ज़रा ठहरो तुम क्या नये आये हो हमारी बिल्डिंग में आंटी ने डराने वाले अंदाज़ में पूछा।जी मैंने कहा। अच्छा किस फ्लोर पर है तुम्हारा फ्लैट जी थर्ड फ्लोर पर ओह मेरा फोर्थ फ्लोर है ज़रा ये सामान ऊपर ले जाने में मेरी हेल्प कर दो बेटा बड़े मीठे से अंदाज़ में आंटी ने कहा मेरा मन तो नही था पर फिर मैंने उनकी मदद कर दी। वैसे बेटा नाम क्या बताया तुमने अपना जी अनघ बड़ा अच्छा नाम है और तुम भी अच्छे लड़के हो।निम्मी आंटी की वजह से ही सबको मेरा नाम मालूम हुआ और ये भी की मैं अच्छा लड़का हूँ और तब से ही निम्मी आंटी किसी न किसी काम में मुझसे हेल्प लेती रहती थी और मजबूरन मुझे हेल्प करनी पड़ती थी क्योंकि अच्छा लड़का जो था मैं।
जब एक पँछी नई- नई उड़ान भरना सीखता है तो वो अपनी पहली उड़ान में ही आकाश तक नही पहुँच पाता कभी वो थोड़ा - थोड़ा ऊपर उड़ता है और कभी डगमगा कर गिर भी जाता है अभी मेरा हाल भी ऐसा ही था अपने सपनों की उड़ान भरते हुए मैं कभी थोड़ा ऊपर तक पहुँच जाता और कभी गिर भी जाता शुरू के दो साल मेरे लिए बहुत मुश्किल भरे रहे। माँ और पापा भले ही कानपुर में थे पर उन्हें मेरी फिक्र लगी रहती थी लेकिन निम्मी आंटी की वजह से ये फिक्र थोड़ी कम हो गई थी बहुत अच्छी है निम्मी आंटी , ख्याल रखतीं थी वो मेरा बिल्कुल मिंटू के जैसा। निम्मी आंटी का बेटा मिंटू उम्र में भले ही 12 साल का था लेकिन दिमाग़ उसका किसी 15 साल के लड़के की तरह था हर बात में दो कदम आगे। वैसे वक्त के साथ धीरे - धीरे आगे तो मैं भी बढ़ रहा था पर अभी अपनी मंजिल से दूर था। हमारे कल में क्या होने वाला है हमे कहाँ पता होता है हम जैसा सोचते है जैसा चाहते है वो उससे अलग होता है और हम उससे अनजान। वो सर्दी की सुबह थी मैं मॉर्निंग वॉक पर निकला था ठंड वाली सुबह की ठंडी- ठंडी हवा जैसे- जैसे मेरे हाथों से टकराती मेरे शरीर मे कपकपी सी छा जाती और मैं थोड़ा सा ठिठुर जाता पर अच्छा लग रहा था मुझे ऐसे ठिठुरना। अनघ भईया रुको तो मिंटू ने आवाज़ लगाते हुए कहा तुम रोज़ देर से ही क्यों आते हो वॉक पर जल्दी उठा करो ना अरे तुम लोगो की वजह से मेरा रूटीन ही बिगड़ जाता है मैंने थोड़ा खीजते हुए बोला मत रुका करो हमारे लिए हम थोड़ी कहते है पंखुड़ी ने मुँह बिगाड़ते हुए कहा। अच्छा अब चलें कहते हुए मिंटू हमारे आगे चल दिया और मैं और पंखुड़ी उसके पीछे - पीछे। पंखुड़ी निम्मी आंटी की भतीजी है अपनी इंटर्नशिप के लिए यहाँ आई हुई है हम दोनों की ज़रा कम ही बनती है हमेशा नोकझोंक होती रहती है। वॉक के बाद मैं घर आ गया और थककर सोफे पर बैठ गया बस कुछ मिनिट ही हुए की डोर बेल बज गई मैंने उठकर दरवाज़ा खोला सामने पंखुड़ी खड़ी थी डब्बा दिखाते हुए बोली ये बुआ ने भेजा है तुम्हारे लिए कहते हुए मेरे बिना कहे ही अंदर आ गई मैं उसे कुछ कहता कि उससे पहले मेरा मोबाइल बज उठा माँ का कॉल था मैंने पंखुड़ी को चुप रहने का इशारा किया और कॉल रिसीव किया माँ से कुछ देर बात हुई और ओके कहकर मैंने फोन रख दिया। क्या हुआ कोई प्रॉब्लम है हाँ पापा की तबियत ठीक नही है वो बीमार है पंखुड़ी के पूछने पर मैंने कहा। मैंने पंखुड़ी के हाथ से डब्बा लिया और उसे जाने को कह दिया पर पंखुड़ी गई नही उल्टा ये कहकर बैठ गई कि अगर अभी निम्मी आंटी होती तो क्या उन्हें भी जाने को कह देते थोड़ी ज़िद्दी थी पंखुड़ी। उस दिन एक दोस्त की तरह उसने मेरी उलझन को सुना समझा और मेरी उलझनों को सुलझाने की कोशिश भी की। बहुत मुश्किल होता है अपनी मंज़िल के करीब आकर वापस लौट जाना न जाने ऐसे कितने ख्याल थे जो मेरे अंदर चल रहे थे रातभर मैं फ़िक्र में ठीक से सो भी न सका और अगले दिन वापस कानपुर लौट गया।
