हमेशा की तरह आज भी कृपा ने अपने मायके राखी स्पीड पोस्ट के ज़रिये पहुँचा दी। हर साल यही होता है
कृपा राखी पर अपने मायके नही जाती बस राखी पहुँचा देती है। और कृपा का भाई कल्पेश अपनी बहन की भेजी हुई राखी को खुद ही अपने हाथ में बांध लेता है। कितने सालों से यही सिलसिला चला आ रहा है।
कृपा और कल्पेश दोनो बहन- भाई राखी पर एक दूसरे को बहुत याद करते है पर मजबूरी ये है की वो मिल नही सकते। जैसे - जैसे वक्त आगे बढ़ता है हमारे जीवन में सब बदलता जाता है। अभी कृपा के साथ कुछ ऐसा ही है।
कृपा की शादी को 12 साल हो गये है। वो अपने घर परिवार की जिम्मेदारियों में कुछ ऐसी उलझी हुई है की उसके बाहर उसे कुछ और नजर ही नही आता। शादी के बाद तीन या चार बार ही ऐसा हुआ होगा की कृपा राखी पर अपने मायके गई हो। उसके बाद तो उसका मायके जाना मुश्किल सा रहा।
रक्षाबन्धन को दो दिन रह गये है कृपा तैयारियों में लगी हुई। कृपा की दो ननन्द भी है। हर राखी पर वो अपने मायके जरूर आती है। उनके आने से कृपा के घर में रौनक सी छा जाती है। कृपा सभी का ख्याल बड़े अच्छे से रखती है और सभी के साथ बड़े प्यार से रहती है एक लौती बहु होने के कारण घर की सारी जिम्मेदारियां कृपा के कन्धों पर ही है।
कृपा अपने ससुराल में राखी का त्यौहार हँसी- खुशी के साथ ही मनाती है उसकी दोनो ननन्द उसे भाभी राखी बांधती है और फिर कृपा उन्हें अपनी ओर से कोई तोफा देती है। और सभी के साथ मुस्कुराते हुए वो अपने भाई को राखी न बांध पाने के दुख को छुपा जाती है। वैसे कृपा ने एक- दो बार कोशिश की राखी पर अपने मायके जाने की पर किसी न किसी वजह के चलते उसका जाना हो न सका। कृपा का मायका दूर भी है वहाँ पहुँचने में समय थोड़ा ज्यादा लगता है ये भी एक वजह है के कृपा नही जा पाती।
कृपा आज सुबह से जिन तैयारियों में लगी थी वो सारा काम शाम तक पूरा हो गया। काम से फ्री हो कृपा कुछ देर आराम करने के लिए सोफे पर बैठी ही थी के डोर बेल की आवाज आई। दरवाज़े पर कृपा की दोनो ननन्द थी मीना और जया। दोनो सबसे पहले अपनी माँ से मिली फिर कृपा को अपना मनपसन्द नाश्ता बनाने को कहकर वो कुछ देर आराम करने कृपा के कमरे में चली गयीं। कुछ देर बाद फिर डोर बेल की आवाज आई। जया ने जाकर दरवाजा खोला कोई शक्स दरवाजे पर था जिसे जया हॉल में ले आई। फिर मीना ने कृपा को आवाज देकर नाश्ता ले आने को कहा कृपा जब हॉल में आई तो चकित हो गई क्योंकि हॉल में सबके साथ कृपा का भाई कल्पेश भी बैठा था।
अपने भाई को सामने देख कृपा भावुक हो गई। अभी कुछ अजीब सी स्थिति हो रही थी कृपा खुशी से मुस्कुरा रही थी और आँखे आँसू से नम हो रही थी।
खैर कुछ ही पलो में कृपा ने खुद को सम्हाल लिया। इसके बाद सभी ने साथ में शाम का नाश्ता किया। और फिर जया कृपा का सामान से भरा बैग हॉल में ले आई। मीना और जया दोनो ने कृपा से मुस्कुराते हुए कहा भाभी इस बार आप खुद अपने भाई की कलाई पर राखी बांधेंगी। मीना और जया के द्वारा मिले इस सरप्राइस से कृपा बहुत खुश हुई। और फिर कृपा अपने भाई कल्पेश के साथ अपने मायके चली गई।
इस बार कृपा ने अपने भाई की कलाई पर इस रक्षाबन्धन की राखी तो बांधी ही पर पिछले उन सालो की राखी भी बांधी जो वो खुद नही बांध सकी थी।
आज कृपा और कल्पेश दोनो भाई - बहन बहुत खुश थे। क्योंकि आज बहुत वक्त बाद वो साथ में राखी का तैयार मना रहे है।

