तपस बोला हाँ मुझे पता है अभी तुम नई हो शहर में इसलिए कुुुुछ दिनों तक मैं ही तुम्हे ड्राप करूँगा ओके। न कहूँगी तो क्या ये बुरा मान बैठेगा सोचते हुए मैं गाड़ी पर बैठ गई। पूरे रास्ते तपस ने कोई बात नही की और ना ही मैंने वनिका हाँ हम पहुँच गये मैं झट से बाइक से उतर गई बाय कहकर वो चला गया। अभी मुझे प्रियदर्शनी पॉइन्ट याद आ गया तपस मयूरी और जिगर के साथ फोटोज़ क्लिक कर रहा था मैं अकेेली खड़ी पहाडों को देेेख रही थी तब तपस मेरे बगल में आकर खड़ा हो गया वो भी बिना ये जताए की मैं खुद को अकेले फील ना करूँ बस इसलिए तपस मेरे साथ खड़ा है लेकिन मैं समझ गई थी। और ये भी की तपस को परवाह है उनकी ही नही जिनसे उसका रिश्ता है उनकी भी जो उसके कुुुछ नही लगते।शाम को सुुरभि से बात हुुुई बताया उसने की तपस तो पिछले दो साल से यहाँ है और सुुरभि के कहने पर उसी ने ये फ्लैट देखा था मेरे लिए।                                  