ज़ोर - ज़ोर से बजती डोर बेल की आवाज़ ने मुझे अतीत से खींचकर वर्तमान में ला दिया वैसे इस तरह डोर बेल मिंटू ही बजाता है। मिंटू ही था गर्मा- गरम आलू के पराठे भिजवाए है आंटी ने मेरे लिए नही मेरी वाइफ के लिए। सात बज गए है पर तीनों अभी तक आये नही मैं वापस बाल्कनी मैं जाकर खड़ा हो गया और रास्ते की ओर देखने लगा लो तीनो नजऱ आ गए। जैसे ही वो घर में आये मैने बोलना स्टार्ट कर दिया कब से वेट कर रह हूँ मैं आप लोगो का मेरी किसी को कोई फिक्र है कि नही पँखु ने इतराते हुए कहा वो हम वॉक करते हुए ज़रा दूर निकल गए थे वैसे आइसक्रीम लाये है तुम्हे खाना हो तो ठीक है वरना हम तो है ही मेरी वाइफ को मुझे चिढ़ाने में बड़ा मज़ा आता है खैर मुझे चिढ़ाने लेने के बाद वो डिनर की तैयारी में लग गई और माँ - पापा वो हॉल में टीवी ऑन करके बैठ गए और वापस अपने फेवरेट जगह पर था अपनी बाल्कनी में।
उस वक्त मैं कानपुर वापस तो गया था लेकिन कुछ दिनों बाद ही लौट आया माँ और पापा को साथ लेकर। जब मैं अपने सपनो को पूरा करने यहाँ कानपुर से यहाँ आया था पापा की तबियत तभी भी थोड़ी खराब थी लेकिन उनका ट्रीटमेंट चल रहा था और पापा ने कहा भी था कि वो ठीक है मुझे ज्यादा फिक्र करने की जरूरत नही है इसलिए मैं आ गया था वैसे भी मेरी बात होती रहती थी माँ- पापा से और वो ठीक भी हो गए थे। उस दिन जब पंखुड़ी के सामने माँ का कॉल आया था तब पापा की तबियत दोबारा खराब हो गई थी इतनी मेहनत इतनी इतनी कोशिशों के बाद मैं अपनी मंजिल तक पहुंचा था ऐसे में मेरा घर वापस लौटना मुश्किल था मैं कहीं न कहीं थोड़ा स्वार्थी हो रहा था लेकिन पंखुड़ी की कुछ बातों ने मुझे वो समझा दिया जो जरूरी था मेरे लिए कहा उसने तुमने वो सुना जो उन्होंने हमेशा तुमसे कहा लेकिन वो नही जो नही कहा। माँ और पापा से जब भी बात होती थी वो कहते थे हम ठीक है तुम फिक्र मत करना लेकिन मैं कभी न उनके मन की बातों को समझ पाया और न ही उनके चहरे को पढ़ पाया नही जान सका कि वो अकेले है उन्हें जरूरत है अपने बेटे के साथ की। कभी - कभी अपने सपनो को पूरा करने के लिए हम अपने अपनो की तखलीफ़ो की अनदेखी कर जाते है क्योंकि उस वक्त हमे सिर्फ वही दिखता है जो हम पाना चाहते है। अपनो को खोकर सपने पूरे नही किये जाते ऐसा पंखुड़ी ने कहा था। मैं माँ और पापा को अपने साथ ले आया एक साल तक उनका ट्रीटमेंट चला हम सबने मिलकर उनका ख्याल रखा इसी बीच मैने ये जाना कि माँ अकेले कितना कुछ सम्हाल रही थी। तब से माँ और पापा मेरे साथ ही है। बहुत मुश्किल वक्त था वो मेरे लिये 5 साल गुजर गए है पर सब कुछ ऐसा लगता है जैसे कल की ही बात हो। अब सब कुछ ठीक है मैंने अपनी मेहनत से वो हासिल किया जो मैं चाहता था और माँ पापा को जब कभी उन्हें कानपुर के घर की याद आती है तो हम सब ही कुछ दिनों के लिए वहाँ चले जाते है वैसे भी पंखुड़ी को तो कानपुर वाला घर बड़ा ही अच्छा लगता है। पंखुड़ी ने मुझे वो गलती करने से बचा लिया था जो अक्सर सब कर जाते है अपनो को खोने की गलती।
दिनभर का शोर रात को कैसे खामोशी में बदल जाता है मैं बाल्कनी में खड़ा यही सोच रहा था की मेरी फूल सी खूबसूरत वाइफ पंखुड़ी कॉफी ले आई आदत है मुझे डिनर के बाद कॉफी लेने की।