 कुछ दिन बाद अपने ऑफ़िस आने-जाने के लिए मैंने टैक्सी का इंतज़ाम कर लिया और तपस को भी बता दिया। वैसे क्योंकि हम एक ही कॉलोनी में रह रहे है तो हमारी मुलाकातें और बातें होती रहती है। और कभी - कभी हम अपनी - अपनी बाल्कनी में खड़े होकर ईशारों से भी बात कर लेेेते है और जब बात समझ ना आये तो कॉल कर लिया करते है वैसे भी तपस हमेशा सिर्फ इतना ही बोलता है हाय, हेलो ,ऑफ़िस में सब कैसा चल रहा है कुछ न्यू फ्रेंड्स बने , ये फ्लैट ठीक लगा तुम्हें बस कुछ ऐसी ही बातें करता है।पर अच्छी लगती है मुझे उसकी ये सादी बातें और उन बातों में कहीं न कहीं मेरी फिक्र। वक्त हमेशा आगे चलता चला जाता है और उसके साथ हम भी आगे बढ़ते जाते है। 6 महीने बीत गए मुझे यहाँ आये,अब ऑफ़िस के कलीग्स से भी थोड़ी दोस्ती हो गई थी मेरी और जो दूर के दोस्त थे अब थोड़े करीब के हो गए थे हाँ अब तपस पहले से थोड़ी ज़्यादा बातें करने लगा था कभी - कभी अपने मन की बातों को मुुझसे कहने लगा था और मेरा झुकाव तपस की तरफ पहले से और भी ज्यादा हो गया था बाल्कनी में खड़े रहकर उसके बाल्कनी में आने का इंतजार करना हर छोटी- छोटी बात उसे बताने के लिए बेसब्र रहना ,सुरभि मेरे साथ नही जा पाएगी बिज़ी है वो कहकर मेरा उदास होकर बैठ जाना और फिर तपस का मेरे साथ चल देना, किसी सुुुबह अगर वो बाल्कनी में नजऱ न आये तो लगे जैसे सुुुुबह हुुुई ना हो मेरी। ये किस राह पर चल पड़ी थी मैं जिसकी कोई मंजिल थी ही नही। कल सुरभि की मैरिज एनिवर्सरी है मैं सारी ड्रेसेस निकालकर बैठी हुई थी तभी तपस का कॉल आ गया वनिका कहीं बाहर हो नही मैं घर पर ही हूँ कहते हुए मैं बाल्कनी मैं जा खड़ी हुई अब मैं और तपस एक दूसरे को देखते हुए फोन पर बात कर रहे थे तपस के पूछने पर मैंने अपनी प्रॉब्लम उसे बताई ओके तुम अपनी ड्रेसस मुझे दिखाती जाओ मैं हेल्प करता हूँ तपस ने कहा मैं एक बाद एक ड्रेस तपस को दिखाती गई तुमने कभी साड़ी ट्राय की है तपस ने पूछा। मैने कहा नही, तो वो ट्राय कर लो। पर कौनसा कलर सूट होगा मुझ पर मैंने पूछा तपस ज़रा सोचने लगा फिर बोला ब्लैक मुझे मन ही मन हँसी आ गई दरसल ब्लेक कलर मुझे ज्यादा पसंद नही है। अगली शाम तपस गाड़ी के पास मेरा वेट कर रहा था ब्लैक साड़ी पहने मैं सीढ़ीयाँ उतर रही थी ये साड़ी पहनकर चलना कितना मुश्किल होता है बड़बड़ाते हुए मैं एक - एक कदम बहुत होले से रख रही थी तभी अचानक तपस ने आकर मेरा हाथ थाम लिया और मेरे साथ सीढ़ीयाँ उतरने लगा मुझे पचमढ़ी ट्रिप का वो दिन याद आ गया जब चलते हुए मैं रुक गई थी और तपस मेरा हाथ पकड़कर चलने लगा था।गाड़ी में बैठने से लेकर सुरभि के घर पहुँचने तक मैं यही सोचती रही क्या तपस से पूछूँ एक बार की मैं कैसी लग रही हूँ फिर सोचा रहने दो एक बार भी गौर से देखा ही कब उसने मुझे जो कुछ कहे। इतने पास रहते हुए भी मैं सुरभि से कितने दिनों बाद मिल रही थी सुरभि मुझसे बातें किये जा रही थी लेकिन फिर भी मेरा ध्यान तपस पर था वो ज़रा दिखाई नही देता तो मेरी नज़रे उसे ढूंढने लगती जबकि उसकी नज़र एक बार भी मुुुुझ तक नही आई। पार्टी मेंं जाते वक्त मैंं जितनी खुश थी लौटते वक्त उतनी ही खामोश तपस शायद समझ गया था कि मेरा मुड़ ऑफ है वनिका पार्टी में कुछ हुआ क्या तपस ने पूछा , नही कहते हुए मैंने अपनी नजरें तपस से फेर ली। रात को आँखों से नींद जैसे कहीं दूर टहलने निकल गई हो कोशिश करने के बावजूद मुझे नींद नही आ रही थी एक तरफा प्यार शायद ऐसा ही होता है मन ही मन किसी को चाहते रहो और वो पूरी तरह अंजान हो आपके एहसासों से और दिल मे जगह बनाती ख्वाइशों से। मेरी आँखें थोड़ी नम हो गयी थी अभी एक सवाल था जो दर्द बनकर चुभ रहा था मुझे क्या तपस की आँखों में मुझे वो कभी नज़र नही आयेगा जो मैं देखना चाहती हूँ पाँच साल पहले जब मैं पहली बार तपस से मिली थी तब भी तपस ऐसा ही तो था अपने मे ही गुम और आज भी शायद ऐसा ही है कुछ खबर नही उसे। दो-तीन दिनों तक मैंने तपस से ठीक से बात नही की नाराज़ थी मैं उससे।लेकिन ये नाराज़गी ज्यादा वक्त तक चल न सकी। शाम को माँ का कॉल आया उनसे बात करते हुए मैं बाल्कनी में आ पहुँची कानों में एयरफोन लगाये तपस अपनी बाल्कनी में टहल रहा था शायद गाने सुन रहा था इसलिये चेहरे के अलग- अलग एक्सप्रेशन बनाये जा रहा था उसे ऐसे देेेख मुझे हँसी आ गई तपस की नज़र मुझ पर पड़ी तो वो मुस्कुराकर दिया फिर मैं भी ज़रा सी मुस्कुरा दी। काश मन को बांधने के लिए भी कोई रस्सी होती तो कमसे कम अपने मन को किसी की ओर जाने से रोक तो पाते और ज़रा जो अपने से ही हम रूठकर बैैठे थे तो रूठे तो रह पाते मगर ऐसा ना हो सका। माँ से बात करने के बाद मैं तपस के बारे में सोच रही थी मैं भी कितनी नासमझ हूँ किस से नाराज थी जिसे पता ही नही की मैं उससे ख़फा हूँ जब  उठती लहरों की उसे कोई खबर नही हुई तो उन लहरों के शांत हो जाने का भला उसे क्या पता चलेगा। चार दिन की नाराज़गी के बाद अब सब पहले जैसा ही था अच्छे दोस्त की तरह हाय हैलो करना यहाँ - वहाँ की बातें करना किसी बात पर साथ हँसना - मुस्कुराना और मेरा मन ही मन उसे चाहना और उम्मीद करना कभी तो पूछे ये मेरे मन का हाल मेरी खैैैरियत। सब ऐसे ही चलते रहा और 1 साल बीत गया और मेरे वापस लौटने का वक्त आ गया। कटनी से दिल्ली मैं 1 साल के लिए ही तो आई थी अपने सामान के साथ मैं बिल्डिंग से बाहर निकली तो सुरभि और अनुभव दिखाई दिये वो मुझे बाय कहने आये थे कुछ देर बाद तपस गाड़ी लेकर आ गया और हम स्टेशन के लिए निकल गए। आज भी मुझे वैसा ही लग रहा है जैसा पचमढ़ी से लौटते वक्त लग रहा था ये रास्ता और लंबा हो जाये, वक्त की चाल ज़रा धीमी पड़ जाये और सफ़र बस चलता जाये। पाँच साल पहले जो आँखों मे रह गया था वो आज दिल में उतर गया है तब मैं खुद कुछ समझ नही पाई और आज चाहते हुए भी कुछ कह नही पाई बस लग रहा है कि कुछ छूट रहा है कुछ है जो अधुरा रह गया। हम फ्लेटफॉर्म पर थे ट्रेन कुछ देर में आने वाली थी हम बैैैठकर इंतजार कर रहे थे तपस को कह दूँ के नही कहूँ शायद कह देना चाहिये नही कहूँगी तो हमेशा ये अफसोस रहेगा कि काश कह दिया होता मैं हाँ ना में उलझी हुई एक तरफ अपने हाथ में पकड़ी हुुुई ट्रेन की टिकट को देख रही थी और दूसरी ओर तपस को , पानी की खाली बोतल लेेकर जब तपस मेरे पास से उठा तो मैंने कसकर उसका हाथ पकड़ लिया वो हैरान होकर मुझे देेेखने लगा क्या हुुुआ वनिका तुम ठीक हो कहते हुए तपस वापस मेरे पास बैठ गया तुम किसी बात से परेशान हो? अगर तुम चाहो तो अपने मन की बात मुुझसे कह सकती हो मैं हूँ तुुुुुम्हारे साथ तपस कह रहा था अपनी खामोश नज़रों से मैं बस तपस को देेखे जा रही थी शायद ये आख़री पल है मेरा तपस के साथ ये सोचते हुुुए मैं बोल पड़ी एक साल में जो नही कह सकी कभी एक सांस में आज वो सब कह दिया बस आँखें ज़रा नम हो गयीं।      

  धीमे- धीमे अंधेरे में आहिस्ते - आहिस्ते अपनी रोशनी को फैलाते हुए बादलों में छिपा सूरज निकल आया उसकी तेज़ चंचल किरणें हमारे चेहरे पर चमक रही थी तपस का हाथ थामे हुए मैं इस खूबसूरत सुबह को देख रही थी और तपस मुझे।

एक चुटकी प्रेम

मार्च बित गया था ठंड के नख़रे अब कम हो गए थे कम क्या यूँ कहें कि अब खत्म ही हो गये थे सूरज के तीखे तेवर जो शुरू हो गये थे। अब गर्मागर्म पकोड़े...

Sonal bhatt MULAKAT-KAHANIYO-SE STORY OF OUR LIFE